कमतर नहीं कलामंच की चुनौतियां

कमतर नहीं कलामंच की चुनौतियां

मीडियावाला.इन।

लगभग बीते दो माह से मप्र सहित देश के सभी राज्यों में सांस्कृतिक गतिविधियां ठप है। वजह साफ है- कोरोना महामारी। शायद ही कलामंचों पर इस तरह का सन्नाटा इससे पहले किसी महामारी की वजह से हुआ होगा। लेकिन मैं समझता हूं कि कला मंचों का यह सन्नाटा आने वाले कुछ और महीनों तक निरंतर जारी रहेगा। अब जब भी सांस्कृतिक गतिविधियां मंचों पर दोबारा शुरू होगी, उससे पहले कठोर आत्म चिंतन व मंथन की आवश्यकता होगी। 

यह बात मैं इसलिए पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं, क्योंकि मैंने पिछले लगभग सात वर्षों से सांकृतिक पत्रकारिता करते हुए यह सब बहुत करीब से देखा है और समझा है। सभागारों में कला प्रेमियों का हुजूम, प्रस्तुतियों से पूर्व लंबी लाइनें, घंटों कई कलाकारों के साथ होती रिहर्सल जैसे दृश्य मैंने देखे है। लेकिन अब दोबारा यह दृश्य कितने समय बाद दिखाई देंगे यह अभी कहना जल्दबाजी होगी। बेशक मेरी समझ कुछ कम हो सकती है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि कलामंचों की चुनौतियां अभी किसी भी रूप में कमतर नजर नहीं आती। 

मप्र संस्कृति विभाग के कई उपक्रमों द्वारा पिछले दिनों देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन गतिविधियां संचालित करने का प्रयास किया गया। लेकिन उन्हें देख यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि विभाग का यह प्रयास महज खानापूर्ति है। उसमें बेहतर योजना और उच्च गुणवत्ता की कमी साफ नजर आती है। मेरे साथी और कला संवाददाता ने विभाग की इस निम्न श्रेणी की योजना पर समाचार प्रकाशित कर विभागीय उच्चाधिकारियों का ध्यान जरूर इंगित करने का प्रयास किया है। लेकिन मैं नहीं समझता कि विभागीय अधिकारियों को इससे बहुत अधिक फर्क पड़ने वाला है। बेशक विभाग द्वारा पिछले कुछ दिनों से इस ऑनलाइन कार्यक्रमों का प्रसारण यू-ट्यूब के माध्यम से किया जा रहा है। उसमें दर्शकों का अभाव साफ देखा जा सकता है। यही कारण है कि जिस मप्र में वर्ष के 365 दिन में लगभग हर दिन गतिविधियां आयोजित किए जाने के उद्देश्य से कला पंचाग तैयार किया जाता है वह विभाग आज 100 दर्शक भी जुटा पाने में असफल है। 

 

जाहिर है यह सवाल हमारी तैयारियों पर भी उठता है, कि आखिर तकनीक के इस दौर में हम दृश्य, श्रृव्य सहित मंचीय कलाओं का लाभ तकनीक के माध्यम से उठाने में कितनी रूचि रखते है। यदि यह सवाल मेरे मन में उठता है, तो निश्चित ही कला वर्ग से जुड़े हर व्यक्ति के मन में भी उठता ही होगा। मंच के सामने बैठकर लगने वाले ठहाके, सभागार में गूंजने वाली तालियां और सीटीयों की आवाज संगीत से जुड़ी प्रस्तुतियों के बीच मुख से निकलती वाह... की आवाज को भला कौन भूल सकता है। इसलिए अब कलाकारों और कला संस्थाओं को इस चुनौति को स्वीकार कर नए दिशा में विचार करने की आवश्यकता है। जिसमें इन लोगों का संस्कृति विभाग से सहयोग आपेक्षित होगा। 

 

अब बात की जाए कलाकारों व कला संस्थाओं की। तो इनमें से कई ऐसे कलाकार है, जो इन दिनों आर्थिक संकटों से दो-चार हो रहे होंगे। खासतौर पर वो युवा रंगकर्मी जो तथाकथित संस्थाओं के साथ जुड़कर काम करते है। क्योंकि इस समय न कार्यक्रम हो रहे है और न हीं संस्थाएं उन्हें भुगतान कर रही होंगी। ऐसे में न सिर्फ संस्कृति विभाग बल्कि कलाकारों सहित कला प्रेमियों को एकजुट होकर संकट की इस विपदा से बाहर निकलने पर मंथन करना चाहिए। कैसे दो गज दूरी, कम दर्शक संख्या, कम कलाकरों वाली प्रस्तुतियों और ऐसे विषयों के साथ जिसमें मंच पर निश्चित दूरी बनी रहे। जैसे उपायों के साथ कला क्षेत्र को फिर से धीरे-धीरे गतिमान किया जा सके। क्योंकि यदि कोरोना के संकट को पूर्णतः समाप्त होने तक का इंतजार किया तो कला क्षेत्र से जुड़े कलाकार और संस्थाओं की मुश्किलें और भी बढ़ सकती है। इसलिए नवाचार ही इस क्षेत्र को अब गति देने में कारगार साबित होगा। ताकि एक बार फिर प्रदेश के खाली और विरान पड़े कला मंचों पर सांस्कृतिक गतिविधियां गूंजायमान हो और कला के इस सुंदर प्रदेश में कार्यक्रम फिर से संचालित किए जा सके। 

 

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प्रवीण पाण्डेय

युवा पत्रकार ,समसामयिक विषयों पर सतत लेखन