शिक्षक ही असली किताब, पूरी पाठशाला 

शिक्षक ही असली किताब, पूरी पाठशाला 

धार जिले में मांडू रोड पर बगड़ी चौराहे के विपरीत एक गांव है। नाम ठीक से याद नहीं, शायद आली रहा होगा। छोटा सा गांव है, उसमें एक प्राथमिक स्कूल है। कोई 12-13 वर्ष पहले मैं रिपोर्टिंग के लिए वहां पहुंचा तो गांव का स्कूल देखकर चौंक गया। बाहर से वह वैसा ही था, जैसे उस वक्त तक सब सरकारी स्कूल होते थे। बिना प्लास्टर की दीवारें, सीलन से भरी छत, उबड़-खाबड़ फर्श और गंदा व अस्त-व्यस्त मैदान, लेकिन कक्षाओं में ज्ञान के कई सूरज धधक रहे थे। क्लास रूम के हर कोने में नायाब चीजें टंगी थी। कोई कोना विज्ञान को समर्पित था, उसमें पुष्टों को काट कर, लकड़ी के टुकड़ों को जोडक़र रैन साइकिल बनाया गया था। एक कोना भूगोल का जिसमें पूरा सौर मंडल लटका हुआ था। ग्रहण की दशाएं समझाई गई थीं। गणित और भाषा के कोनों के अपने अंदाज और जुबान थी। 

बच्चे दवाई की बोतल पर उन दिनों लगने वाले रबर के ढक्कन से गिनती-पहाड़े और बाकी की केल्कुलेशन समझते नजर आए। बमुश्किल पांच सौ-हजार की आबादी के गांव में ऐसा स्कूल देख मेरे रोंगटे खड़े हो गए। कबाड़ से जुगाड़ की जगह यहां तो ज्ञान की पूरी गंगा बहा दी गई थी। समझ ही नहीं आ रहा था कि इस स्कूल को क्या कहूं। उस शिक्षक से कैसे मिलूं, क्या बात करूं। शिक्षक का नाम अब तक नहीं भूला हूं, वे सुभाष यादव थे। शायद स्कूल के प्रधानाध्यापक होंगे। हालांकि मेरा भाग्य साथ नहीं था। उस दिन किसी काम से बाहर गए हुए थे। फोन पर बात हुई तो सहजता से कहने लगे, कुछ समय पहले सरकार ने एक ट्रेनिंग पर भेजा था, वहां यह सब बताया गया था। सोचा आजमा कर देख लेते हैं। उनकी आजमाइश स्कूल के हर बच्चे के भीतर जगमगा रही थी। 

झाबुआ में शिवगंगा अभियान के शुरुआती दौर में स्वामी अवधेशानंद जी आए हुए थे। वे गांव-गांव जाकर अभियान के तहत स्थापित शिवलिंग के दर्शन कर रहे थे। मैं भी कुछ समय उनके साथ था। हम एक अनाम मजरे में पहुंचे तो देखा, जहां शिवलिंग स्थापित था उसके आसपास ग्रामीणों ने बांस-बल्ली के सहारे तंबू तान दिया था। दर्शन-पूजा के बाद नजर गई तो पाया तंबू के दूसरे तरफ एक शिक्षक तीन बच्चों को लेकर बैठे हैं। समझ ही नहीं आया कि ये कैसा स्कूल चल रहा है यहां। बच्चों की कॉपियां खोलकर देखीं तो लगा जैसे अक्षर नहीं मोती बिखेर रखे हैं। छोटे से मजरे के बच्चों की अंग्रेजी कॉन्वेट के बच्चों को टक्कर दे रही थी। गणित, विज्ञान के सवालों का वे चुटकी में जवाब दे रहे थे। शिक्षक से पूछा तो मालूम हुआ उस दौर की किसी सरकारी योजना के तहत वे गांव में आकर ही बच्चों को पढ़ाते हैं। जहां बच्चे और उपयुक्त जगह मिल जाती है, वहीं स्कूल शुरू कर देते हैं। न कोई कमरा था, न ब्लैक बोर्ड और न ही बाकी कोई इंतजाम फिर भी वह बड़े से बड़े स्कूलों पर भारी था। 

इंदौर के एक स्कूल में जाना हुआ तो पाया एक क्लास से खूब आवाजें रही थीं। मैं ठिठक गया। झांककर देखा तो लगा टीचर कुछ कहानी सुना रही थी। उन्होंने कहा एक गांव में एक गधा रहता था। सारे बच्चे उनके साथ एक अंगुली उठाकर हंसने लगते हैं। टीचर ने कहा, उसके दो कान थे, सारे बच्चे दो अंगुलियां उठा लेते हैं। इस बार टीचर बोलीं उसके चार पैर थे, तो सारे बच्चों ने अपने हाथ और पैर फैला दिए। कहानी आगे बढ़ी गधा कहीं जा रहा था रास्ते में पैर फिसल गया और धड़ाम से गिर गया। सारे बच्चे भी वैसे ही जमीन पर लहालोट हो गए। ठहाके लगाने लगे, उनके भीतर का गधा गिरने की शुरुआत जो हो गई थी। बाद में प्रिंसिपल से मुझे पता चला कि यह गणित की क्लास थी। 

कक्षाएं ऐसी ही होती हैं, ऐसी ही होना चाहिए। जो किसी किताब या संसाधन की मोहताज न हो। किसी भी क्लासरूम के लिए सिर्फ दो ही लोगों की जरूरत होती है। एक शिक्षक और एक विद्यार्थी। जब तक शिक्षक हैं, विद्यार्थी रहेंगे और जब तक विद्यार्थी हैं तब तक शिक्षकों को भी रहना ही होगा। कोर्स सबने वही पढ़ा है, सब वही पढ़ाते हैं, लेकिन अधिकतर याद नहीं रहता, क्योंकि वास्तव में कोर्स कुछ है ही नहीं है। अगर कुछ है तो सिर्फ शिक्षक, जो सदियों से साधन और साध्य की सारी अवधारणाओं को गलत साबित करने में लगे हैं। 

पुनश्च....ये फोटो धार के वरिष्ठ छायाकार रमेश सोनी जी का है, जिसके लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड मिला था। यह फोटो कई वर्षों से मेरे पास है, मैं उनकी समीपता का फायदा उठाते हुए इसे अखबार के पहले पन्ने से लेकर अपने फेसबुक तक कई बार इस्तेमाल कर चुका हूं। हर बार शिक्षक दिवस पर मुझे यही याद आता है। ऐसे ही स्कूल को हर बार खोजता रहता हूं, बाहर भी भीतर भी। 

0 comments      

Add Comment


अमित मंडलोई

Studied B.Sc. BJ MA LLM Dlit (H), 18 years in Journalism. Working on all media platform TV, WEB and print. 

In Patrika this is third edition earlier looking after Ujjain and Gwalior as editor. Now in Indore as Zonal editor.