कहानी हल्के, नन्हे और उनके लंबे सफर की.....

कहानी हल्के, नन्हे और उनके लंबे सफर की.....

मीडियावाला.इन।

वो दोनों मुझे ऐसे मिलेंगे सोचा नहीं था। जब दफतर से रात में सड़कों पर चल रहे प्रवासी मजदूरों की कहानी करने को कहा गया तो सोचा कौन मिलेगा अंधेरी रातों में सड़कों पर इस तरह चलते हुए। रात गहराते ही हम निकल पड़े भोपाल के बाहर विदिशा बाइपास पर। दरअसल ये बाइपास पिछले कुछ दिनों से महाराष्ट्र की सीमा से आकर इंदौर से भोपाल, विदिशा, सागर और झांसी या फिर रीवा होकर इलाहाबाद जाने वाले प्रवासी मजदूरों का ही रास्ता बना हुआ था। सुबह दोपहर तो भोपाल से विदिशा जाने वाला ये मोड़ महाराष्ट्र  खासकर मुंबई से आ रही छोटी बड़ी गाड़ियों से भरा ही रहता था। ये हम जानते थे मगर रात के अंधेरे में भी इस बाइपास पर जाते हुए लोग मिलेंगे अंदाज़ा नहीं था। मगर ये क्या! इस चौराहे पर देर रात में भी महाराष्ट्र वाली गाड़ियां लगातार आ रही थीं। चौराहे पर हो रही चहल पहल को देख ये लंबा सफर करने वाले रुकते, रास्ता पूछते, साथ लाया या रास्ते में मिला कुछ खाते, नहीं तो पानी पीकर पेट भरते, फिर साथ के बच्चों को किनारे ले जाकर शूशू कराते और निकल पड़ते लंबे सफर पर। इस मोड़ पर मुंबई से आ रहे ऑटो वालों से बात कर जब हम लौट रहे थे तो सुनसान सड़क पर किनारे की ओर सड़क पर बैठी कुछ आकृतियां हमें दिखीं। ड्राइवर संजय को हमने गाड़ी धीरे करने को कहा और उनके पास पहुंचते ही वो तीन परछाइयाँ हमारी गाड़ी की खिड़की के पास चिपक कर खड़ी हो गयीं। मुंह पर बंधा कपड़ा और पीठ पर लटके बैग से ही  लग गया कि ये सब भी वक्त के मारे प्रवासी श्रमिक हैं, जो यहां सड़क किनारे गिट्टी के ढेर पर बैठे हुए थे। गाड़ी रूकते ही वो हाथ जोड़कर कातर भाव से बोलने लगे, भाई साहब हमें मंडीदीप तक पहुंचा दो, हम कई दिनों से चल रहे हैं। इस बीच में, मैं गाड़ी से बाहर निकल आया था और उनसे थोड़ी दूरी बनाकर बातचीत की कोशिश करने लगा। तब तक हमारे साथी होमेंद्र का कैमरा भी चालू हो गया था, हमको हमारी कहानी के किरदार मिल गये थे। क्या नाम है तुम्हारा? एक ने कहा हल्के तो दूसरे ने बताया नन्हे। मुझे हल्की हंसी आयी कि दोनों नामों का मतलब भी एक और दोनों की परेशानी भी एक जैसी ही है। मैंने पूछा यहां पत्थरों पर क्योें बैठे हो? वहां पास में पेट्रोल पंप है, वहां क्यों नहीं रूके? हल्के ने कहा- भाई साहब पेट्रोल पंप वाले ने डांट कर भगा दिया, कहा कि यहां क्यों भीड़ कर रहे हो। ये बात सुनकर मैं हैरान रह गया क्योंकि एक दिन पहले ही बीजेपी के बड़े नेता ने पेट्रोलियम मंत्री धर्मेद्र प्रधान की उदारता का किस्सा सुनाते हुए बताया था कि अब देश के सारे पेट्रोल पंपों पर श्रमिकों के रूकने और ठहरने के इंतजाम के आदेश मंत्री जी ने कर दिए हैं। मगर यहां तो उल्टी ही गंगा बह रही थी। थोड़ी बातचीत से साफ हुआ कि हल्के और नन्हे दो तारीख को अहमदाबाद से रवाना हुए थे और 14 तारीख को मुझे मिले, मतलब वे बारह दिनों से लगातार चल रहे थे। भोपाल अहमदाबाद का छह सौ किलोमीटर का जो रास्ता किसी भी गाड़ी से दस से बारह घंटे का है, उस पर इनको पैदल चलते हुए बारह दिन मतलब 288 घंटे लग गये। इनके पैरों की तरफ जब मैंने देखा तो वहां जूतों की जगह घिसी और टूटी हुई सी चप्पलें थीं। कैमरे की लाइट में भी इनके पैरों के पंजों पर सूजन दिख रही थी। मैंने कहा अरे ये तो तुम्हारे पंजे सूजे हुए हैं तो हल्के ने अपना पैंट घुटने तक उठाया और कहा भाईसाहब ये देखिए पूरे पैर किस कदर सूजे हैं। दिन भर बस चलते हैं, खाना-पानी की बात क्या करें, रास्ते किनारे छांव तक नहीं मिलती। पैसे तो खत्म हो गए हैं, रास्ते में कभी जो मिल गया, खा लिया, नहीं तो पुलिस वालों की गालियों से ही पेट भर जाता है। पैदल चलते में कभी कोई गाड़ी वाला थोड़ी देर के लिये बैठा देता है तो ऐसा लगता है सब कुछ मिल गया। तो कब से खाना नहीं खाया तुमने? भैया, दो दिन हो गए, भोजन क्या होता है, देखा नहीं। इस बीच में नन्हे का फोन बजता है वो थोड़ा किनारे जाकर धीरे से कहता है, हाँ अम्मा आ जाएँगे आज रात तक या कल सबेरे, चिंता मत करो, अरे खाना भी खा लिया, बस अभी थोड़ी देर पहले खाया। अब चढ़ाई करने की बारी मेरी थी, तो यार तुम तो गजब झूठ बोलते हो, अभी मुझसे कहा खाना नहीं खाया, तो इस पर आँखें भरकर नन्हे कहता है, भाईसाहब घर वालों से ऐसे ही बातें करनी पड़ती हैं, उनको क्यों टेंशन दें अपनी, फिर अचानक वो अपनी शर्ट उठाकर पेट दिखाते हुए बोला ये देखिए हमारा पेट, ये क्या आपको खाया पिया दिख रहा है। पिचके पेट वाले इस कम उमर के मेहनतकश युवक की समझदारी ने अब मुझे शर्मिंदा कर दिया।अहमदाबाद की किसी कंपनी में सेरेमिक का काम करने गये ये युवक रायसेन जिले के उदयपुरा के अच्छे परिवारों से थे। मंडीदीप में इनके रिश्तेदार रहते थे, मगर उनको भी मोटरसाइकिल से यहाँ आने को मना कर रहे थे। ये अपने घर पैदल या अपनी सामर्थ से ही जाना चाहते थे। नन्हे ने कहा कि भाईसाब अपनी मुसीबत में किसी दूसरे को क्यों परेशानी दें। अब ढांढस बंधाने की बारी हमारी थी, उनके हाथ में कुछ पैसे देकर कहा चिंता नहीं करो अब अपने घर के पास हो तुम। कुछ कदम की दूरी पर ही चौराहा है वहां खाने का इंतजाम भी है और वहीं पुलिस वाले तुमको किसी गाड़ी में बैठाकर घर तक भेज देंगे और थोड़ी देर बाद हमने हल्के और नन्हे को अपने साथी के साथ विदिशा चौराहे पर खाना खाते देखा। अब उनके चेहरे पर सुकून था। वहां खड़े हैड कांस्टेबल ने भी हमसे वायदा किया आप चिंता नहीं करिए इन तीन लड़कों को हम मंडीदीप तक छुड़वा देंगे। 

RB

1 comments      

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  • Amarpratap 2 weeks ago
    This is a matter of utter shame for the PM Modi, his entire cabinet and the coterie of Senior most IAS officers that surround him.

ब्रजेश राजपूत

तकरीबन पच्चीस साल के पत्रकारिता करियर में अधिकतर वक्त टीवी चैनल की रिपोर्टिंग करते हुये गुजारा। सहारा टीवी से होते हुये स्टार न्यूज में जो अब एबीपी न्यूज के नाम से चल रहा है। इसी एबीपी न्यूज चैनल के लिये पंद्रह साल से भोपाल में विशेष संवाददाता। इस दौरान रोजमर्रा की खबरों के अलावा एमपी यूपी उत्तराखंड गुजरात और महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनावों की रिपार्टिंग कर इन प्रदेशों के चुनावी रंग देखे और जाना कि चुनावी रिपोर्टिग नहीं आसान एक आग का दरिया सा है जिसमें डूब के जाना है। चुनावी रिपोर्टिंग में डूबते उतराने के दौरान मिले अनुभवों के आधार पर अखबारों में लिखे गये लेख, आंकडों और किस्सों के आधार पर किताब चुनाव राजनीति और रिपोर्टिंग मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव २०१३ लिखी है जिसमें देश के पहले आम चुनाव की रोचक जानकारियां भी है।

लेखक टीवी में प्रवेश के पहले दिल्ली और भोपाल के अखबारों में उप संपादक और रिपोर्टर रहे। जैसा कि होता है इस लंबे अंतराल में कुछ इनाम इकराम भी हिस्से आये जिनमें मुंबई प्रेस क्लब का रेड इंक अवार्ड, दिल्ली का मीडिया एक्सीलेंस अवार्ड, देहरादून का यूथ आइकान अवार्ड, मध्यप्रदेश राष्टभाषा प्रचार समिति भोपाल का पत्रकारिता सम्मान, माधवराव सप्रे संग्रहालय का झाबरमल्ल शर्मा अवार्ड और शिवना सम्मान।

पढाई लिखाई एमपी के नरसिंहपुर जिले के करेली कस्बे के सरकारी स्कूल से करने के बाद सागर की डॉ हरिसिंह गौर विश्वविदयालय से बीएससी, एम ए, पत्रकारिता स्नातक और स्नातकोत्तर करने के बाद भोपाल की माखनलाल चतुर्वेदी राष्टीय पत्रकारिता विश्वविघालय से पीएचडी भी कर रखी है।