इंदौर के विनोद अग्रवाल देश के अरबपतियों की सूची में

इंदौर के विनोद अग्रवाल देश के अरबपतियों की सूची में

मीडियावाला.इन।

सचमुच उनका व उनके परिवार का जीवन, उनका संघर्ष, उनके उत्थान-पतन, उनकी बदहाली और उनकी खुशहाली-सब कुछ परी कथा, किताबी किस्से-कहानियों की तरह। यकीन ही नहीं होता कि किसी के जीवन में इस स्तर तक पराभव हो सकता है और उसके बाद उन ऊंचाइयों को छुआ भी जा सकता है, जहां से समूची दुनिया के विविध रंग आसानी से नजर आ जाते हैं। ऐसे ही शख्स हैं इंदौर निवासी ख्यात उद्योगपति, समाजसेवी और आध्यात्मिक चेतना से भरपूर श्री विनोद अग्रवाल। एक हजार करोड़ रुपये व अधिक संपत्ति वाले देश के 953 अरबपतियों वाली सूची में हाल ही में विनोद अग्रवाल भी शरीक हुए हैं।

उनकी व उनके पिता श्री रामकुमारजी अग्रवाल व माताजी चमेलीदेवी की दास्तान सुनकर लगता है कि इस परिवार के संकटों को सहने के दौर को क्या नाम दिया जाए और गिर-गिरकर उठने के उनके माद्दे, उनकी जीजीविषा को किस विशेषण से नवाजा जाए? बेहद अद्भुत, बेहद रोमांचकारी, रोंगटे खड़े कर देने वाली और 'जब तक सांस है तब तक आस है, की भावना से लबरेज भरोसे, कर्मठता और प्रयासों की निरंतरता की बेमिसाल प्रेरणादायी सच का आईना है यह जीवन यात्रा।

मूलत: हरियाणा के रोहतक का यह परिवार है। वहां की प्रख्यात कारोबारी पेढ़ी हुआ करती थी- श्योलाल मंशाराम खिड़वाली। जिसके बारे में लोग कहते थे कि इनकी तो आठ पीढिय़ां बैठे-बैठे खा लेंगी। इस परिवार के बड़े-बूढ़े भी यही मानने लगे थे। पांचवें दशक तक करीब 25 लोगों के इस कुनबे में एक-दो को छोड़ कोई वयस्क सदस्य संभवत: इसीलिए काम भी नहीं करता था। सबका यही मानना था कि भगवान का दिया सब कुछ तो है, फिर क्यों हाय-तौबा की जाए? लेकिन कब वक्त करवट ले और आपको अर्श से फर्श पर ला पटके, भरोसा नहीं। एक फिल्मी गीत के बोल इस बारे में बेहद मौजूं हैं-'आदमी को चाहिए वक्त से डर कर रहे।    

अग्रवाल परिवार के जीवन में वक्त ने करवट ली और थोड़े ही अरसे में यह दुर्दशा हो गई कि जिनकी आठ पीढ़ी बैठकर खा सकती थी,उनकी मौजूदा पीढ़ी में ही खाने के लाले पड़ गए। मनुष्य जीवन की त्रासदी देखिए कि बुरे वक्त में साए के साथ छोड़ देने की दास्तान सच होने लगती है। कोई सगा, कोई हितचिंतक होने का दावा करने वाला साथ नहीं आया। नौबत यह आई कि रामकुमारजी को रोहतक छोडक़र कोलकाता जाना पड़ा। कोलकाता उस समय मारवाडिय़ों व वैश्यों का प्रमुख व्यापारिक केंद्र रहा है, जिसने कमोबेश अपनी शरण में आने वाले हर व्यक्ति को संकट से उबारा है। यहां जमा पूंजी से जैसे-तैसे जनरल स्टोर्स शुरू किया, लेकिन ज्यादा चला नहीं तो फिर से रोहतक आ गये, जहां रहने को छत तो खुद की थी। 

रामकुमार जी के 5 बेटे हुए, क्रमश: देवराज,पुरुषोत्तम, धर्मराज ,विनोद व संजय। वहां भी कोई काम न चलने के कारण विनोदजी के 1963 में जन्म के बाद 1965 में रामकुमारजी ने इंदौर का रूख किया। रोहतक के काफी परिवार यहां बसे हुए थे और उत्तर भारत में इंदौर तेजी से विकसित होता कारोबारी शहर था। यहां अपने भविष्य की बेहतर संभावनाएं तलाशने यह परिवार इंदौर आ गया। यहां आने तक के लिए रामकुमारजी ने रोहतक के परिचित से रेल किराया उधार लिया था, जो उन्होंने करीब पांच साल बाद हालात ठीक होने पर रोहतक जाकर चुकाया भी। इस बात की तो गुंजाइश ही नहीं थी कि वे कुछ कारोबार कर पाते। सो उन्होंने व उनके दो बेटों देवराज व पुरुषोत्तमजी अग्रवाल ने भी नौकरियां शुरू की।     

इस परिवार के संयुक्त प्रयास फलीभूत होने लगे। दाल-रोटी का बेहतर जुगाड़ होने लगा, इंदौर के जनजीवन में पहचान-प्रतिष्ठा कायम होने लगी, वैश्य समाज में मान-सम्मान मिलने लगा। परिवार के डीएनए में चूंकि कारोबार ही था तो जैसे ही इंदौर में पैर जमे तो रामकुमारजी ने ट्रांसपोर्ट कारोबार में कदम बढ़ाए। इस काम में बरकत होने लगी तो संयोग से कोयला कारोबार की तरफ रुझान हुआ। कहते हैं कोयले की दलाली में हाथ काले होते हैं, लेकिन रामकुमारजी के परिवार के हाथ व दामन उजले होने लगे। तब तक उनके साथ तीन बेटे देवराज, पुरुषोत्तम व धर्मराज भी आ जुटे थे तो वे एक-एक कर चार नहीं, बल्कि 1,111 हो चुके थे। किसी भी पिता के लिए उनके बेटों का साथ खड़ा होना सबसे बड़ी दौलत होता है। काम ने रफ्तार पकड़ ली। उधर, विनोदजी को परिवार के हालात सुधरने के निमित्त पढ़ाई का मौका मिल गया तो उन्होंने अलग ढंग से अपने को साबित करने का तय किया। तब तक विनोदजी को परिवार के संघर्ष का थोड़ा-बहुत अंदाज हो चुका था। मां चमेलीदेवी के सत्संग में कुछ-कुछ बातें उनके समझ में आने लगी थीं। उनके मन में भी प्रारंभ से ही परिवार के कारोबार में हिस्सेदार होने की अभिलाषा जाग चुकी थी। वे जब 14 बरस के होकर नौवीं क्लास में पहुंचे थे, तभी से पेढ़ी पर जाने लगे थे। इतना ही नहीं तब तक परिवार ने नमक के कारोबार में भी दखल देना शुरू किया था तो वे उसे अपने बूते करने में जुट गए। इसी बीच, दसवीं में वे मेरिट मेें आए तो 11वीं में दयानंद स्कूल महू नाके पर दाखिला ले लिया। यहां भी उनकी मेरिट बनी। तब विनोद बाबू साकेत से दयानंद स्कूल तक साइकिल से आना-जाना करते थे। तब तक पिताजी व भाइयों ने मिलकर कोयले के कारोबार को ऊंंचाइयां देना शुरू कर दिया था व देश में अनेक जगह पर अपने डिपो व स्टॉकिस्ट बना दिए थे। राजस्थान उनका एक प्रमुख केंद्र था । विनोद बाबू भी काम के सिलसिले में दौरे करने लगे। वे बताते हैं कि वे जब दौरे पर जाते, तब भी वहां किराए पर साइकिल लेकर बाजार में आना-जाना करते। जब वे बी.कॉम. फर्स्ट ईयर में आ गए तब जाकर पिताजी ने उन्हें स्कूटर दिलाया।

यह वो समय था जब लग रहा था कि अब सब कुछ अपनी मुट्ठी में रहेगा और किसी प्रकार की तकलीफ उनके परिवार के हिस्से में नहीं आएगी। लेकिन जीवन इतनी सहजता का नाम है ही नहीं तो अग्रवाल परिवार को तसल्ली कैसे मिल सकती थी? अथक् परिश्रम, खान-पान का बेसमय होना, चिंता-फिकर का बेतहाशा पहाड़, परिवार को सुख-साधन देने की मंशा के चक्रव्यूह में रामकुमारजी ऐसे घिरे कि कब उन्हें शुगर की बीमारी ने घेर लिया, पता ही नहीं चल पाया। हालात ऐसे हुए कि वे बिस्तर पर कैद हो गए। तब तक इस बीमारी और इसके इलाज को लेकर कोई समझ भी विकसित नहीं हुई थी तो रामकुमारजी ने घनघोर तकलीफ सही, जिसमें उठना-बैठना तक दूभर हो गया। विनोद बाबू बताते हैं कि उस वक्त में मां चमेलीदेवी ने पिताजी की ऐसी साज-संभाल की कि जिसे केवल किताबों में पढ़ा था, देखा तो कभी नहीं था। उन्होंने सब कुछ भुलाकर पिताजी को संभाला। लंबे अरसे तक तकलीफ उठाने के बाद वे इस संसार से विदा हुए। विनोदजी बताते हैं कि जिन अच्छे दिनों के लिए उन्होंने संघर्ष किया, तकलीफें झेलीं, दर-ब-दर हुए, फाकाकशी की, उन अनुकूल हालात को ठीक से निहारे बिना वे संसार से कूच कर गए। ऐसा ही कुछ माताजी के साथ हुआ। वे भी अपने जीवन के आखिरी करीब दस बरस तक लकवाग्रस्त होकर बिस्तर पर रहीं। इससे पहले परिवार के उजड़ने-बसने, कारोबार के जमने-बिखरने का दौर देखती रही। साथ ही पिताजी पूरे समय इधर-उधर घूमकर आजीविका के लिए जतन करते रहे। इस लिहाज से मां-पिताजी के करीब 50 साल के वैवाहिक जीवन में बमुश्किल 5 वर्ष दोनों के साथ में बीते होंगे। वे बताते हैं कि मां चमेलीदेवी ने कभी कोई तीर्थ यात्रा नहीं की, वे कभी मंदिर नहीं जाती थी। वे सिर्फ बालाजी हनुमान को मानती थीं। इसके अलावा कभी पूजा-अर्चना नहीं की। वे भी हमारे बेहतर दिनों को देखे-भोगे बिना ही चल दीं। इसका अफसोस हमें हमेशा सालता रहता है। वास्तविक अर्थों में हमें उनकी सेवा का समुचित मौका मिला ही नहीं।

विनोदजी बताते हैं कि पिताजी के पुरुषार्थ के बारे में कहा जाता था कि वे जंगल में मंगल करना जानते थे। वे बार-बार उजड़े पर हिम्मत नहीं खोयी। आज जिस कोयला उद्योग में अग्रवाल समूह देश में अग्रणी है, उसका पूरा नेटवर्क पिताजी ने तैयार किया था। इसी तरह से मां हमेशा कहती कि कोई काम छोटा नहीं होता, बस गलत काम मत करो। वे खाली बैठने के खिलाफ थीं। वे कहती कि कोई काम न हो तो सीढ़ी लगाकर ऊपर चढ़ो और नीचे उतरो, यही करते रहो, किंतु खाली मत बैठो। बड़े भाई पुरुषोत्तमजी ने हमें सिखाया कि लेने के पक्के बनो, छोड़ो मत और जिसका देना हो, उसे हाथ जोडक़र दो। मेरा खुद का मानना है कि काम से कभी रिटायर मत हो। भूमिका बदल लो, लेेकिन काम करते रहो। काम करने से कभी थकान नहीं होती। तमाम बड़े लोग 16-18 घंटे काम करते हैं, तब वे इस दुनिया में जाने जाते हैं।

विनोद बाबू ने बताया कि अब वे अपना ज्यादा ध्यान समाज सेवा पर लगा रहे हैं। काम में हाथ बंटाने उनका बेटा तपन मैदान में आ चुका है। उन्होंने बालाजी सेवार्थ विनोद अग्रवाल फाउंडेशन बनाया है। उसके तहत सालासर बालाजी में 4 प्रकल्प पर काम हो रहा है। एक रामकुमार अग्रवाल होम्योपैथी औषधालय बनाया है। चमेलीदेवी अग्रवाल सेवा सदन बनाया है, जिसमें सर्व सुविधायुक्त 110 कमरे हैं। चमेलीदेवी सभागार व उद्यान है। सभागार बिना खंबे का वातानुकूलित है, जिसमें एक हजार लोग बैठ सकते हैं। इसके अलावा में गो चिकित्सालय प्रारंभ किया है, जिसमें एंबुलेंस भी है और वहां पर डॉक्टर के रहने का आवास भी है। ऐसा चिकित्सालय शायद ही कहीं हो। विनोदजी ने बताया कि इंदौर में भी अग्रवाल समाज की सभी इकाइयों में जुड़ा हूं, जिसके तहत अनेक सेवा प्रकल्प संचालित किए जा रहे हैं। चमेलीदेवी रेडक्रॉस ब्लड बैंक एंड डायग्नोस्टिक सेंटर छावनी में शुरू किया है। जिसमें एमआरआई, सिटी स्कैन, खून की जांच समेत सभी जांचें नाममात्र के शुल्क पर की जाती हैं। समाज के कमजोर वर्ग के लिए आवास योजना शुरू की है, जिसमें साढ़े आठ लाख रुपए में मकान दिए जा रहे हैं। इसमें 2 लाख सब्सिडी है, 6 लाख का लोन व ढाई हजार रुपए तक किस्त आएगी। समाज के 800 कमजोर वर्ग के लोगों का मेडिक्लेम कराया गया है। करीब 50 लाख रुपए समाज के बच्चों की शिक्षा के लिए रखे गए हैं। इन सब कामों में अग्रवाल समूह योगदान दे रहा है।    

उन्होंने बताया कि शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास ऐसी जरूरतें हैं जिनके पूरी होने पर व्यक्ति निश्चिंत होकर अपना काम कर सकता है। इसी के मद्देनजर हमने अपनी कंपनी के सभी करीब 2 हजार कर्मचारियों का मेडिक्लेम अनिवार्यत: कराया है। विनोदजी की शादी 1985 में नीनादेवी से हुई, जिनके बारे में वे बताते हैं कि 35 बरस के वैवाहिक जीवन में उन्होंने कभी कुछ नहीं मांगा। वे बेहद आध्यात्मिक प्रवृत्ति की हैं और उनकी ही वजह से वे राष्ट्र संत अवधेशानंद गिरिजी के संपर्क में आए और अब उनके विधिवत् शिष्य हैं। सिंहस्थ 2016 में उज्जैन में उनके शिविर की सारी व्यवस्थाएं विनोदजी ने एक माह तक वहीं रहकर संभाली हैं। वे संयोजक, अध्यक्ष व यजमान भी थे। दो बेटियां हैं, अर्चना व अदिति व दोनों की शादी हो चुकी है।

RB 

 

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रमण रावल

संपादक - वीकेंड पोस्ट 

स्थानीय संपादक - पीपुल्स समाचार,इंदौर                               

संपादक - चौथासंसार, इंदौर                                                            

प्रधान संपादक - भास्कर टीवी(बीटीवी), इंदौर

शहर संपादक - नईदुनिया, इंदौर

समाचार संपादक - दैनिक भास्कर, इंदौर 

कार्यकारी संपादक  - चौथा संसार, इंदौर  

उप संपादक - नवभारत, इंदौर

साहित्य संपादक - चौथासंसार, इंदौर                                                             

समाचार संपादक - प्रभातकिरण, इंदौर                                                            


1979 से 1981 तक साप्ताहिक अखबार युग प्रभात,स्पूतनिक और दैनिक अखबार इंदौर समाचार में उप संपादक और नगर प्रतिनिधि के दायित्व का निर्वाह किया । 


शिक्षा - वाणिज्य स्नातक (1976), विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन


उल्लेखनीय-

० 1990 में  दैनिक नवभारत के लिये इंदौर के 50 से अधिक उद्योगपतियों , कारोबारियों से साक्षात्कार लेकर उनके उत्थान की दास्तान का प्रकाशन । इंदौर के इतिहास में पहली बार कॉर्पोरेट प्रोफाइल दिया गया।

० अनेक विख्यात हस्तियों का साक्षात्कार-बाबा आमटे,अटल बिहारी वाजपेयी,चंद्रशेखर,चौधरी चरणसिंह,संत लोंगोवाल,हरिवंश राय बच्चन,गुलाम अली,श्रीराम लागू,सदाशिवराव अमरापुरकर,सुनील दत्त,जगदगुरु शंकाराचार्य,दिग्विजयसिंह,कैलाश जोशी,वीरेंद्र कुमार सखलेचा,सुब्रमण्यम स्वामी, लोकमान्य टिळक के प्रपोत्र दीपक टिळक।

० 1984 के आम चुनाव का कवरेज करने उ.प्र. का दौरा,जहां अमेठी,रायबरेली,इलाहाबाद के राजनीतिक समीकरण का जायजा लिया।

० अमिताभ बच्चन से साक्षात्कार, 1985।

० 2011 से नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना वाले अनेक लेखों का विभिन्न अखबारों में प्रकाशन, जिसके संकलन की किताब मोदी युग का विमोचन जुलाई 2014 में किया गया। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को भी किताब भेंट की गयी। 2019 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के एक माह के भीतर किताब युग-युग मोदी का प्रकाशन 23 जून 2019 को।

सम्मान- मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्क विभाग द्वारा स्थापित राहुल बारपुते आंचलिक पत्रकारिता सम्मान-2016 से सम्मानित।

विशेष-  भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा 18 से 20 अगस्त तक मॉरीशस में आयोजित 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में सरकारी प्रतिनिधिमंडल में बतौर सदस्य शरीक।

मनोनयन- म.प्र. शासन के जनसंपर्क विभाग की राज्य स्तरीय पत्रकार अधिमान्यता समिति के दो बार सदस्य मनोनीत।

किताबें-इंदौर के सितारे(2014),इंदौर के सितारे भाग-2(2015),इंदौर के सितारे भाग 3(2018), मोदी युग(2014), अंगदान(2016) , युग-युग मोदी(2019) सहित 8 किताबें प्रकाशित ।

भाषा-हिंदी,मराठी,गुजराती,सामान्य अंग्रेजी।

रुचि-मानवीय,सामाजिक,राजनीतिक मुद्दों पर लेखन,साक्षात्कार ।

संप्रति- 2014 से बतौर स्वतंत्र पत्रकार भास्कर, नईदुनिया,प्रभातकिरण,अग्निबाण, चौथा संसार,दबंग दुनिया,पीपुल्स समाचार,आचरण , लोकमत समाचार , राज एक्सप्रेस, वेबदुनिया , मीडियावाला डॉट इन  आदि में लेखन।