अंधे युग की आहट है नफरत की सियासत

अंधे युग की आहट है नफरत की सियासत

मीडियावाला.इन।  देश के लिए ये बहुत गहरे अंधरे की शुरुआत है, जिसका अंतिम छोर अनदेखा है। आजादी के बाद कभी इतने बड़े प्रतिमान दांव पर नहीं रहे। शहरी नक्सली जैसे शब्द की रोशनी में प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश तलाशी जा रही है। सियासी दल केवल सत्ता के प्रतिस्पर्धी हो गए हैं। सेवा, जनप्रतिनिधित्व शब्द अर्थ खो चुके हैं। जन्म,जाति और क्षेत्र के नाम पर बने आभासी वर्ग सियासी दलों के वोटबैंक की मृगतृष्णा बन गए हैं। वर्ग संघर्ष की नफरत और इमोशनल ब्लैकमेलिंग सत्ता के पॉवर टूल बन गए हैं। जबकि लोकतांत्रिक मूल्यों में चुना हुआ जनप्रतिनिधि जो अपनी सीट के हर मतदाता का प्रतिनिधि होता है जिनमें उसकी विरोधी विचारधारा से लेकर उपेक्षा करने वाले तक सब शामिल होते हैं। यही निकाय से लेकर लोकसभा तक संपूर्ण राष्ट्र के प्रतिनिधि होते हैं, लेकिन अब ये पार्टियों के जरखरीदों की तरह काम करते हैं, क्योंकि दलों में लोकतंत्र केवल आभासी है। .... जो कुछ अलग कहने या करने का साहस करें तो दूध की मक्खी बनते हैं।  एससी एसटी एट्रोसिटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट की नई व्यवस्था और केंद्र सरकार द्वारा उसे मूल स्वरूप में लाने के संशोधन तथा दलित के नवतीर्थ बनते भीमा कोरेगांव की हिंसा के बाद की घटनाएं आने वाले खतरे का संकेत हैं। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में इसके बाद कुछ ऐसा घट रहा है जिसे समय रहते दुरुस्त करना ही होगा। वरना भविष्य के कपाल पर दलित और सवर्ण वर्ग संघर्ष की इबारत लिखने की कोशिश की जाएगी।

महाराष्ट्र के भीमा कोरगांव हिंसा से संबद्ध बताते हए देशव्यापी पुलिस कार्रवाई में नामचीन वाम एक्टिविस्ट गिरफ्तार (बाद में नजरबंद घोषित) किए गए। खबरें ऐसे प्रसारित हुईं जैसे इसके कारणों में कुछ व्यक्ति नहीं बल्कि समुदाय शामिल हैं। जबकि जिस यलगार परिषद के आयोजन को हिंसा का कारण बताया जा रहा है, उसका मूल उद्देश्य मराठा और एससी/एसटी के बीच बढ़ती खाई को दूर करना था। तथ्य यह है कि मराठा शासन के दो दशक बाद जब  पेशवाओं की सत्ता आई तो कमर में झाड़ू और गले में हांडी महारों की नियती बन गई जबकि उनका सैनिक इतिहास रहा है। वे शिवाजी दौर से पेशवाई आने तक तक मराठा सेना का हिस्सा थे और किले की सुरक्षा करते थे।1885 के गजेटियर और इतिहासकारों के मुताबिक कोरेगांव  युद्ध बेनतीजा रहा, लेकिन मरने वालों के आंकड़े के हिसाब से यह युद्ध कंपनी के पक्ष में गया। वी. लोंगर के मुताबिक युद्ध में कुल 22 महार, 16 मराठा और 8 राजपूत सैनिक कंपनी की तरफ से लड़ते हुए मारे गए जबकि  500 से ज्यादा पेशवा सैनिकों के मारे जाने का अनुमान है। अंग्रेजों के लिए यह लड़ाई तीसरे मराठा-अंग्रेज युद्ध का आखिरी मोर्चा था जिसने पेशवाओं के साम्राज्य का अंत कर दिया। संभवत: इसी कारण महार इसे पेशवाई (जन्मजात श्रेष्ठता) पर अपनी विजय के रूप में देखते हैं। लेकिन इतिहास के इस पन्ने को मराठा बनाम महार संघर्ष के रूप में पुन:परिभाषित करने की कोशिशें हो रही है।  इसी आग में घी के रूप में वाम दलों के बुद्धिजीवी एक्टिविस्टों को इस्तेमाल किया जा रहा है और जिग्नेश मेवाणी जैसे कुछ दलित नेता भी निशाने पर आ गए हैं। खबरें प्रचारित-प्रसारित हो रही है कि वाम एक्टिविस्ट प्रधानमंत्री को मार कर सत्ता पलट की कोशिश में थे। प्रतितर्क की कसौटी पर  यह तर्क खरा ही नहीं उतरता भारतीय शासन प्रणाली में कोई दल बिना चुनाव सत्ता मे हिंसा के दम पर तो नहीं आ सकता, लेकिन अगर पुलिस को संदेह है या उनके पास सबूत है तो इस मामले की जांच सीबीआई से कराई जाना चाहिए ताकि पता चल सके कि सच्चाई क्या है और षडयंत्र क्या? ऐसा तो नहीं कि वास्तव में प्रधानमंत्री की जान को खतरा हो, क्योंकि उन्हें कुछ होगा तो इसका लाभ किसे मिल सकता है यह थ्योरी भी साजिश का कारण हो सकती है। 

इधर मध्यप्रदेश में दो अप्रैल 2018 के बाद से अचानक समाज के दो विपरीत स्थिति ध्रुव समूहों में वर्ग चेतना तेजी से प्रसारित हुई है, लेकिन जिस तरह से इसका केंद्र बिंदू ग्वालियर-चंबल का अंचल बनता जा रहा है वह कई संशयों को जन्म दे रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी एसटी एट्रोसिटी एक्ट में नई व्यवस्थाएं देने के बाद पूरे देश में बिना नेता के दलित सड़कों पर उतरे मगर ग्वालियर-चंबल अंचल के कुछ चिन्हित हिस्सों में हिंसा फैली, जिसमें एक अपवादों को छोड़ दलित ही मारे गए और आज तक ये साफ नहीं हो पाया कि उनका हत्यारा कौन था? इस बीच जैसे ही चुनावी आहट तेज हुई तो जाति-वर्ग आधारित कर्मचारी संगठनों की जंग में सियासत के रंग भरने लगे। मप्र में ऐसा माहौल बना दिया गया जैसे कोई नया काला कानून आया है और हर व्यक्ति उससे पीड़ित है।  इसमें कुछ संगठन वर्ग गठबंधन की थ्योरी से सियासी पार्टियों के लिए जी का जंजाल बन गए है। हालांकि किसी भी समुदाय के सिमित लोग और उनकी गतिविधियां पूरे समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करती, फिर भी जमाने से शासक, नेता, ठग और चालाक लोग अपने हित साधने के लिए छोटी-बड़ी घटनाओं और उनके परिणामों को उसका प्रतिनिधि बता कर इस्तेमाल करते रहे हैं। 

जिस कानून को मुद्दा बनाया जा रहा है वह 1989 में इसलिए लाना पड़ा था कि 1955 के प्रोटेक्शन आफ सिविल राइट्स एक्ट के बाद भी न तो छूआछूत का अंत हुआ था न दलितों पर अत्याचार रुके। 2 अप्रैल 2018 आने तक भी देश में इस एक्ट को लेकर कोई बड़ा स्वर नहीं था, तब अचानक ऐसा क्या हो गया कि इस पर केवल मध्यप्रदेश में बवाल मच रहा है और उसका भी केंद्र ग्वालियर-चबंल अंचल ही है। इसके पीछे क्या है उसकी गठान वक्त खोलेगा लेकिन आज प्रदेश में प्रायोजित वैमनस्य धीरे-धीरे नफरत के घाव में बदल रहा है जिसका रक्तस्राव रोकना हर नागरिक की जिम्मेदारी है।

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देवेश कल्याणी

देवेश कल्याणी प्रदेश की पत्रकारिता जगत का चर्चित नाम हैं। तीखे शब्दों और मारक हेडिंग और आकर्षक ले आउट के लिए देवेश कल्याणी मीडिया जगत में विशिष्ट पहचान रखते हैं। सांध्य दैनिक प्रदेश टुडे को शुरुआत से शिखर पर पहुंचाने में बतौर संपादक अहम भूमिका निभाने से पहले देवेश कल्याणी दैनिक भास्कर, राज एक्सप्रेस जैसे अखबारों में बड़ी पारी खेल चुके हैं। इंदौर से ताल्लुक रखने वाले  देवेश कल्याणी भास्कर के गुजराती संस्करण दिव्य भास्कर की लॉन्चिंग टीम का अहम हिस्सा थे। कई सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों में भी देवेश कल्याणी अपनी सक्रियता और कार्यकुशलता के चलते बेहद लोकप्रिय हैं। समसामयिक और वंचित वर्ग के मुद्दों को उन्होंने मुखरता से अपने आलेखों में उठाया है।


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