मुर्दे बौखलाए हुए हैं

मुर्दे बौखलाए हुए हैं

मीडियावाला.इन।

बभनगामा, बेगूसराय के मशहूर डॉ. अजित भारती दवाओं के परचे नहीं लिखते। वे ऑपरेशन थिएटर में पाए जाते हैं और मनगढ़ंत बीमारियों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट नीचे मुर्दाघर की खिड़की पर मुर्दे को ही थमा देते हैं। हद है कि मुर्दे बौखलाए हुए हैं।
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अखबारों में पत्र संपादक के नाम कब के दफन हो गए। टेलीविजन में तो कोई गुंजाइश ही नहीं है कि आम आदमी की कोई आवाज कहीं सुनाई दे। वे जो चाहें छापें। दिखाएं। आप सिर्फ पढ़िए। देखिए। खबरों का एकतरफा बहाव है। आप सिर्फ बहिए। इस बहाव में उन्हीं किनारों पर टिकिए, जिन वैचारिक ठिकानों पर वे ले जाना चाहते हैं। एक समय नईदुनिया जैसे एक शहर से प्रकाशित अखबार में एक साल में पाठकों की 60 हजार चिटि्ठयां आती थीं। राजेंद्र माथुर खुद इनमेंे से छपने लायक पत्र छांटते थे। तस्वीर के हर पहलू के लिए जगह थी।

आज मैं सबके संज्ञान में पहले से मौजूद इस विषय पर बात क्यों कर रहा हूं? सबको पता है कि अखबारों और चैनलों में उनके नीति-नियमों के अनुसार खबरें बनाई और परोसी जाती हैं। नीति-नियम जो उनके लाभ-हानि से तय होते हैं। एक ही मुद्दे पर कभी वे कुछ कहते हैं, कुछ समय बाद कुछ और पटकते हैं। सामान्य पाठक और दर्शक शायद ही इस शरारत पर कभी ध्यान देते हों। लेकिन अब सोशल मीडिया ने काम तमाम कर दिया है। सब कुछ 360 डिग्री पर दर्शनीय है। अजित भारती नाम के एक लोकप्रिय युवा पत्रकार के हाथों ऐसा ही कुछ हो रहा है, जिनसे पिछले दिनों एक सेमिनार में मुलाकात हुई है। वे बिल्कुल खबरों के जॉनी डेप हैं। फायर, लेकिन कूल अंदाज में!

अजित भारती बेगूसराय से छह किलोमीटर दूर बभनगामा गांव के हैं। आठ हजार आबादी के इस गांव में उनके पिता रामविलास सिंह की सिर्फ एक बीघा खेती है। निशादेवी उनकी मां का नाम है, जिन्होंने बेहद मुश्किल हालात में अजित को बेगूसराय पढ़ने भेजा। फिर वे तिलैया सैनिक स्कूल में पढ़े। किराेड़ीमल कॉलेज से इंग्लिश ऑनर्स के बाद आईपी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिग्री ली। टाइम्स ऑफ इंडिया और इकॉनॉमिक्स टाइम्स में एक अरसा गुजारने के बाद ऑपइंडिया मंे एक साल पहले एडिटर बनकर आए। अब तक उनके करीब 250 वीडियो बुलेटिन आए हैं। इनमें से ज्यादातर चर्चित हुए और वो भी इसलिए कि न्यूज चैनलों पर किसी खास मकसद से परोसे जाने वाले एकतरफा पैकेज आैर डिबेट की उन्होंने चीरफाड़ शुरू कर तस्वीर का दूसरा और असल पहलू भी रेखांकित किया। यह वही काम था, जो किसी समय आम पाठक अपने पत्रों के जरिए संपादकों को लिख भेजा करते थे अौर टीवी में जिसकी कोई गुंजाइश ही कभी नहीं थी। लेकिन सोशल मीडिया ने सारे बंद दरवाजे खोल दिए हैं।

नमूने के तौर पर नागरिकता संशोधन कानून पर अलीगढ़-दिल्ली के दो-चार विश्वविद्यालयों के प्रायोजित हंगामों को कुछ जाने-माने एंकरों ने ऐसे पेश किया जैसे देश को नर्क में झोंक रही सरकार के खिलाफ यह पूरे देश के विरोध की नुमाइंदगी है। बहुत शांति से अजित भारती इस हंगामे में दाखिल होंगे। वे हरेक नारे को सुनेंेगे। उनकी तख्तियों पर चमकते स्लोगन को पढ़ेंगे। नारों और तख्तियों की जड़ में जाकर बताएंगे कि ये हैं कौन लोग? किस मानसिकता के हैं? इनकी बौखलाहट क्यों है? इन पगलाए हुओं के पीछे किनके शातिर दिमाग सक्रिय हैं और शाम ढलते ही एंकर साहब के उदर में प्राइम टाइम तकलीफ की वजह क्या है?

एक ताजा गौरतलब वीडियो में इसी मसले की पोस्टमार्टम रिपोर्ट है। विश्वविद्यालय के उग्र युवाओं के हंगामे में वे एक पोस्टर देखते हैं, जिस पर खिलाफत 2.0 लिखा है। एक नारा उनके राडार पर दर्ज होता है, जिसकी आखिरी लाइन है-ला इलाह इल्ललल्ला...। अजित भारती झाड़ूमार अंदाज में बताएंगे कि इन नारों में गला फाड़ने वालों के सिर पर कश्मीर का भूत सवार है-हमें चाहिए आजादी...। वे पूछेंगे कि किससे आजादी का प्रश्न खड़ा किया जा रहा है? यह भाषा किसकी है? और अगर सरकार कुछ ऐसा कर भी रही है, जो ठीक नहीं है तो उसके विरोध में कलमा क्यों पढ़ा जा रहा है? कलमा कौन पढ़ना चाहता है? खिलाफत 2.0 की आयत अरब की बजाए भारत की धरती पर कौन उतार रहा है?

सतह के नीचे तह में जाकर अजित भारती इन प्रायोजित हंगामों के अदृश्य रचनाकारों और टीवी की बहसों में मैगसेसे की गंभीर छाया में मुखर नाटकीय आवाजों की धज्जियां उड़ा देते हैं। एक समय अखबार के संपादक अपने सटीक संपादकीयों में यही काम करते थे। जब लिखने की आजादी भी छिन जाती थी तो वे कोरे संपादकीय छोड़ देते थे और संपादकीय की वह खाली जगह बहुत मारक असर करती थी। किसी कठोर से कठोर लिखे हुए से भी ज्यादा घातक असर।

बहुत आसान है कि सच्चाई की तह में जाने के ऐसे किसी भी प्रयास में बेनकाब चेहरे यह तोहमतें जड़ें कि अजित भारती उनमें से हैं, जिन्हें फलां या ढिकां दलबल की आईटी सेल से माल मिलता है या वे किसी विचार विशेष के लिए काम करते हैं। लेकिन ये सारी कीचड़ उछाल तोहमतें उनके उन तर्कों का कोई जवाब नहीं हैं, जो वे खोजकर लाते हैं। कोई बताए कि विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले 22-24 साल के युवाओं को किससे आजादी चाहिए? कौन मनुवाद फैला रहा है? ये ला इलाह इल्लल्लाह का मंत्रोच्चारण क्यों चल रहा है? ये खिलाफत 2.0 क्या बला है? क्या महात्मा गांधी के खिलाफत अांदाेलन के सौ साल बाद गांधी सरनेमधारी किसी माई के लाल ने फिर से खिलाफत आंदोलन शुरू कर दिया है? अभी-अभी एक खलीफा सीरिया में कुत्ते की मौत मरा है।

आप अजित से असहमत हो सकते हैं। उनकी भाषा या प्रस्तुति में कहीं कुछ खोट भी निकाल सकते हैं। लेकिन उनके कंटेंट तब भी विचारणीय हैं। आज नगद कल उधार। वे उसी दिन तस्वीर का दूसरा पहलू सामने रखने के साथ उन चतुर-चालाकों की पोलपट्‌टी भी खोल देते हैं, जिन्होंने अपनी एकांगी सोच से पत्रकारिता का भी काफी अहित किया है और जो यह मानकर बैठे हैं कि केंद्रीय सत्ता में छह साल पहले आए बदलाव देश के दूरगामी हित में नहीं हैं। देश जैसा चल रहा था, वही ठीक था। जो चला रहे थे, वही अंंतिम आदर्श थे। देश अब टॉप गियर में रसातल में जा रहा है। इसलिए कहीं कुछ भी हो, दो ही शख्स देश को गर्त में धकेलने के लिए जिम्मेदार हैं। इसलिए दोनों पर जमकर जहर उगलो। असली-नकली मसलों को हवा दो। घेरते ही रहो। दो-चार विश्वविद्यालयों की सिरफिरी आवाजों को सवा सौ करोड़ की आवाज बताओे।

जबकि सब उलट चुका है। अब स्वाधीनता संघर्ष में अपने पुरखों के योगदान की दम पर सत्ता में चाैथी पीढ़ी की अनुकंपा नियुक्ति का समय गया। सेक्युलरिज्म के नाम पर कालातीत हो चुके वामपंथी विचारों की कलई जेएनयू या एएमयू जैसा हर आंदोलन और अच्छे से खोल रहा है। जो खिलाफत 2.0 का मध्ययुगीन खूनी ख्वाब अपने दुष्ट दिमागों में सजाए हैं, उन्हें भी ठंडे दिमाग से सोचने का समय है कि साठ साल से उन्हें वोट बैंक बनाकर ठगा किसने? वे खड़े किस जमीन पर हैं? अजित भारती को अगले किसी अंक में जरा इनके सदियों तक बेइज्जत हुए बदकिस्मत पुरखों की ऐतिहासिक पड़ताल भी कर देनी चाहिए। जिस कलमे की एक पंक्ति वे विश्वविद्यालयों में गा-गवा रहे हैं, किसी अभागी सदी में वह गाकर गले नहीं उतारी गई थी।

जो भी हो, आम आदमी यह समझ रहा है कि मजहब के आधार पर बांटने के बावजूद यह देश घुसपैठियों के लिए एक खुली धर्मशाला नहीं होनी चाहिए। लोगों की आंखें बंद नहीं हैं, जो उन्हें यह दिखाई न दे कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में बचे-खुचे अल्पसंख्यक किस तरह का नर्क भोग रहे हैं? उन्हें यह भी दिखाई-सुनाई दिया है कि यहां सब्सिडी पर हज का सवाब किसने कमाया, इमामों की तनख्वाहें किसने बांटी, कब्रस्तानों की रखवाली में कौन लगा? साठ साल तक रौनकदार इफ्तार पार्टियों का खिला हुआ मौसम भी सबने देखा है।

पता नहीं अभी तक किसी नामी न्यूज़ चैनल का ध्यान उन पर क्यों नहीं गया है। वे वाक़ई बहुत काम के हो सकते हैं। एक घंटे का एक टाइम स्लॉट मिल जाए तो न्यूज चैनलों से बिदके दर्शकों को कुछ तो नया और तरोताजा प्राप्त हो। उन्हें लोग चाव से देख-सुन और सराह रहे हैं। किसी भी चैनल पर घिसे-पिटे, लिपे-पुते और चुके हुए चेहरों के पास नया कुछ बचा नहीं है। सब खोखले हैं।

यह तय है कि पुराने ढर्रे की खुश करो और सत्ता में बने रहो की राजनीति अब एक्सपायरी डेट की दवाई है, जिसे सत्ता से बेदखल हुए सेक्युलर तबके के नीम-हकीम अब तक परचों पर लिखे जा रहे हैं। वे हर दिन कोई परचा लिख रहे हैं और अजित भारती हर वीडियो में उस परचे की चीरफाड़ करके सच बता रहे हैं। अलीगढ़ छाप हकीमों का दाढ़ी नोंचना मुनासिब है। दवाओं के रिएक्शन सेहत के लिए घातक हैं।

सिर्फ़ अपने बूते अजित इस समय अवाम की वह आवाज़ हैं, जिसे अख़बार या चैनलों में कहींजगह नहीं हैं, और देश यही सुनना चाहता है। झूठ के शोर में सच को तलाशती एक उम्मीद!

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विजय मनोहर तिवारी

मध्यप्रदेश में सागर जिले के मंडी बामौरा नाम के कस्बे में पैदा हुए। स्कूली पढ़ाई मंडी बामौरा और शिवपुरी में की। 1991 में विदिशा के एसएसएल जैन पीजी कॉलेज से गणित में फर्स्ट क्लास फर्स्ट एमएससी के बाद एक साल कॉलेज के गणित विभाग में पढ़ाया। लेकिन लिखने का शौक मीडिया में ले लाया। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि के दूसरे बैच के टॉपर हैं। दिल्ली में राष्ट्रीय सहारा में ट्रेनिंग के बाद नईदुनिया इंदौर में रिपोर्टिंग से करिअर की नई शुरुआत। नौ साल प्रिंट में रहने के बाद 2003 में सहारा समय न्यूज चैनल में आए। 2006 में प्रिंट में वापसी दैनिक भास्कर भोपाल के पॉलिटिकल ब्यूरो से। 2010 में दैनिक भास्कर के नेशनल न्यूजरूम में ऑल इंडिया रिपोर्टिंग के लिए चुने गए।

फिर 2015 तक अलग-अलग विषय पर रिपोर्टिंग के लिए पांच साल में लगातार भारत के कोने-कोने की आठ यात्राएं। टीवी और प्रिंट में बीस साल की रिपोर्टिंग के दौरान ऐसे विषयों पर हमेशा पैनी निगाह रही, जिन्हें पांच सौ या हजार शब्दों की खबरों से ज्यादा अहमियत की दरकार थी। यहीं से स्थाई लेखन ने अलग जगह बनाई और छपकर आईं छह किताबें आईं। ये किताबें पत्रकारों और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए गौरतलब दस्तावेज हैं।

अब तक छपी किताबें- 2001 में पहली किताब-प्रिय पाकिस्तान छपी। यह ऐसे आलेखों का संग्रह है, जो छपे हैं, जो नहीं छपे हैं और जो कहीं छप नहीं सकते थे। टीवी में इंदिरा सागर बांध में डूबे हरसूद शहर की लाइव रिपोर्टिंग पर 20005 में प्रकाशित चर्चित किताब-हरसूद 30 जून-को भारतेंदु हरिश्चंद्र अवार्ड मिला। एनएसडी ने इस पर नाटक लिखा। मशहूर कथाकार कमलेश्वर ने इस किताब से प्रेरित होकर एक कहानी लिखी, जिसमें विजय मनोहर तिवारी को ही एक किरदार बनाया।

2008 में समकालीन राजनीति पर दिलचस्प उपन्यास-एक साध्वी की सत्ता कथा प्रकाशित। 2010 में वरिष्ठ पत्रकार राहुल बारपुते पर एक मोनोग्राफ लिखा। इसी साल अदालत से भोपाल गैस हादसे का फैसला आने पर लिखी-आधी रात का सच। पांच साल तक भारत भर की लगातार यात्राओं पर 2016 में छपी-भारत की खोज में मेरे पांच साल। भोपाल के भारत भवन में इस किताब का लोकार्पण करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने कहा-यह किताब प्रामाणिक पत्रकारिता का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें सच को सच की तरह सामने लाया गया है। यह किताब इक्कीसवीं सदी के भारत को हर रंग-रूप और हर माहौल-मूड में सामने लाती है। इंदौर लिटरेचर फेस्टीवल-2016 में यह यात्रा वृत्तांत चर्चित रहा, जहां तारेक फतेह, अमीश त्रिपाठी और कुमार विश्वास जैसी जानी-मानी हस्तियो ने शिरकत की। पत्रकारिता के कई अवार्ड मिले हैं। सभी किताबों की देश के मीडिया में चर्चा, समीक्षाएं हुईं हैं।

पुरस्कार: हरसूद 30 जून के लिए राष्ट्रीय भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार, गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान और यात्रा वृत्तांत के लिए मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी पुरस्कार। इसके अलावा श्रेष्ठ रिपोर्टिंग के कई पुरस्कार।