जैन समाज के पर्युषण पर बोहरा समाज मांसाहार क्यों न करें?

जैन समाज के पर्युषण पर बोहरा समाज मांसाहार क्यों न करें?

इधर, बोहरा समाज के धर्मगुरु सैयदना आलीकदर मुफदल सैफुद्दीन साहब 6 सितंबर को इंदौर आ रहे हैं और उधर जैन समाज का सबसे बड़ा पर्व पर्युषण प्रारंभ हो रहा है। ऐसे में जैन समाज ने बोहरा समाज से अपील की है कि चूंकि जैन समाज का यह पर्व अहिंसा, दया, परोपकार का संदेश फैलाने के लिये होता है तो बोहरा समाज इस दौरान मांसाहार न करे। कमाल की बात है । आखिरकार इस देश के लोगों को क्या होता जा रहा है कि वे अपने धर्म, परंपरा, तीज-त्यौहार को तो अपने ढंग से मनाना चाहते हैं, लेकिन दूसरों से भी उम्मीद करने लगे हैं कि वे भी वैसा ही करें। क्या यह लोकतांत्रिक , व्यावहारिक और तर्कसंगत है? यदि आपके लिये पर्युषण अहमियत रखता है और आप मांसाहर नहीं करते हैं या पर्युषण के दौरान नहीं करते हैं तो अच्छी बात है, लेकिन आप यह कैसे तय कर सकते हैं कि दूसरे समाज के लोग भी उसे अपनायें? आपने भले ही ऐसी अपील भर की हो, कोई जबरदस्ती नहीं कर रहे हो, तब भी यह तो विचारणीय है ही कि बोहरा समाज भी अपने मौला के आगमन को अपने तरीके से उत्सवमय बनायेगा या आपसे पूछकर या आपके बताये अनुसार या आपकी अपेक्षानुसार मनायेगा? 

इन दिनों अपनी बात दूसरों पर थोपने की जैसे होड़ मची है। हर व्यक्ति यह चाहता है कि दूसरे भी उसकी तरह जियेे-मरे, सोचें-खायें-पिये वगैरह, वगैरह। वह बात-बात पर बिना मांगे सलाह देता है और बताता है कि दूसरों को क्या करना चाहिये और क्या नहीं ? जैसे बोहरा समाज के धर्मगुरु सैयदना साहब  इंदौर आ रहे हैं, जहां वे 10 दिन तक वाअज फरमायेंगे। बोहरा समाज के लिये यह बेहद खास मौका है अपने मौला के इस्तकबाल का, दीदार का, उनकी मौजूदगी का। इस्लाम को मानने वाले आम तौर पर अपना हर उस्तव या खास मौका मांसाहार से आयोजित करते हैं । इस्लाम में तो खुदा को खुश करने के लिये बकरे की बलि का प्रावधान है। हाल ही में बकरीद गई और लाखों बकरे देश में बलि चढ़ाये गये। अब उन्हीं दिनों में आपका पर्युषण या मेरी दीवाली या उसका क्रिसमस या चौथे की गुरुनानक जयंती है तो क्या किया जाये ? कौन तय करेगा कि किसे अपना उत्सव कैसे मनाना चाहिये ? 

तो जनाब , किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरे को उत्सव का तरीका बताये । जिसकी जैसी रीत है, उसे वैसे ही उत्सव मनाने का अधिकार है। यह ठीक है कि आप कोई जबरदस्ती नहीं कर रहे, केवल अपील कर रहे हैं तो यह बतायें कि बोहरा समाज के बकरीद या सैयदना साहब के आगमन के समय आपकी दीवाली या पर्युषण आ जाये और बोहरा समाज यह अपील करे कि वैष्णव या जैन समाज कृपया इन दिनों मांसाहार करें तो आपको कैसा लगेगा? 

बेहद बेतुकापन है यह कि आप अपने किसी खास तीज-त्यौहार के मौके पर किसी दूसरे से यह अपील करें कि वह वैसा नहीं करे जैसा वह अक्सर करता है। यह व्यक्ति की निजता का हनन है, उसके अधिकारों पर अतिक्रमण है, उसके अस्तित्व पर हमला है। इस तरह की बातें लंबे समय में आपसी रिश्तों में वैमनस्यता बढ़ायेगी। दिलों को दूर करेगी। दिल में खटास पैदा करेगी। 

आजकल यह चलन सा हो गया है कि किसी का कोई पर्व-परंपरा आई कि कुछ लोगों का नैतिक बोध जागृत हो जाता है, उनके भीतर कुंडली मारकर बैठी संवेदना हिलोरे लेने लग जाती है, उनमें मानवीय सरोकार पैदा हो जाते हैं और वे यह बताने और जताने लगते हैं कि किसी ने क्या करना चाहिये? मौजूदा परिवेश में इस तरह की बातें आपसी रिश्तों में खाई पैदा करने वाली हैं। ये ऐसी बातें हैं जो इस देश के धर्म निरपेक्ष ढांचे मेें बेहद साफ तरीके से परिभाषित की जा चुकी हैं। तब कोई जरुरत नहीं रह जाती है कि आप किसी को जाकर यह बतायें कि वह क्या खाये, क्या नहीं? यदि किसी को शाकाहार या मांसाहार करना है तो वह खुद तय नहीं कर सकता , उसे ये कथित ठेकदार बतायेंगे कि उसे क्या करना है? 

यह तो समझ आता है कि कोई व्यक्ति या समाज आगे होकर यह तय करे कि फलां मौके पर वह कोई फलां काम नहीं करेगा , लेकिन आप चौधरी बनकर किसी समाज से अपील ही करने लग जायेे या जाकर उनसे मिलकर उन्हें बाध्यता भरा आग्रह करें कि वे वैसा न करें  जिससे उनकी भावनायें आहत होती हों। कुछ बातें तो अब नियमित तौर पर होने लगी हैं। जैसे ,दीवाली पर चंद विद्वानों की अपील आती है कि फटाके न चलाये जायें, इससे प्रदूषण फैलता है, शोर होता है । होली पर ये बोलने लगते हैं कि गीली होली न खेलें याने पानी न बहायें, सूखे रंगों से होली खेलें। दिलचस्प यह है कि इस तरह की सारी अपीलें वैष्णव समाज से ही की जाती है। अभी -भी अपील बोहरा समाज से की गई , जो बेहद सहिष्णु, शांत और देशप्रेमी है। मांसाहार करने वाले दूसरे वर्गों से कभी इस तरह की अपील नहीं की जाती । क्योंकि वे अपने मामलों में किसी का हस्तक्षेप बरदाश्त नहीं करते । 

इसलिये बेहतर यही है कि सब अपने तीज-त्यौहार अपने तरीके से मनायें , दूसरो को वैसा करने की सीख-नसीहत न दें तो इस देश का सर्व धर्म समभाव का ढांचा बना रहेगा , वरना वर्ग संघर्ष भडक़ने में ज्यादा देर नहीं लगा करती है।

1 comments      

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  • RAKESH MOHAN SHUKLA 1 year ago
    बहुत ही अच्छा है और सोचने को मजबूर करने वाला लेख आपकी लेखनी को बहुत धन्यवाद

रमण रावल

संपादक - वीकेंड पोस्ट 

स्थानीय संपादक - पीपुल्स समाचार,इंदौर                               

संपादक - चौथासंसार, इंदौर                                                            

प्रधान संपादक - भास्कर टीवी(बीटीवी), इंदौर

शहर संपादक - नईदुनिया, इंदौर

समाचार संपादक - दैनिक भास्कर, इंदौर 

कार्यकारी संपादक  - चौथा संसार, इंदौर  

उप संपादक - नवभारत, इंदौर

साहित्य संपादक - चौथासंसार, इंदौर                                                             

समाचार संपादक - प्रभातकिरण, इंदौर                                                            


1979 से 1981 तक साप्ताहिक अखबार युग प्रभात,स्पूतनिक और दैनिक अखबार इंदौर समाचार में उप संपादक और नगर प्रतिनिधि के दायित्व का निर्वाह किया । 


शिक्षा - वाणिज्य स्नातक (1976), विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन


उल्लेखनीय-

० १९९० में एक दैनिक अखबार के लिये इंदौर के 50 से अधिक उद्योगपतियों , कारोबारियों से साक्षात्कार लेकर उनके उत्थान की दास्तान का प्रकाशन । इंदौर के इतिहास में पहली बार कॉर्पोरेट प्रोफाइल दिया गया।

० अनेक विख्यात हस्तियों का साक्षात्कार-बाबा आमटे,अटल बिहारी वाजपेयी,चंद्रशेखर,चौधरी चरणसिंह,संत लोंगोवाल,हरिवंश राय बच्चन,गुलाम अली,श्रीराम लागू,सदाशिवराव अमरापुरकर,सुनील दत्त,जगदगुरु शंकाराचार्य,दिग्विजयसिंह,कैलाश जोशी,वीरेंद्र कुमार सखलेचा,सुब्रमण्यम स्वामी, लोकमान्य टिळक के प्रपोत्र दीपक टिळक।

० 1984 के आम चुनाव का कवरेज करने उ.प्र. का दौरा,जहां अमेठी,रायबरेली,इलाहाबाद के राजनीतिक समीकरण का जायजा लिया

० अमिताभ बच्चन से साक्षात्कार, 1985

० म.प्र., छत्तीसगढ़ व राजस्थान के विधानसभा चुनाव 2013 के तमाम विश्लेषण सटीक रहे, जिनमें सीटों का भी उल्लेख था।

० 2014 के लोकसभा चुनाव में म.प्र. की सीटों का विश्लेषण शत-प्रतिशत व देश में भाजपा की 260 व गठबंधन की 300 सीटों का सटीक आकलन। साथ ही 2011 से नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना वाले अनेक लेखों का प्रकाशन भी किया, जिसके संकलन की किताब मोदी युग का विमोचन जुलाई 2014 में किया गया। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को भी किताब भेंट की गयी। 


सम्मान- मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्क विभाग द्वारा स्थापित राहुल बारपुते आंचलिक पत्रकाारिता सम्मान-2016 से सम्मानित।


विशेष-  भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा 18 से 20 अगस्त तक मॉरीशस में आयोजित 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में सरकारी प्रतिनिधिमंडल में बतौर सदस्य शरीक।


मनोनयन- म.प्र. शासन के जनसंपर्क विभाग की राज्य स्तरीय पत्रकार अधिमान्यता समिति के दो बार सदस्य मनोनीत।


किताबें- इंदौर के सितारे (2014), इंदौर के सितारे भाग-2(2015) , इंदौर के सितारे भाग-3(2018), मोदी युग(2014), अंगदान(2016) सहित 7 किताबें प्रकाशित ।


भाषा-हिंदी,मराठी,गुजराती,सामान्य अंग्रेजी


रुचि-मानवीय,सामाजिक,राजनीतिक मुद्दों पर लेखन,साक्षात्कार 


संप्रति- भास्कर, नईदुनिया,प्रभातकिरण, दबंग दुनिया, आचरण , लोकमत समाचार , राज एक्सप्रेस, वेबदुनिया , मीडियावाला डॉट इन  आदि में नियमित लेखन।