जब देश ने मानी मन की बात

जब देश ने मानी मन की बात

मीडियावाला.इन।

किसी राष्ट्र, समाज के जीवन में ऐसे मौके बेहद कम आते हैं, जब समूचा जनजीवन एक कतार में खड़ा नजर आये। 22 मार्च 2020 का दिन भारत के इतिहास में दर्ज हो गया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आग्रह पर देशवासी जनता कफ्र्यू को सफलतम बनाकर पेश आये। ऐसा विश्वव्यापी आपदा कोरोना के मद्देनजर किया गया था, जब देश ने दिखा दिया कि वे मानव हित में अपना सर्वस्व देने को हरदम तैयार हैं।
      यूं दुनिया में इस तरह के अनेक उदाहरण मिलते हैं, जब किसी व्यक्ति, संस्था या राष्ट्र प्रमुख के आह्वान पर लोग सडक़ों पर उतर आते हैं या उस बात के पालन में जुट जाते हैं। पर्यावरण के मुद्दे पर अनेक यूरोपिय मुल्कों में लाखों लोग प्रदर्शन कर चुके हैं। तानाशाही के खिलाफ भी लोगों ने अपनी जान की बाजी लगाकर भी सडक़ को घर बनाने से परहेज नहीं किया। महात्मा गांधी, नेल्सन मंडेला, आंग सू की जैसे अनेक नाम हैं, जिनके पीछे जनसैलाब उमड़ पड़ता था। इन सबने अहिंसा के रास्ते पर चलकर देश को आजादी दिलाने का पराक्रम किया है। स्वीडन की ग्रेटा थनबर्ग ने महज 15 साल की उम्र में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। यहां तक कि उसने दुनिया के दादाजी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से मिलने से इनकार कर दिया, यह कहकर कि वे तो खुद ही जलवायु का सत्यानाश करने पर तुले हैं।
      इसी क्रम में हम बात कर सकते हैं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का, जिन्होंने कोरोना से जूझ रही दुनिया के हालात के मद्देनजर देशवासियों से इतवार 22 मार्च को खुद को घर में रहने का संकल्प लेने का आग्रह किया और देश ने ऐसे मान लिया, जैसे कोई आज्ञाकारी बच्चा अपने अभिभावक की बात मान लेता है। यह तब है जब चीन, जापान,इटली, स्पेन जैसे देश एक आसान उपाय को अपनाने से चूक गये, तब भारत जैसे विशाल मत-मतातंतर वाले राष्ट्र में लोगों ने तकरीबन सौ प्रतिशत परिपालन का उदाहरण पेश करते हुए दर्शा दिया कि वे मानव जाति के कल्याण के मुद्दे पर सारे मतभेद भुलाकर एकमत हैं। यह संभव हो पाता है, राष्ट्र प्रमुख के व्यक्तित्व पर, उसके आचरण पर, उसके प्रति लोगों के यकीन पर और मुल्क के बाशिंदों के समर्पण पर। हर पक्ष ने अपना संर्पूण दिया।
    इसमें कोई दो राय नहीं कि मौजूदा दौर के वैश्विक नेताओं में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना अलग स्थान रखते हैं। वे ऐसे राष्ट्र प्रमुख हैं, जिनसे एक ही समय में अमेरिका, रूस, चीन,जापान जैसे मुल्कों के राष्ट्र् प्रमुख दोस्ताना संबंध का भरोसा रखते हैं और मोदीजी उनके यकीन पर खरे भी उतरते हैं और देश हित को सर्वोपरि रखते हुए उस भरोसे को आगे बढ़ाते हैं। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प तो दूसरी तरफ मोदी बराबरी का कद बनाये हुए हैं। उन्हीं मोदीजी के आग्रह को देशवासियों ने  मानकर यह बता दिया कि वे हर बेहतर पहल का सम्मान करना जानते हैं।
     कभी वक्त था जब देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को यह रुतबा हासिल था। 1965 के बुरे दौर में शास्त्रीजी ने अपील की थी कि देशवासी प्रति सोमवार को एक समय ही भोजन करें, ताकि अन्न संकट से जूझ रहा देश थोड़ी राहत महसूस कर सके। इसका असर हुआ और हम उस दौर को निकाल ले गये। तब शास्त्रीजी ने ही जय जवान, जय किसान का नारा देकर देश के प्रति अपनी सोच का इजहार किया था। अफसोस वे असमय विदा हो गये और देश उनके दृढ़ सोच के बूते मजबूती हासिल करने का अवसर गवां बैठा। बहरहाल।
      कोरोना के संदर्भ में बात करें तो इस महामारी के फैलने के बाद जब काफी हद तक यह बेकाबू हो गई और यह बात समझ आये कि दवाओं के जरिये उपचार की बजाय सावधानी व एकांत में रहकर इससे काफी हद तक बचा जा सकता है, तब तक काफी देर हो चुकी थी। इसे भारतीय प्रधानमंत्री ने ससमय समझा और चंद भारतीय लोगों की मौत से ही सबक लेकर वो कदम उठाया, जिसकी सराहना दुनिया कर रही है। 22 मार्च को जनता कफ्र्यू के जबरदस्त सफल होने को दुनिया भी देख ही चुकी है, जिससे उसे आगे के लिये अपने देश में भी इसका पालन कराने में आसानी हो जायेगी। इसी के साथ मोदीजी की यह अपील भी बेहद अनुकूल और असरकारी रही कि आपदा से निपटने के जतन भी बंद नहीं किया जा सकते और जो लोग इस प्रक्रिया में रात-दिन लगे हैं,उनका सम्मान भी जरूरी है। इसलिये 22 मार्च को तमाम देशवासी अपने घर के दरवाजे-खिडक़ी पर खड़े रहकर ताली-थाली, झांझ-मजीरे बजाकर उनका अभिनंदन करने की बात भी लोगों के दिल को छू गई। उसने देश मेें ऐसे अवसर पर जान का बाजी लगाने वालों में भी जोश भर दिया।
     मोदीजी की यह युक्ति भी एक सजग और बड़प्पन से भरे अभिभावक की तरह साबित हुई, जब बच्चों से अच्छा काम कराने के लिये हम उन्हें कुछ प्रोत्साहन देने का कहते हैं। देश में हजारों-लाखों डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी, सफाईकर्मी,परिवहन सेवा में रत लोग, मीडियाकर्मी, पुलिस, सुरक्षा बल जैसी अनेक एजेंसी सब कुछ भूलकर अपना दायित्व निभा रही हैं। वे निश्चित ही दुगने जोश से अब अपना काम करेंगे। यह प्रयोग बताता है कि किस तरह छोटे-छोटे उपाय के जरिये भी आप बड़ी मुसीबत से निपट सकते हैं। कारोबार, दफ्तरों को बंद कर, बुजुर्गों को घर में रहने की ताकीद कर, स्कूल-कॉलेजों के अवकाश कर इस महामारी के आक्रमण की 90 प्रतिशत तक आशंका को कम कर दिया गया।
    ताज्जुब नहीं कि दुनिया इस तरीके को अब अपने यहां भी अपनाये और वांछित परिणाम प्राप्त कर लें। जो बीमारी संक्रमण से बढ़ती है, वहां ऐसे उपाय आगे के लिये भी मानक का काम करेंगे। भारत ने जनता कफ्र्यू के सफल प्रयोग के जरिये 1962 व 1965 के भारत-चीन युद्ध के दिनों को भी याद कर लिया। हालांकि,तब केवल रात में साइरन बजने के बाद अंधेरा छा जाता था । तब घर के अंदर मोमबत्ती, दीया तक नहीं जलाया जाता था। उससे आगे जाकर लोगों ने स्व अनुशासन का पालन करते हुए ऐसी मिसाल कायम की है, जो दुनिया में याद रखी जायेगी और इस तरह का आचरण भी संकट के वक्त सुविधाजनक तरीके से कर सकेगी। यह प्रवृत्ति हमारी राष्ट्र चेतना का प्रतीक बनकर उभरी है, जिसे आगे भी कायम रखने की दरकार है। आज तो हम सीना तानकर गर्व महसूस कर सकते हैं कि इस भयावह संकट से निपटने की दिशा में हमने मजबूती से करोड़ों कदम आगे बढ़ाये हैं।

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रमण रावल

संपादक - वीकेंड पोस्ट 

स्थानीय संपादक - पीपुल्स समाचार,इंदौर                               

संपादक - चौथासंसार, इंदौर                                                            

प्रधान संपादक - भास्कर टीवी(बीटीवी), इंदौर

शहर संपादक - नईदुनिया, इंदौर

समाचार संपादक - दैनिक भास्कर, इंदौर 

कार्यकारी संपादक  - चौथा संसार, इंदौर  

उप संपादक - नवभारत, इंदौर

साहित्य संपादक - चौथासंसार, इंदौर                                                             

समाचार संपादक - प्रभातकिरण, इंदौर                                                            


1979 से 1981 तक साप्ताहिक अखबार युग प्रभात,स्पूतनिक और दैनिक अखबार इंदौर समाचार में उप संपादक और नगर प्रतिनिधि के दायित्व का निर्वाह किया । 


शिक्षा - वाणिज्य स्नातक (1976), विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन


उल्लेखनीय-

० १९९० में एक दैनिक अखबार के लिये इंदौर के 50 से अधिक उद्योगपतियों , कारोबारियों से साक्षात्कार लेकर उनके उत्थान की दास्तान का प्रकाशन । इंदौर के इतिहास में पहली बार कॉर्पोरेट प्रोफाइल दिया गया।

० अनेक विख्यात हस्तियों का साक्षात्कार-बाबा आमटे,अटल बिहारी वाजपेयी,चंद्रशेखर,चौधरी चरणसिंह,संत लोंगोवाल,हरिवंश राय बच्चन,गुलाम अली,श्रीराम लागू,सदाशिवराव अमरापुरकर,सुनील दत्त,जगदगुरु शंकाराचार्य,दिग्विजयसिंह,कैलाश जोशी,वीरेंद्र कुमार सखलेचा,सुब्रमण्यम स्वामी, लोकमान्य टिळक के प्रपोत्र दीपक टिळक।

० 1984 के आम चुनाव का कवरेज करने उ.प्र. का दौरा,जहां अमेठी,रायबरेली,इलाहाबाद के राजनीतिक समीकरण का जायजा लिया

० अमिताभ बच्चन से साक्षात्कार, 1985

० म.प्र., छत्तीसगढ़ व राजस्थान के विधानसभा चुनाव 2013 के तमाम विश्लेषण सटीक रहे, जिनमें सीटों का भी उल्लेख था।

० 2014 के लोकसभा चुनाव में म.प्र. की सीटों का विश्लेषण शत-प्रतिशत व देश में भाजपा की 260 व गठबंधन की 300 सीटों का सटीक आकलन। साथ ही 2011 से नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना वाले अनेक लेखों का प्रकाशन भी किया, जिसके संकलन की किताब मोदी युग का विमोचन जुलाई 2014 में किया गया। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को भी किताब भेंट की गयी। 


सम्मान- मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्क विभाग द्वारा स्थापित राहुल बारपुते आंचलिक पत्रकाारिता सम्मान-2016 से सम्मानित।


विशेष-  भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा 18 से 20 अगस्त तक मॉरीशस में आयोजित 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में सरकारी प्रतिनिधिमंडल में बतौर सदस्य शरीक।


मनोनयन- म.प्र. शासन के जनसंपर्क विभाग की राज्य स्तरीय पत्रकार अधिमान्यता समिति के दो बार सदस्य मनोनीत।


किताबें- इंदौर के सितारे (2014), इंदौर के सितारे भाग-2(2015) , इंदौर के सितारे भाग-3(2018), मोदी युग(2014), अंगदान(2016) सहित 7 किताबें प्रकाशित ।


भाषा-हिंदी,मराठी,गुजराती,सामान्य अंग्रेजी


रुचि-मानवीय,सामाजिक,राजनीतिक मुद्दों पर लेखन,साक्षात्कार 


संप्रति- भास्कर, नईदुनिया,प्रभातकिरण, दबंग दुनिया, आचरण , लोकमत समाचार , राज एक्सप्रेस, वेबदुनिया , मीडियावाला डॉट इन  आदि में नियमित लेखन।