ईमानदारों के कन्धों पर ही टिका है लोकतंत्र

ईमानदारों के कन्धों पर ही टिका है लोकतंत्र

मीडियावाला.इन।

देर रात रेडियो  वॉयस ऑफ़ जर्मनी के एशिया विभाग में चार दशक पहले रही वरिष्ठ सहयोगी नाज़ बहन शाह का फोन आया| कोलकाता में जन्मी और दशकों से जर्मनी में बसी नाज़ बहन ने चिंता के साथ पूछा- "आलोक वहां सब ठीक है?" मैंने समझा भूकंप के हलके झटकों की खबर से बुजुर्ग बहन चिंतित हो गई हैं| मैंने कहा- 'जी सब ठीक है, हल्के झटके तो अब दिल्ली में आते रहते हैं|' उन्होंने तत्काल कहा- "अरे वह तो मुझे मालूम है, लेकिन राहुल गाँधी का बड़ा बयान अभी टी वी पर देखा-सुना, तो सोचा तुमसे सही स्थिति पूछूं, तुम तो सबके बारे में तीखा लिखते हो, यदि कांग्रेस पार्टी का सबसे बड़ा नेता राष्ट्रपति से मोलने के बाद यदि कह रहा है- 'भारत में लपकतांत्र ही नहीं बचा है, कहीं नहीं दिख सकता'| यहाँ तो दो लाइन सुनने को मिली, इसलिए असलियत समझना चाहती हूँ|" इसके बाद उन्हें मैंने विस्तार से बताया| सड़कों पर हजारों लोग क्या किसी तानाशाही व्यवस्था में सड़कों पर महीने भर से प्रधान मंत्री और सर्कार को दिन रात गलियां देते हुए आंदोलन कर सकते हैं? अख़बारों, टी वी चैनलों, सोशल मीडिया पर कांग्रेस से अधिक अन्य दलों के बड़े या अदने नेता बिना सबूतों के भी अनर्गल बयानबाजी क्या बिना स्वच्छंद लोकतंत्र के संभव है? 

बातचीत में नाज़ बहन का दूसरा सवाल था- 'अरे गाँधी टैगोर के देश में क्या कोई ईमानदार नेता नहीं रह गया है? आखिर मुल्क का क्या होगा?' उनकी दोनों आशंकाओं ने सचमुच मुझे इतना दुखी किया कि ठीक से सोना संभव नहीं हुआ| यह सवाल देश दुनिया में भारत और लोकतंत्र के प्रति प्रेम, सम्मान रखने वाले अधिकांश लोगों के मन में उठ रहे हैं| इससे न केवल नई पीढ़ी भी भविष्य की चिंता को लेकर परेशान हो रही है, छवि बिगड़ने से भारत में भारी पूंजी लगाने के लिए उत्सुक विदेशी कंपनियां और प्रवासी भारतीय भी दुविधा में फंस रहे हैं| लोकतंत्र में मतभेद, असंतोष, राजनीतिक विरोध, आरोप-प्रत्यारोप, क़ानूनी कार्रवाई के साथ सामाजिक आर्थिक विकास स्ववभाविक है, लेकिन क्या कोई सीमा रेखा नहीं होनी चाहिए| 

राहुल गाँधी और उनके अज्ञानी सहयोगी कम से कम अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के पचास सालों के भाषण, सम्मेलनों में कही गई बातों और संसद में अथवा बाहर भी विरोधी नेताओं के तीखे भाषणों का अध्ययन कर सकते हैं| आपात काल के अपवाद को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख दलों , विचारों के नेता सत्ता और प्रतिपक्ष में रह चुके हैं| इंदिरा गाँधी को सत्ता से हटने के बाद कुछ दिन  जेल भी जाना पड़ा, कितने छापे पड़े, लेकिन उन्होंने या उनके सहयोगियों ने लोकतंत्र ख़त्म होने का आरोप नहीं लगाया| बाद में वह और पार्टी सत्ता में आई, तो आंदोलनों से विरोध हुआ लेकिन यह किसी ने नहीं कहा कि लोकतंत्र ही ख़त्म हो गया| पूर्वाग्रह और राजनीतिक बदले के आरोप लगते हैं, लेकिन महीनों से जेल में बंद लालू यादव भी अदालत से न्याय की बात कहकर नितीश या प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी पर गुस्सा निकालते हैं, लेकिन लोकतंत्र नहीं रहने का तर्क नहीं देते हैं| जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडीज जैसे नेता जेल में रहे, लेकिन बाद में सम्पूर्ण व्यवथा पर अनर्गल और अशोभनीय वक्तव्य नहीं देते रहे| किसानों और मजदूरों के लिए आज से कई गुना अधिक लाखों लोगों के प्रदर्शन दिल्ली में हुए हैं, लेकिन ऐसी अराजकता के साथ सीमाओं पर सडकों की हफ्तों की घेराबंदी, राजनीतिक अथवा परदेसी समर्थन से पांच सितारा सुविधाओं वाला आंदोलन दुनिया में देखने को नहीं मिल सकता है| भीड़ तो सामान्य लोगों को भ्रमित कर आशाराम बापू जैसा भी जुटा सकता है, लेकिन यहाँ तो किसानों के नाम पर ठेकेदार नेता गांव की तरह मालिश भी नहीं करवा रहे, होटल की तरह मसाज की पचासों मशीन, शानदार बिस्तर, वाटर प्रूफ तम्बू, देसी घी का हलवा, साग-सब्जी, नाश्ता खाना, गाना, संगीत, टी वी के इंतजाम का आनंद ले रहे हैं| ब्रिटेन कनाडा में सक्रिय भारत विरोधी आतंकवादी संगठनों ने बाकायदा तम्बुओं पर अपने बैनर लगाकर घोषणा कर रखी है कि सुख सुविधाओं का इंतजाम उनका है| इस दृष्टि से तो वास्तव में यह विरोध अलोकतांत्रिक अराजकता के लिए बनाने वाले लोग करवा रहे हैं| दूसरी तरफ केरल, तेलंगाना से लेकर जम्मू कश्मीर के दुर्गम इलाकों तक हुए स्थानीय चुनावों में भारी मतदान और विभिन्न दलों की सफलता लोकतंत्र की जड़ें गहरी होने से विश्वास को बनाये हुए हैं| 

जहाँ तक भ्रष्टाचार की बात है, सम्पूर्ण व्यवस्था को भ्रष्ट करार देना भी निहायत अनुचित है| निश्चित रूप से निचले स्तर पर भ्रष्टाचार चल रहा है| राजनीति में धन बल महत्वपूर्ण हो गया| लेकिन सब बेईमान और भ्रष्ट नहीं हैं| युवाओं के साथ संवाद में मैं ऐसे मुद्दों पर नामों के साथ ध्यान दिलाता हूँ कि भारतीय राजनीति और समाज ईमानदार नेताओं, उनके सहयोगियों, अच्छे अधिकारियों, कानून और न्याय के रक्षक न्यायाधीशों के कन्धों पर ही सुरक्षित रहा है| जरा ध्यान दीजिये- पिछले दस दिनों में चौधरी चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी के साथ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा को श्रद्धा सुमन अर्पित किए गए| उन पर निजी रूप से भ्र्ष्टाचार का आरोप कभी नहीं लग सका| अटलजी और चरणसिंहजी प्रधान मंत्री तक रहे, लेकिन कोई निजी लाभ उठाने का प्रमाण नहीं मिला| वोराजी पर पार्टी के पदाधिकारी के रूप में हस्ताक्षर करने पर एकाध मामला कहीं क़ानूनी प्रकरण में आया, लेकिन मुख्यमंत्री, राज्यपाल, केंद्रीय मंत्री रहते हुए किसी निजी लाभ का प्रमाण सहित आरोप नहीं लगा| वह डॉक्टर शंकरदयाल शर्मा और प्रकाश चंद्र सेठी जैसे ईमानदार नेताओं के आगे बढ़ाने से महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचे थे| डॉक्टर शर्मा भी मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, राष्ट्रपति तक रहे, लेकिन एक निजी दाग नहीं लगा| सेठीजी तो मुख्यमंत्री के अलावा केंद्र में गृह, रक्षा, विदेश, पेट्रोलियम, रसायन, इस्पात सहित अधिकांश मंत्रालयों में दशकों तक मंत्री रहे, पार्टी के कोषाध्यक्ष रहे| एक बार तो मैंने उनके सचिव के केबिन में बिड़लाजी तक को इन्तजार करते देखा| लेकिन सेठीजी ने कभी व्यक्तिगत लाभ नहीं लिया| मध्य प्रदेश के लोग जानते हैं कि जीवन के अन्तिंम वर्षों में उन्हें कितनी आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, इलाज तक के लिए मुश्किल से इंतजाम हुए| भागवत झा आज़ाद, मुरली मनोहर जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे, सुन्दर सिंह भंडारी जैसे नेताओं ने अनेकानेक लोगों को तैयार किया| ईमानदारी के आदर्श प्रस्तुत किए| 

इसी परम्परा में नरेंद्र मोदी तीन बार मुख्यमंत्री रहने के बाद छह वर्षों से प्रधान मंत्री हैं, लेकिन  व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं लगा| उनके साथ मंत्रिमण्डल में निर्मला सीतारमण, एस जयशंकर, प्रकाश जावड़ेकर, किरण रिजूजी, प्रताप चंद्र सारंगी जैसे कई मंत्री हैं और उन पर कोई आरोप नहीं लगाया जा सका| इसी तरह विभिन्न दलों के कई महत्वपूर्ण सांसदों के नाम ईमानदार सूची में गिनाये जा सकते हैं| लोकतंत्र ऐसे लोगों के बल पर ही जीवित है और रहेगा|

RB

आलोक मेहता

पद्मश्री (भारत सरकार) से सम्मानित, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार-पत्रकार सम्मान-2006, दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा श्रेष्ठ लेखन पुरस्कार-1999 पद्मश्री आलोक मेहता हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे "नई दुनिया" के प्रधान सम्पादक हैं।

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