रोहित का रोहित होना ही पर्याप्त था

रोहित का रोहित होना ही पर्याप्त था

मीडियावाला.इन।

रोहित सारदाना नहीं रहे,ये खबर वज्रपात जैसी थी.मुझे क्या शायद किसी को भी यकीन नहीं हुआ होगा रोहित के इस तरह अचानक रवानगी डालने का .अभी रोहित की जाने की उम्र थी ही नहीं ,लेकिन कालगति अबूझ है,रोहित को अपने साथ ले गयी .रोहित के जाने से टीवी खबरों की दुनिया ने  एक बेहतरीन लेकिन विवादास्पद प्रस्तोता को खो दिया .रोहित के परिजनों के प्रति पूरे देश की संवेदनाएं हैं .
 रोहित के अचानक जाने के बाद उसके बारे में जिस तरह की अमानुषिक टिप्पणियां सामने आयी ,उसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की होगी. रोहित ने भी नहीं .रोहित दूसरे  टीवी प्रस्तोताओं की तरह संघर्ष करते हुए बीते सत्रह साल में आगे बढ़ा था और उसका हाल मुकाम 'आजतक' था.यहां आकर रोहित का जो कायांतरण हुआ,शायद वो ही उसकी आलोचना की वजह है .मेरे ख्याल से रोहित के जीवित रहते हुए भी ये आलोचनाएं होती थीं लेकिन मरने के बाद भी इन आलोचनाओं ने उसका पीछा नहीं छोड़ा ,जो बताता है कई देश आज भी घृणा से उबरा नहीं है .ये घृणा उसी तरफ से आयी है जिसका प्रवक्ता रोहित को समझा जाने लगा था .
टीवी खबरों की दुनिया से जुड़े होने के नाते मुझे इस बात का अनुभव है कि खबरों की दुनिया में आप अपनी मर्जी से एक सीमा तक काम कर सकते हैं,ये लक्ष्मण रेखा जहाँ समाप्त  होती है वहां से दूसरों की मर्जी प्रभावी हो जाती है. कुछ लोग इस सीमा को ढंग से पहचानते हैं और अपनी निजी छवि को बचाये रखते हैं लेकिन रोहित जैसे बहुत से नौजवान इसे पहचानने में गलती करते हैं और बहुत आसानी से दूसरों की मर्जी के मुताबिक़ बल्कि उससे कहीं आगे जाकर चलना,उठना,बैठना और बोलना सीख जाते हैं .रोहित को अकेले कोसना एकदम गलत है. 
पिछले दो दशक में मैंने अनेक टीवी समाचार प्रस्तोताओं को धर्मपरिवर्तन करते देखा है .धर्म परिवर्तन से आशय  जो   पत्रकारों  से प्रवक्ता हो गए और बड़ी ईमानदारी से अपनी भूमिका निभा रहे हैं.,जो ऐसा नहीं कर पाए वे या तो किनारा कर गए,या अपने घर बैठ गये या उन्होंने अभिव्यक्ति के दूसरे माध्यम अपना लिए .रोहित ने ऐसा कुछ नहीं किया.उसे जो गोदी   मिली वो उसमें जा बैठा .रोहित जैसे युवा पत्रकार को बदलते देख मुझे भी तकलीफ होती थी लेकिन मेरी तकलीफ कभी भी घृणा के स्तर तक नहीं पहुंची.मुझे रोहित और उसकी पीढ़ी के तमाम दूसरे रोहितों पर दया आती रही .इन बेचारों में इतना साहस नहीं था कि वे सुविधा की,सत्ता प्रतिष्ठान की प्रवाचक भूमिका से आपने आपको बचा पाते .
रोहित की पत्नी भी पत्रकार है ,उसके दो बच्चियां हैं ,वो चाहता तो गोदी मीडिया में शामिल हुए बिना भी अपनी पहचान कायम रख सकता था लेकिन -'छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए ,ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए' .यही रोहित पर लागू होता है,उसके लिए ऐसा  कर पाना मुनासिब नहीं था .बहुतों के साथ ऐसा करना मुनासिब नहीं है.रोहित से पहले दूसरी सरकारों के समय भी अनेक युवा और बूढ़े पत्रकारों ने प्रवाचक की भूमिका स्वीकार की है .ये आपकी,हमारी नजर में गलत हो सकती है किन्तु सबकी नजर में नहीं .
मुझे रोहित से तमाम उम्मीदें थीं.उसके पास एक बेहतरीन आवाज थी,एक सुगठित देह थी,देह की भाषा थी ,खबरों की भाषा थी,स्वस्थ्य उच्चारण था ,साहस था सवाल करने का और उसने अपने साहस का प्रदर्शन किया भी मैंने उसे तमाम जाकिट शाहों    से उलझते देखा है.लेकिन उसकी अपनी सीमाएं थीं जिन्हे वो पहचानता था .वो मेरा शिष्य नहीं था तो क्या हुआ ,वो मेरी पीढ़ी के तमाम दूसरे श्रेष्ठ पत्रकारों का शिष्य जरूर था.यदि उसका कायांतरण हुआ तो इसके लिए वे गुरु पत्रकार दोषी हैं जो उसे इतना साहसी नहीं बना पाए की वो फांसीवाद के परवाह से अपने आपको बचा सके. 
मान लीजिये रोहित टीवी प्रस्तोता न होता तो किसी धरवाहक में अभिनय कर रहा होता,तब भी क्या दुनिया उससे इसी तरह घृणा करती जैसी आज कार रही है. रोहित घृणा का नहीं सहानुभूति का पात्र है. वो मनोविज्ञानी था,इंजनियर   था,उसे पत्रकार होना ही नहीं था,लेकिन प्रारब्ध को आप कहा ले जायेंगे ?वो पत्रकार बना और उसने अपने आपको प्रमाणित भी किया .मै उसके काम को पहले दिन से देखने वालों में से हूँ .फिर भी मेरा रोहित के बारे में लिखा कुछ भी आधिकारिक नहीं है .
रोहित की उम्र के अनेक छात्र मेरे भी हैं कुछ   के चेहरे जाने-पहचाने जाते हैं तो कुछ परदे के पीछे अपनी भूमिका अदा कर रहे हैं .कुछ रोहित सरदाना जैसे हैं,कुछ बिलकुल नहीं हैं किन्तु मै जो रोहित जैसे नहीं हैं उनसे घृणा नहीं करता.किसी और को भी नहीं करना चाहिए और रोहित के जाने पर अपने भीतर छिपे घृणा के विष को नहीं उगलना चाहिए .ये विषवमन  का समय नहीं है .संक्रमण  का समय है. रोहित इसी विष का ,इसी संक्रमण  का शिकार हुआ है. रोहित कोरोना के कहर से बच गया लेकिन उसका दिल जबाब दे गया. जाहिर है कि उसके ऊपर तमाम अदृश्य तनाव भी रहे होंगे,अन्यथा ये उम्र दिल के जबाब देने की तो नहीं थी. आज टीवी समाचारों की दुनिया में तनाव के बीच काम करने वाले रोहितों की एक  बड़ी फ़ौज है .भगवान उन सभी की रक्षा करे और उन्हें रोहित गति प्राप्त होने से बचाये.  .मै रोहित की आत्मा की शांति और उसके आश्रितों को साहस प्रदान करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ .मेरी विनम्र श्रृद्धांजलि .

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राकेश अचल

राकेश अचल ग्वालियर - चंबल क्षेत्र के वरिष्ठ और जाने माने पत्रकार है। वर्तमान वे फ्री लांस पत्रकार है। वे आज तक के ग्वालियर के रिपोर्टर रहे है।