सेना के अधिकारियों और सैनिकों की सर्वोच्च न्यायालय में याचिका : रक्षा मंत्रालय के लिए बड़ी चुनौती

सेना के अधिकारियों और सैनिकों की सर्वोच्च न्यायालय में याचिका : रक्षा मंत्रालय के लिए बड़ी चुनौती

सेना के लगभग 700 सेवारत अधिकारियों और सैनिकों ने सर्वोच्च न्यायालय में AFSPA के अंतर्गत दिए गए अधिकारों की रक्षा के लिए याचिका दी है. अपने आप में ये पहला ऐसा मौक़ा है जब कि इतनी बड़ी संख्या में अधिकारियों और सैनिकों ने एकजुट हो कर ऐसा किया है. AFSPA के अंतर्गत प्रावधान है ऑपरेशन के दौरान हुई किसी भी घटना या उल्लंघन के लिए न्यायिक कार्रवाही सिर्फ और सिर्फ केंद्र सरकार की अनुमति से ही की जा सकती है. चूंकि आतंकवाद से प्रभावित क्षेत्र अपने देश का ही हिस्सा हैं, ऑपरेशन में स्थानीय जनसंख्या की जानमाल की सुरक्षा की 100% गारंटी नहीं दी जा सकती. ऐसे में सैनिकों पर अलगाववादी तत्व झूठे आरोप लगा कर उनका मनोबल कम करते हैं. जम्मू कश्मीर और देश के उत्तर पूर्वी राज्यों में सैनिकों के खिलाफ शिकायतें आम बात है. इस से होने वाला नुकसान दीर्घकालिक है. न केवल सैनिकों के मनोबल पर गलत असर पड़ता है, बल्कि एकतरफा सूचनाओं के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं को तथा अलगाववादियों और आतंकवादियों के समर्थकों को सेना की छवि को खराब करने का भी सुनहरा मौक़ा मिलता है जो कि सूचना युद्ध का एक अहम् हिस्सा है. न्यायालय पहुँचने से पहले ही मीडिया ट्रायल हो जाता है और स्थिति ये है कि देश की कुछेक संस्थाएँ जो कि अजमल कसाब जैसे आतंकवादियों को निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया देने का समर्थन करती हैं, वे अपने ही सैनिकों पर ह्त्या के बेबुनियाद आरोप लगाने में देर नहीं करतीं. 
ऐसा नहीं है कि AFSPA के अंतर्गत सेनाओं को किसी को भी मारने का अधिकार है. मीडिया में AFSPA की जो नकारात्मक छवि है उसे सुधारने के लिए मीडियाकर्मियों को विषय पर चल रही चर्चा में शामिल करना आवश्यक है. ये प्रावधान ऑपरेशन के दौरान छानबीन और संदिग्ध लोगों को हिरासत में रखने के लिए सैनिकों को पुलिस जैसे अधिकार देता है. आतंकवादियों के विरुद्ध कार्रवाही में तेज़ी के साथ साथ न्यायिक सहमति की भी आवश्यकता होती है और हर ऑपरेशन में पर्याप्त मात्रा में पुलिस कर्मी और हर समय नयायालय से अधिकार पत्र लाना असंभव है. सेनाओं पर AFSPA के दुरूपयोग का आरोप लगना आम सी बात हो गयी है पर अधिकतर मामलों में आरोप लगाने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों का उद्देश्य सिर्फ सेनाओं को बदनाम करने का होता है. आंकड़ों और तथ्यों को ध्यान से देखा जाए तो ९९ प्रतिशत से भी अधिक आरोप बेबुनियाद पाए जाते हैं. चूंकि सेनाओं को मीडिया में अपना पक्ष रखने की खुली छूट नहीं है, इस बात को अलगाववादी तत्व और संस्थाएँ अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं. कुछ कमी सेनाओं की भी रही है और कुछ मामलों में अधिकारी और सैनिक दोषी भी पाए गए हैं और सभी दोषियों के विरुद्ध त्वरित अनुशासनिक कार्रवाही की गयी है और उन्हें दण्डित भी किया गया है. ये बात मीडिया नहीं दिखाता. पर हर संदिग्ध आतंकी को मारना ह्त्या नहीं है और यदि ऐसा है तो AFSPA के अंतर्गत समुचित व्यवस्था है. पर केंद्र सरकार की सहमति के बिना न्यायिक प्रक्रिया शुरू करना गलत होगा.
हाल ही में CBI द्वारा जाँच के आधार पर मणिपुर में किये गए ऑपरेशनों में सैनिकों के खिलाफ सीधे न्यायिक कार्रवाही करने के लिए सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है. इसलिए 700 अधिकारियों और सैनिकों ने AFSPA के अंतर्गत दिए गए अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायलय में याचिका दाखिल की है. सेना में अनुशासन की दृष्टि से देखा जाये तो ये कदम गलत है पर यदि देश में चल रहे सूचना युद्ध पर गौर किया जाये तो ये गलत नहीं है. ये सभी सैनिक सरकार के आदेश पर वहाँ तैनात थे, और किसी की ह्त्या के इरादे से वहाँ नहीं गए थे. जो भो ऑपरेशन किये जाते हैं, पुलिस के साथ मिल कर और सूचना एजेंसियों से मिली जानकारी के आधार पर सैनिक तरीके से कियी जाते हैं. सेना से जो गलती होती रही है वो है पर्याप्त साक्ष्यों का अभाव. मणिपुर या कश्मीर के जंगलों में ऐसी कार्रवाही में साक्ष्य मिलना भी कठिन है. कार्रवाही पुलिस की और अनुमानित साक्ष्य के आधार पर होती है. अब सेनाएँ भी सजग हैं पर आज से बीस साल पहले स्थिति कुछ और थी. उत्तर पूर्व में ज़्यादातर मामलों में अभियोग पक्ष सरकार से अनुग्रह राशि चाहता है पर कश्मीर में ये मामले सिर्फ सेना की छवि को गिराने के लिए उठाये जाते हैं.  अब जब कि अलगाववादी तत्व और कुछेक संस्थाएँ मामले AFSPA के प्रावधानों को नकारते हुए कार्रवाही की मांग कर रही हैं तो रक्षा मंत्रालय का नैतिक कर्तव्य बनता है कि मामले की गंभीरता को समझे और किसी भी व्यक्ति, गुट या संस्था को कानूनी दांवपेंचों का इस्तेमाल करके सेना के मनोबल को कम न करने दे. अगर अधिकारियों और सैनिकों के विरुद्ध मामले हैं तो उनकी निष्पक्ष जाँच और उचित न्यायिक प्रक्रिया को दिए गए प्रावधानों के अंतर्गत ही करवाना होगा. AFSPA को कमज़ोर करने से न केवल सेनाओं के मनोबल पर विपरीत असर पड़ेगा बल्कि आतंक के समर्थकों के हाथों में एक नया हथियार आ जाएगा. सेना को इस मुद्दे को गंभीरता से लेना होगा क्यूंकि इतनी बड़ी संख्या में सेवारत सैनिकों का न्यायलय जाना सेना के नेतृत्व पर भी सवालिया निशान लगाता है. सेना पूरे देश की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और युध्क्षेत्र में होने वाली हर कार्रवाही को न्यायलय में नहीं लाया जा सकता. AFSPA एक महत्वपूर्ण और सशक्त साधन है, रक्षा मंत्रालय का कर्तव्य बनता है कि इसमें फेरबदल न होने दे. इस विषय में केंद्र सरकार को भी बड़ा फैसला लेना होगा ताकि भविष्य में सैनिकों के हितों की रक्षा की जा सके. इस विषय में शीघ्र कार्रवाही की ज़रुरत है ताकि सेनाओं में गलत सन्देश न जाए और सैनिक व्यवस्था में अपनी आस्था न खोएँ. 
 

 

2 comments      

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  • Anuj Upadhyay 1 year ago
    Nice article by the author...
  • शिवानी 1 year ago
    गम्भीर मुद्दे पर सूक्ष्म पड़ताल और सही चेतावनी

कर्नल अमरदीप सिंह, सेना मैडल

कर्नल अमरदीप सिंह, सेना मैडल (सेवा निवृत), मूलतः देहरादून के निवासी हैं। कर्नल अमरदीप ने जम्मू कश्मीर (कुपवाड़ा, सियाचिन और नगरोटा) तथा मणिपुर (इम्फाल) और संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में सक्रिय सेवा की है। मणिपुर में बटालियन कि कमान के दौरान विशिष्ट सेवा के लिए इन्हें सेना मैडल प्रदान किया गया।

कर्नल अमरदीप सैनिक विषयों की गहरी समझ रखते है। सेना और वर्दी पर केन्द्रित उनके लेख देश की विभिन्न पत्रिकओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे है। स्वभाव से कवि कर्नल अमरदीप के तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके है। अप्रैल 2018 में स्वेच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद वे पूरी तरह से लेखन से जुड़े है। वे वर्तमान में जयपुर से प्रकाशित एक राष्ट्रीय पत्रिका के संपादक है।

सम्पर्क - 7999356350