आज शिक्षक दिवस है

आज शिक्षक दिवस है

मीडियावाला.इन। जो वैसे तो महान दार्शनिक और शिक्षा शास्त्री राधाकृष्णन का जन्मदिन है जो  भारत के दूसरे राष्ट्रपति थे पर जिन्होंने व्यक्ति पूजा के भावों से परे जा कर अपना जन्म दिन शिक्षक दिवस के रूप में मानाने को कहा , इस बहाने उन्होंने इस पुरे संवर्ग के लिए एक दिन समाज को अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए दिया । तो आज शिक्षा के पुनीत कार्य में लगे सभी शिक्षकों को हमारा नमन । गुरु या शिक्षाक की बात करें तो भगवन विष्णु को जगतगुरु कहा गया है । ब्रम्हा नहीं जो सृजन के देवता है और जिनकी वेशभूषा भी गुरु की तरह है और शिव भी नहीं जो औघड़ दानी हैं बल्कि विष्णु जो जगत के पालक हैं । ब्रम्हा इसलिए नहीं की सृजन गुरु नहीं करता , गुरु के पास तो कच्चा माल आता है संवारने के लिए । शिव भी नहीं क्योंकि संहार का कार्य उसका नहीं है इसलिए विष्णु जो जगत के पालक हैं और पालक के काम सारे हैं , आये हुए बिना काम अधूरे औगढ़ व्यक्ति को समाज के लिए उपयोगी बनाने का काम विष्णु ही करते हैं तो सबसे पहले वन्दे विष्णु अदकच्चे जगत गुरुम । इसी तरह शिक्षक भी ऐसे ही अधकच्चे बालक को कभी  डाक्टर कभी इंजीनियर तो कभी व्यापारी और कभी वैज्ञानिक के रूप में तैयार करता है  , बिना भेद भाव के ये काम करने वाले गुरु को आज  शिक्षक दिवस पर  नमन । मुझे आज अपने कुछ और भी शिक्षक याद आ रहे हैं , पर एक आश्चर्य है की याद में या स्मृति में रहने वाले अधिकांश शिक्षक मेरे स्कूल के समय के हैं , कालेज के शिक्षक उतनी शिद्दत से याद नहीं हैं , क्या पता इसलिए की कालेज में आकर हम कुछ ज्यादा मौज मस्ती में संलग्न हो गए थे या फिर स्नेह का वो श्रोत्र उतना निर्झर नहीं था जितना स्कूल में हुआ करता था । बहरहाल स्कूल के दिनों की यादें मंडला से शुरू होती हैं जहाँ मैं जगन्नाथ वरिष्ठ मूल विद्यालय में पढ़ा करता था , मुझे साहू जी की याद है जो हमें गणित पढ़ाया करते थे , खेल खेल में पतंग की आकृति से कैसे भारत का नक्शा बनाया जा सकता है ये हमने उन्ही से सीखा , उन्ही ने बताया की चक्रव्यूह की रचना देखने में कैसे दिखती है । गणित के प्रश्नों ने वैसे तो सौभाग्य से मुझे कभी परेशान नहीं किया पर उसे और सहज रूप से कैसे किया जा सकता है ये आत्मविश्वास साहू गुरूजी ने ही पैदा किया । तो उन्हें इस शिक्षक दिवस पर प्रणाम । हिसाब किताब में पक्का जान कर ही  स्कूल के  प्राचार्य रिछारिया जी ने  मुझे ये जबाबदारी दे दी की कक्षा की फ़ीस जो उन दिनों शायद चार आने प्रति माह थी मुझे इकट्ठी करनी है और उसे स्कूल में जमा करना है । काम खासा मज़ेदार था क्यूंकि इतने पैसे हाथ में आएं ये बड़ी बात थी मैंने एक गुल्लक में पैसे इकट्ठे करने चालू किये और माह के अंत में जब हिसाब कर जमा करने गया तो हिसाब से आठ आने मेरे पास ज्यादा थे , मैंने स्कूल के क्लर्क द्वारा बताई राशि जमा कर दी और ख़ुशी ख़ुशी घर आकर अम्मा को अपनी पहली कमाई की सूचना  दी । अम्मा बात  सुन के मुस्कुराईं और बोली ये बता तेरी गुल्लक में पैसे पैदा करने की शक्ति कहाँ से आयी ,उस समय मैं कक्षा तीन में पढता था इतना भी बुद्धू न था इशारा समझते हुए बोला वो तो नहीं हो सकता ये तो किसी की गलती से पैसे बचे हैं , अम्मा बोली गलती का फायदा उठा के पैसे क्यों लिए जाएँ फिर ? जरूर जिसकी गलती रही होगी वो रो रहा होगा बेहतर है ये बात अपने क्लास टीचर को बता दो और फिर किसी के न पता लगें तो स्कूल के खाते में जमा कर देना । मैंने ऐसा ही किया और बिना मतलब के पैसे पैदा नहीं हो सकते ये सबक मेरी मां ने दिया तो उनको भी प्रणाम । जबलपुर आने के बाद मेरा एडमिशन डिसिल्वा स्कूल में करा दिया गया जो एक प्राइवेट स्कूल था , उन दिनों निजी स्कूलों में पढ़ना सम्मान का कारण नहीं था , मॉडल हाई स्कूल में एडमिशन नहीं हो पाया तो हेठी की बात थी । मुझे बाउजी ने समझाया की मॉडल स्कुल के प्रिंसिपल श्री एस पी निगम अब डिलिसल्वा के प्रिंसिपल हैं जो सच भी था और इस कारण मैं मॉडल स्कुल में न पढ़ पाने का मलाल शांत कर पाया । निगम साहब की पुरे जबलपुर में इज्जत थी और फिज़िक्स जैसे विषय पर उनकी लिखी पुस्तकें कोर्स में पढाई जाती थीं । इसी स्कुल में मुझे मिले श्री बी आर गर्ग जो वैसे तो एन सी सी के इंस्ट्रक्टर थे पर हिंदी भी पढ़ाते थे , उन्होंने मुझे स्टेज में बोलना सिखाया । स्कुल में उन दिनों संचयिका दिवस मानया  जाना था और बचत करना अच्छी आदत है इस विषय के विरोध में मुझे बोलना था , सप्ताह भर मुझे उन्होंने सिखाया की क्या और किसे बोलने है और जब निर्णय का उद्घोष हुआ तो अंतर्स्कूल प्रतिस्पर्धा में मेरा स्थान द्वितीय था , पहली बार में ये यह स्थान एक उपलब्धि था और इससे ही मेरा स्टेज फियर  दूर हुआ ऐसे श्री गर्ग जी को भी मेरा प्रणाम । उसी स्कूल में श्री गोम्स सर थे जो खेल शिक्षक थे और खुद भी फुटबाल के अच्छे खिलाडी थे , हर सप्ताह के मंगलवार को दौड़ कूद में भाग लेने वाले बच्चों का चयन होता और ऐसे ही एक चयन में मुझे 100  मीटर दौड़ के लिए चुना गया , धीरे धीरे मैंने स्कुल की हॉकी और फूटबाल टीम का भी हिस्सा बन गया । मैं उनका प्रिय था क्यूंकि सी केटेगरी में मैं ऊंचाई काम होने से फिट था और विद्यालय की और से इस श्रेणी में अच्छा प्रदर्शन कर लेता था । साल भर मैं स्कुल की ओर से  अंतर्विद्यालयीन स्पर्धा में खेला पर जब स्कुल के ही आतंरिक प्रतियोगिता का समय आया तो नाप लेते समय मेरी उचाई थोड़ी बढ़ जाने से मैं सी की जगह बी केटेगरी में आ गया । ये बड़े बच्चों का ग्रुप था और मैं थोड़ा घबराया , जाकर गोम्स सर को मैंने कहा की केवल आधे सेंटीमीटर के कारण मुझे दूसरे ग्रुप में स्पर्धा करनी पड़ेगी और सी ग्रुप में तो मैं स्कुल का चैम्प था पर बी ग्रुप में तो परेशानी होगी , साल भर सी ग्रुप में खेला हूँ आदि आदि । गोम्स सर सुनते रहे और बोले यही तो समय है जिसमे कोई डर नहीं तुम्हें क्योंकि यहाँ तुम कुछ नहीं कर पाए तो सब कहेंगे अरे छोटा बच्चा है और कुछ कर लिया तो कहेंगे कमाल है ये तो और जैसे अचानक मेरा डर काफूर हो गया उस वर्ष मैंने दो इवेंट 100  मीटर रेस और लॉन्ग जम्प में स्कुल में पहला और 200  मीटर रेस में दूसरा स्थान प्राप्त किया । नए जगह पर जहाँ आपकी परफॉर्मेंस की कोई उम्मीद न हो वहां मेहनत कर आप कैसे चमक सकते हो ये गोम्स सर ने मुझे उस दिन सिखला दिया सो उन्हें और उस जैसे सभी गुरुजनों को शत शत प्रणाम और सभी को शिक्षक दिवस की बधाई ।

0 comments      

Add Comment


आनंद कुमार शर्मा

आनन्द शर्मा भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं, वर्तमान में आयुक्त अनुसूचित जाति विकास मध्य प्रदेश शासन के पद पर पदस्थ और कविता, फ़िल्म समीक्षा, यात्रा वृतांत आदि अनेक विधाओं में फ़ेसबुकीय लेखन| विशेष तौर पर मीडिया वाला के लिए ताज़ा फ़िल्म समीक्षा