सवर्णों के 'भारत बंद' को  ‍किस खुली  कुंजी से नापे

सवर्णों के 'भारत बंद' को ‍किस खुली कुंजी से नापे

अगर ‍किसी बंद को उसमें होने वाली हिंसा, आगजनी तोड़फोड़ और जनधन हानि में ही मापा जाए तो सवर्णों के आव्हान पर 6 सिंतबर को आ‍योजित 'भारत बंद' शायद उतना 'सफल' नहीं कहलाएगा, जितना कि ऐसे पूर्ववर्ती बंद के नतीजों को देखकर निष्कर्ष निकाला गया था।  इसमें प्रतिहिंसा का भी डर था। मप्र जैसे राज्यों में जहां तीन माह बाद चुनाव हैं और जहां पिछले दलित भारत बंद के दौरान  काफी‍ हिंसा हुई थी, भारत बंद मोटे तौर पर'अनुशासित' ही रहा। बिहार अौर  राजस्थान जैसे राज्यों में जरूर हिंसा हुई।  यहां मंत्रियों  का  अपने ही समाज  में  ‍िनकलना  दूभर हो गया।  वो पु‍िलस के घेरे  में  ‍िनकलने  का साहस  कर पा रहे हैं।  उनके  ‍िलए जवाब देना मु‍िश्कल हो रहा है।  ध्यान  रहे  ‍िक यह भारत बंद अगड़ी जातियों  के कई संगठनों  ने मिलकर बुलाया था। बंद  मुख्‍य कारण केन्द्र की मोदी सरकार द्वारा एससी/एसटी एक्ट में संशोधन  कर उसे और ज्यादा कठोर बनाना और साथ में सरकारी नौकरियों में प्रमोशन मेंआरक्षण का मुददा् था। इन दोनो कानूनों और नियमों से पिछड़े वर्ग में अाने वाली जातियां  भी उतनी ही प्रभावित हो रही हैं लेकिन उन्होने बंद से सुरक्षित दूरी बनाए रखी। लिहाजा इसे सवर्णों  का बंद ही माना गया। अमूमन लोगों ने भी बंद का समर्थन किया, क्योंकि पंगा कोई नहीं चाहता।

सवर्ण की सफलता और नाकामी से भी ज्यादा बड़ा सवाल यह है कि ऐसी स्थिति क्यों बनी और अब देश की सामाजिक और राजनीतिक धारा कौन सा गंभीर मोड़ लेनेवाली है। इस देश में आजादी के पहले तक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सत्ता  मोटे तौर पर उन्ही जातियों  के हाथ में थी, जिन्हें  आजकल  अगड़ी या सवर्ण जातियां कहा जाता है। सवर्णों ने अन्य  जातियों  का शोषण भले किया हो, लेकिन उनमें एक दायित्व बोध भी रहता आया है।  यही कारण है कि आजादी के बाद दलितों, वंचितों के लिए आरक्षण की पहल भी इसी वर्ग ने की। कुछ रूढि़वादियों के पुरजोर विरोध के बावजूद की। उन्हें सवर्ण, अगड़े,प्रभुत्वशाली आदि कई शब्दों से नवाजा गया, लताड़ा भी गया। इसके बाद भी सवर्णों  ने सड़कों पर आकर कभी इतने  बड़े पैमाने पर आक्रोश नहीं जताया।  यहां तक कि मंडल कमंडल आंदोलन के दौरान पिछड़ों को आरक्षण का विरोध जरूर आ, लेकिन आत्म प्रवंचना  का भाव ज्यादा था। कुछ लोगों  ने आत्मदाह वगैर भी किए। लेकिन सवर्णों के बड़े तबके ने यही माना कि जिनके साथ अन्याय हुआ, उन्हें न्याय मिलना चाहिए। यह जानकर भी कि न्यायदान की यह रोटी उन्हें  अपने हिस्से से ही काटकर  देनी है। अमूमन सवर्ण अपने आप को सवर्ण कहलाने की जगह विशिष्ट जाति या उपजाति का कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं। दलितों, पिछड़ों या आदिवासी जैसी सामूहिकता अथवा सामूहिक पहचान में   अपनी  जातीय सुरक्षा देखने  का भाव उनमें नहीं के बराबर ही रहा है। कई लोग इसके पीछे उनका अहंभाव, आत्मश्रेष्ठता का आग्रह अथवा स्वयंभू होने का मुगालता भी मान सकते हैं। यह भी कि सवर्ण स्वयं को सामाजिक और राजनीतिक सत्ता के स्थायी संचालक के रूप में ही मानते आए हैं, इसलिए उन्होने  अपने आप को सवर्ण  के एक राजनीतिक दायरे में बंधकर  देखने की कोशिश कम ही की है। यह पहला मौका था, जब ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य, कायस्थ और समकक्ष जातियों ने सवर्ण बैनर तले अपनी राजनीतिक और संख्यात्मक ताकत दिखाने का साहस
किया। यह शक्ति प्रदर्शन उद्दंडता  से नहीं, अस्तित्व बचाने की विवशता के कारण ज्यादा हुआ है। अगर संख्‍या की बात करें तो भारत में सवर्ण जातियों  की संख्या ठीक ठीक कितनी है, इसे बताना मुश्किल है। लेकिन फिर भी इन जातियों की कुल संख्या 30 करोड़ के आसपास मानी जाती है। यह वोट बैंक दलों, दिलों और दिमागों में बंटा हुआ है, इसलिए उसकी सामू‍हिक ताकत का पता एकदम नहीं चलता। चूं‍कि वे अभी भी समाज के नियंता की भूमिका में हैं,  इसलिए वो रास्ते  पर उतरकर अपनी पीड़ा और अभिलाषाअों को व्यक्त करने से बचते रहे हैं। अलबत्ता  छोटे समूहों, उपसमूहों में सवर्णो का शक्ति प्रदर्शन जरूर होता रहा है, जिसे बाकी सवर्ण समूहों ने ही ज्यादा तवज्जो कभी नहीं दी।

आजादी  के बाद संभवत: पहली बार ऐसा हुआ है कि हिंदुअो में अक्सर आलोचना का शिकार रही जातियों ने सड़क पर उतरकर अपने  आक्रोश का इतना बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया। उन्होने पहली बार खुलकर कहा कि हिंदुअों को  एक करने की चाहत रखने वाली सरकार  हिंदुअों को खांचे में बांटकर  फैसले कर रही है। सामाजिक दरार को सौहार्द से पाटने के बजाए उनमें वोटों का विस्फोटक मसाला भरा जा रहा है। जिन मामलों में सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की दुहाई देती रही है,वही सरकार एससी/एसटी एक्ट मामले में वही कर रही है, जो शाह बानों के मुस्लिम महिला  हितैषी फैसले को पटलने  के लिए कांग्रेस ने किया था और बाद में अपनी  राजनीतिक कब्र खुद खोद ली थी। क्या आज भाजपा उसी रास्ते पर नहीं चल रही है?कहा जा सकता है कि एससी एक्ट को सुप्रीम कोर्ट द्वारा शिथिल किए जाने से सरकार की छवि दलित विरोधी बन रही थी, लेकिन ऐसा तो तब भी हो रहा था, देश में दलितों की खुले आम पिटाई हो रही थी, गोहत्या के नाम पर उनसे रोजगार छीने  जा रहे थे, दलित विरोधी हिंसा पर शीर्ष नेता सुविचारित  मौन साधे हुए थे। ऐसे मामलों में कार्रवाई हुई भी इतनी देरी से कि दलितों में यह संदेश जाने लगा कि यह सवर्णवादी सरकार है। जबकि वास्तविकता कुछ और ही थी। जो पार्टी  के कोर मुददे रहे हैं, जैसे कि राम मंदिर, धारा 377 और काॅमन सिविल कोड आदि पर सरकार अदालत के आदेश और निर्देशों का सिर झुकाए इंतजार कर रही है। जो वो कहेगी, वही  गा। लेकिन जो तार्किक फैसला सर्वोच्च अदालत ने सुनाया, उसे  पलटने में सरकार ने जरूरत से ज्यादा  उत्साह दिखाया, क्योंकि देश की 25  फीसदी आबादी और  उनके थोकबंद वोटों  का सवाल था। यह बात अलग है कि इतना सब कुछ करने के बाद वो वोट  भाजपा को ‍िमलेंगे भी या नहीं। या फिर सब  'माया मिली न राम' जैसी स्थिति बनने वाली है। सवणों का यह आक्रोश इस बात की निशानी है कि अब पानी सिर के  ऊपर जा रहा है। वरना समाज का जो तबका हमेशा से नियंता की भूमिका में रहता आया है, वह  क्रुद्ध याचक की तरह सड़क पर आकर जिंदाबाद मुर्दाबाद क्यों  करेगा? पहली बार उसे इस बात का गहराई से भान हुआ कि अन्याय उसके साथ भी हो सकता है, हो रहा है। हो सकता  कि कुछ विघ्न संतोषी इसमें भी परपीड़न का सुख  खोजें, लेकिन जो हो रहा है, वह हिंदुत्व के छाते में बन रहे सुराख के फैलते जाने  की चेतावनी है। यह सिलसिला  यहीं थमे तो अच्छा है, यह चिंगारी इसी राख में दब जाए तो बेहतर है, यह आक्रोश इसी मोड़ पर थम जाए तो राहतभरा है, लेकिन अगर यह आग इसी तरह फैलती जाएगी  तो पूरे देश का  नुकसान है। यह उन ताकतों और संगठनों के लिए भी गंभीर चेतावनी है, जो  एक धर्म, एक संस्कृति और एक परंपरा में भरोसा रखते हैं। जो हिंदू समाज के अंतर्विरोधों का समाधान बहुत सरल समीकरणों  में खोज कर उसे ही अंतिम सत्य मान लेते हैं।

दिक्कत यह है कि इतिहास कभी सरल रेखा में नहीं चलता। वर्तमान भी उसी से अनुप्राणित होता है। हिंदू समाज को वोटों में तौलने और नापने  वालों को समझना चाहिए कि विभाजन की रेखाअों का कोई अंत नहीं है। बल्कि समूची संस्कृति का अंत ही विभाजक आग्रहों का अंत है। क्षुद्र राजनीतिक  स्वार्थों के लिए जो हो रहा है या किया जा रहा है, वह हिंदू समाज के नए  ध्रुवीकरण और अपूरणीय बंटवारे  की  अोर  ले जाता  है।  क्या  अब हम ‍हिन्दू  समाज  में जा‍ितयों की  अंत‍िनभर्रता  के  उसे महीन  धागे  को भी   ध्वस्त  कर देना  चाहते  हैं,  ‍िजसकी  बु‍‍िनयाद  पर ही ‍‍हिन्दू एकता का सपनीला ‍िवतान  रचा गया  था?

 

 

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अजय बोकिल

जन्म तिथि : 17/07/1958, इंदौर

शिक्षा : एमएस्सी (वनस्पतिशास्त्र), एम.ए. (हिंदी साहित्य)

पता : ई 18/ 45 बंगले,  नार्थ टी टी नगर भोपाल

मो. 9893699939

अनुभव :

पत्रकारिता का 33 वर्ष का अनुभव। शुरूआत प्रभात किरण’ इंदौर में सह संपादक से। इसके बाद नईदुनिया/नवदुनिया में सह संपादक से एसोसिएट संपादक तक। फिर संपादक प्रदेश टुडे पत्रिका। सम्प्रति : वरिष्ठ संपादक ‘सुबह सवेरे।‘

लेखन : 

लोकप्रिय स्तम्भ लेखन, यथा हस्तक्षेप ( सा. राज्य  की नईदुनिया) बतोलेबाज व टेस्ट काॅर्नर ( नवदुनिया) राइट क्लिक सुबह सवेरे।

शोध कार्य : 

पं. माखनलाल  चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि में श्री अरविंद पीठ पर शोध अध्येता के  रूप में कार्य। शोध ग्रंथ ‘श्री अरविंद की संचार अवधारणा’ प्रकाशित।

प्रकाशन : 

कहानी संग्रह ‘पास पडोस’ प्रकाशित। कई रिपोर्ताज व आलेख प्रकाशित। मातृ भाषा मराठी में भी लेखन। दूरदर्शन आकाशवाणी तथा विधानसभा के लिए समीक्षा लेखन।  

पुरस्कार : 

स्व: जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी उत्कृष्ट युवा पुरस्कार, मप्र मराठी साहित्य संघ द्वारा जीवन गौरव पुरस्कार, मप्र मराठी अकादमी द्वारा मराठी प्रतिभा सम्मान व कई और सम्मान।

विदेश यात्रा : 

समकाालीन हिंदी साहित्य सम्मेलन कोलंबो (श्रीलंका)  में सहभागिता। नेपाल व भूटान का भ्रमण।