आंदोलन: किसानों के हक में या मोदी के खिलाफ?

आंदोलन: किसानों के हक में या मोदी के खिलाफ?

मीडियावाला.इन।

इस समय पंजाब में जो लोग(माफ करें, ये किसान नहीं आढ़तिये, राजनीतिक विरोधी और टुकड़़ा-टुकड़ा गैंग हैं)आंदोलन कर रहे हैं, उनका एजेंडा किसानों के हक की पैरवी नहीं नरेंद्र मोदी का विरोध ज्यादा और साफ दिख रहा है। जो भी नये कृषि कानून की थोड़ी सी भी जानकारी रखता होगा या इसका अध्ययन करेगा, वह आसानी से समझ सकेगा कि इससे किसान को कहीं से कहीं तक कोई नुकसान नहीं है। जिस समर्थन मूल्य पर खरीदी को बंद करने की बात प्रमुखता से की जा रही है, उसे खत्म करने का जिक्र तो खैर है ही नहीं, उल्टे किसान को समर्थन मूल्य अधिक मिले, इसलिये बिचौलिये को हटाने का प्रावधान इसमें है। तब सवाल यह है कि लोग क्यों उबले पड़े हैं? आइये, इसे थोड़ा तथ्यों और आंकड़ों की मार्फत समझते हैं?

** सबसे पहली बात तो यह कि केंद्र सरकार द्वारा बनाये गये कृषि कानून को लागू करना या नहीं, यह राज्यों का मसला है। इसके चलते पंजाब ने इसे लागू ही नहीं किया है। तो विरोध क्यों?
** दूसरी बात, समर्थन मूल्य पर कृषि उपज की खरीदी जारी रखने की मांग की जा रही है। इसे बंद किया ही नहीं गया तो विरोध क्यों?
** तीसरी बात, पंजाब देश का अकेला ऐसा राज्य है, जहां किसान की फसल पहले आढ़तिया लेता है, फिर उसी के नाम से सरकारी खरीदी केंद्र पर अपनी तरफ से बेचता है। जिसके बदले वह कमीशन लेता है। तो विरोध क्यों?
** चौथी बात, समर्थन मूल्य पर कृषि उपज की खरीदी 2014 के बाद से लगातार बढ़ रही है, न कि घटी है, तब विरोध क्यों?
** पांचवीं बात, इस देश का केवल 5 से 8 प्रतिशत किसान समर्थन मूल्य पर अपनी उपज सरकारी खरीदी केंद्र पर बेचता है। तो विरोध करने वाले बहुसंख्य किसान कैसे हो गये?
** छठीं बात, पहली सरकारें केवल अनाज खरीदती थी, जबकि मौजूदा सरकार ने तो दलहनों की खरीदी भी शुरू कर दी। तब विरोध क्यों?

सवाल तो और भी हैं, लेकिन उन सहित सबका जवाब एक ही है-साजिशपूर्ण राजनीति। राजनीति में बुराई नहीं, लेकिन जब वह देश के लोकतांत्रिक ढांचे के साथ ही खिलवाड़ पर उतर आये और उसका एकमात्र मकसद झूठ, भ्रम,साजिशें रचकर सत्तारूढ़ दल को बदनाम,हलाकान कर सत्ता से हटाना हो तो वह समूचे देश के लिये आत्मघाती साबित हो सकता है। चूंकि विपक्ष इसे समझता तो है, किंतु वह शूद्र स्वार्थवश नशेड़ी की तरह हर हाल में एक स्थिर सरकार को उखाड़ फेंकने पर आमादा हो जाये तो वही होता है, जो पहले शाहीन बाग में हुआ, जो पश्चिम बंगाल व महाराष्ट्र में टुकड़ों-टुकड़ों में चल रहा है और अब वही मकडज़ाल पंजाब,हरियाणा,दिल्ली की सीमा पर फैलाया जा रहा है।

यह आंदोलन न तो किसानों के हित में है, न किसान कर रहे हैं, न यह राजनीतिक आचरण है। यह ठीक ऐसा ही है कि बाजार में खड़े चार लोग अपना माल न बेच पाने की खुन्नस में एकजुट होकर उस व्यापारी को चोर, कम तौलने वाला, मिलावटी बता रहे हैं, जो अपना सौदा ईमानदारी से, पूरा माल उचित भाव देकर कर रहा है। चूंकि समाज शास्त्र  संख्या बल से प्रभावित होता है तो वह हो रहा है। माहौल को बिगाडऩा उतना ही आसान है, जितना करोड़ों की लागत,हजारों लोगों के श्रम व महीनों-बरसों के समय में कांक्रीट से बने किसी भी ढांचे को डायनामाइट लगाकर पलक झपकते उड़ा देना।

हम टीवी,अखबारों में देख रहे हैं कि बड़ी संख्या में ट्रेक्टर,ट्रक,ट्राले, बोलेरो,तूफान समेत अनेक लक्जरी कारें, मोटर साइकिल लेकर पंजाब के लोग हरियाणा पार कर दिल्ली की सीमा तक आ गये। देश के किसानों के पास इतने साधन कहां से आ गये? देश का 90 प्रतिशत किसान तो वह है, जिसके पास एक बीघा से दो-चार एकड़ तक कृषि भूमि है। उसमें वह अपने परिवार की जरूरत का  अनाज-सब्जियां उगाता है। थोड़ी बहुत ज्यादा होने पर आसपास के हाट बाजार में जाकर उसे बेचता है और अपनी दूसरी जरूरत का सामान हाथोहाथ खरीदकर ले आता है। उसके पास अपने बैल ही मुश्किल से होते हैं तो वह ट्रेक्टर,बाइक,कार कैसे खरीदेगा? याने सक्षम किसान 8-10 प्रतिशत ही हैं। इन्हें भी अपना सारा माल सरकारी खरीद केंद्र पर नहीं बेचना होता है। वह तो अपनी कमजोर फसल, जो कभी अपूर्ण विकसित तो कभी नमी लगी होती है, वह बेचता है। उसे तो खुले बाजार में ज्यादा दाम मिलते हैं तो वह सरकार को उपज क्यों बेचेगा? अलबत्ता, किसी खास मौके पर बाजार में कम दाम होने पर वह जरूर सरकारी खरीदी केंद्र का रूख करता है। सरकार कोई लेवी तो वसूल नहीं रही जो किसान को जबरदस्ती देना ही होती थी।

दरअसल, यह आंदोलन पंजाब और देश के कुछ शातिर धंधेबाजों के साथ उन  राजनीतिक दलों और गैर सरकारी संगठनों(एनजीओ) द्वारा प्रयोजित है, जिनकी दुकानदारी मोदी सरकार में समाप्ति की कगार पर है। इसमें हरी पगड़ी, हरे शर्ट पहने लोग हैं(आप जानते हैं, यह रंग वे लोग पसंद करते हैं, जो मोदी को किसी कीमत पर प्रधानमंत्री देखना नहीं चाहते), टुकड़े-टुकड़े गैंग का सरगना जेएनयू वाला कन्हैया है,नर्मदा घाटी के अमन-चैन को बीस बरस तक बेचैन रखने वाली मेधा पाटकर है,सोशल मीडिया के दम पर अन्ना हजारे के आंदोलन को हाई जैक कर लेने वाले अरविंद केजरीवाल हैं। इनकी डोर थाम रखी है पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने , जो कांग्रेस के सिपहसालार हैं। वह कांग्रेस,जो इस देश के इतिहास में पहली पूर्ण बहुमत वाली एक दल की गैर कांग्रेसी सरकार के अस्तित्व को नकारते हुए परिवार के साम्राज्य को स्थापित करने का शेख चिल्ली ख्वाब दिन में भी देखना जारी रखे हुए है।

अब यदि आंकड़ों की बात करें तो भी कहीं से नहीं लगता कि केंद्र सरकार किसान विरोधी है। मसलन,कांग्रेस सरकार के समय देश मेें 1.68 लाख करोड़ रुपये का गेहूं खरीदा गया था, जो राजग सरकार में 2019-20 में 2.97 लाख करोड़ का खरीदा गया याने 1.77 गुना ज्यादा। जो दालें 645 करोड़ रुपये की खरीदी गई थीं, वे 2019-20 में 49 हजार करोड़ रुपये की खरीदी गईं याने 75 गुना अधिक। जो धान 2.06 लाख करोड़ रुपये का खरीदा जाता था, वह 2019-20 में 4.95 लाख करोड़ रुपये का खरीदा गया याने 2.9 गुना अधिक। तो मोदी सरकार ने समर्थन मूल्य पर खरीदी कम कैसे कर दी?

जिस आढ़तिया प्रथा पर केंद्र सरकार ने प्रहार किया है, वे चूंकि पंजाब में ही अभी-भी फल-फूल रहे हैं तो आंदोलन को खाद-पानी भी वहीं से मिल रहा है। ये वे लोग हैं तो पंजाब की कांग्रेस सरकार में बैठे लोगों की भेंट-पूजा करते हैं तो पंजाब के कांग्रेस नेतृत्व को नमक का हक अदा करते हुए केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ कोई भी उकसाने वाली कार्रवाई को उतावला रहना ही था। साथ में मोदी को फूटी आंख देखना पसंद न करने वालों का वहां जमावड़ा भी स्वाभाविक ही था। आंकड़े बताते हैं कि पंजाब में करीब 40 हजार आढ़तिये हैं।  उनमें से पंजीकृत आढ़तिये 24 हजार हैं। उनको पिछले साल 1650 करोड़ रुपये कमीशन मिला था। इनका पंजाब की 1858 मंडियों पर राज चलता है। इनके सबके शटर गिरने थे तो ऐसे तमाम लोग, जिनके शटर मोदी सरकार में बंद हो चुके हैं या तैयारी है, वे लामबंद होकर अराजक वातावरण बना रहे हैं। यह आंदोलन किसानों का तो बिलकुल नहीं है। देश को अस्थिर करने वाली ताकतें बाहें चढ़ाकर शाहीन बाग के दूसरे अध्याय को मंचित कर रही हैं। देश इन्हें अच्छे से पहचान रहा है। इसलिये हरचंद कोशिशों के बावजूद वह बहकावे में नहीं आ रहा। अब आगे भी देश को अस्थिर करने वाली ऐसी और भी हरकतों से रूबरू होने को तैयार रहना होगा।

#Kisan Agitation

#Narendra Singh Tomar 

#Raman Rawal

RB

 

 

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रमण रावल

संपादक - वीकेंड पोस्ट 

स्थानीय संपादक - पीपुल्स समाचार,इंदौर                               

संपादक - चौथासंसार, इंदौर                                                            

प्रधान संपादक - भास्कर टीवी(बीटीवी), इंदौर

शहर संपादक - नईदुनिया, इंदौर

समाचार संपादक - दैनिक भास्कर, इंदौर 

कार्यकारी संपादक  - चौथा संसार, इंदौर  

उप संपादक - नवभारत, इंदौर

साहित्य संपादक - चौथासंसार, इंदौर                                                             

समाचार संपादक - प्रभातकिरण, इंदौर                                                            


1979 से 1981 तक साप्ताहिक अखबार युग प्रभात,स्पूतनिक और दैनिक अखबार इंदौर समाचार में उप संपादक और नगर प्रतिनिधि के दायित्व का निर्वाह किया । 


शिक्षा - वाणिज्य स्नातक (1976), विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन


उल्लेखनीय-

० 1990 में  दैनिक नवभारत के लिये इंदौर के 50 से अधिक उद्योगपतियों , कारोबारियों से साक्षात्कार लेकर उनके उत्थान की दास्तान का प्रकाशन । इंदौर के इतिहास में पहली बार कॉर्पोरेट प्रोफाइल दिया गया।

० अनेक विख्यात हस्तियों का साक्षात्कार-बाबा आमटे,अटल बिहारी वाजपेयी,चंद्रशेखर,चौधरी चरणसिंह,संत लोंगोवाल,हरिवंश राय बच्चन,गुलाम अली,श्रीराम लागू,सदाशिवराव अमरापुरकर,सुनील दत्त,जगदगुरु शंकाराचार्य,दिग्विजयसिंह,कैलाश जोशी,वीरेंद्र कुमार सखलेचा,सुब्रमण्यम स्वामी, लोकमान्य टिळक के प्रपोत्र दीपक टिळक।

० 1984 के आम चुनाव का कवरेज करने उ.प्र. का दौरा,जहां अमेठी,रायबरेली,इलाहाबाद के राजनीतिक समीकरण का जायजा लिया।

० अमिताभ बच्चन से साक्षात्कार, 1985।

० 2011 से नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना वाले अनेक लेखों का विभिन्न अखबारों में प्रकाशन, जिसके संकलन की किताब मोदी युग का विमोचन जुलाई 2014 में किया गया। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को भी किताब भेंट की गयी। 2019 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के एक माह के भीतर किताब युग-युग मोदी का प्रकाशन 23 जून 2019 को।

सम्मान- मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्क विभाग द्वारा स्थापित राहुल बारपुते आंचलिक पत्रकारिता सम्मान-2016 से सम्मानित।

विशेष-  भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा 18 से 20 अगस्त तक मॉरीशस में आयोजित 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में सरकारी प्रतिनिधिमंडल में बतौर सदस्य शरीक।

मनोनयन- म.प्र. शासन के जनसंपर्क विभाग की राज्य स्तरीय पत्रकार अधिमान्यता समिति के दो बार सदस्य मनोनीत।

किताबें-इंदौर के सितारे(2014),इंदौर के सितारे भाग-2(2015),इंदौर के सितारे भाग 3(2018), मोदी युग(2014), अंगदान(2016) , युग-युग मोदी(2019) सहित 8 किताबें प्रकाशित ।

भाषा-हिंदी,मराठी,गुजराती,सामान्य अंग्रेजी।

रुचि-मानवीय,सामाजिक,राजनीतिक मुद्दों पर लेखन,साक्षात्कार ।

संप्रति- 2014 से बतौर स्वतंत्र पत्रकार भास्कर, नईदुनिया,प्रभातकिरण,अग्निबाण, चौथा संसार,दबंग दुनिया,पीपुल्स समाचार,आचरण , लोकमत समाचार , राज एक्सप्रेस, वेबदुनिया , मीडियावाला डॉट इन  आदि में लेखन।