लीक से हटकर है अनुभव सिन्हा की ‘आर्टिकल 15’

लीक से हटकर है अनुभव सिन्हा की ‘आर्टिकल 15’

मीडियावाला.इन।

फिल्म समीक्षा : आर्टिकल 15

जो लोग केवल मनोरंजन के लिए फिल्में देखते है, वे आर्टिकल 15 न देखें। इसमें आम मसाला फिल्मों जैसा कोई मसाला नहीं है। न फूहड़ता, न किसिंग सीन, न फाइटिंग, न नाच-गाने, लेकिन फिर भी यह फिल्म देखने लायक है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 15 कहता है कि इस देश में धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी एक के भी आधार पर किसी भी व्यक्ति से कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद देश में भेदभाव जारी है। यही बात फिल्म कहती है। 

: आर्टिकल 15 के लिए इमेज परिणाम

फिल्म बताती है कि भले ही प्रधानमंत्री कहे कि भारत दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है, भारत अंतरिक्ष में उपलब्धियां हासिल कर चुका है, भारत के पास बेहद सामरिक क्षमता है, लेकिन अब भी भारत में संविधान के अनुच्छेद 15 का पालन नहीं हो रहा। फिल्म जातिवाद की हैवानियत को बताती है और शहरों से दूर उत्तरप्रदेश के रिमोट क्षेत्र की व्यवस्था का वर्णन करती है। पूरी फिल्म एक नए-नए आईपीएस पर आधारित है, जो उत्तरप्रदेश के लालगांव में अपर एसपी बनकर पहुंचता है। दिल्ली और विदेश में रह चुका हीरो पुलिस की नौकरी में न्याय के लिए लड़ना शुरू करता है। उसे लगता है कि पूरा पुलिस महकमा ही ब्राह्मण, ठाकुर, जाट, यादव, एससी, एसटी में बंटा हुआ है। यहां तक कि अजा और अजजा के लोगों में भी जातिवाद इतना ज्यादा है कि वे एक-दूसरे की जाति देखकर व्यवहार करते हैं। गांव की दो लड़कियां फांसी पर लटकी मिलती है और एक लड़की गायब रहती है। पुलिस महकमे के लोग उसे सलाह देते है कि अपने काम से काम रखे, लेकिन हीरो मामले की तह में जाने की कोशिश करता है। 

: आर्टिकल 15 के लिए इमेज परिणाम

आर्टिकल 15 को समानांतर फिल्म कहा जा सकता है। जिस तरह व्यावसायिक फिल्मों का फॉर्मूला होता है, उसी तरह समानांतर फिल्मों का भी एक फॉर्मूला होता है। सो इस फिल्म में भी है। गांव, शोषण, सवर्ण, हरिजन, महंत, ब्यूरोक्रेसी, शोषित युवतियां, मर्डर, रेप और थोड़े बहुत भाषण। जिन लोगों के बारे में फिल्म बनाई गई है, फिल्म वहां तक तो शायद ही पहुंचेगी। फिल्म में हीरो-हीरोइन है, लेकिन उनके बीच गोविंदा या अक्षय कुमार टाइप रोमांस नहीं होता। वे थोड़े बुद्धिजीवी टाइप है। पिता के कहने पर हीरो यूपीएससी की परीक्षा देता है और आईपीएस बन जाता है, उसके साथी पिछड़ जाते है। पर हीरो तो हीरो है, वह जाति, वर्ग, धर्म आदि के पचड़ों में नहीं पड़ता। न ही उसकी प्रेमिका पड़ती है। हीरो आईपीएस है और उसकी प्रेमिका पत्रकार और लेखक। दोनों एक-दूसरे के पूरक रहते है। 

: आर्टिकल 15 के लिए इमेज परिणाम

पूरी फिल्म में अनुभव सिन्हा ने बातों ही बातों में उन मुद्दों को भी छू लिया है, जिन्हें आमतौर पर दूसरे निर्देशक छूना पसंद नहीं करते। जब वे जाति की बात करते है, तब बताते है कि अनुसूचित जाति में भी भेदभाव होता है, उनके भीतर भी ऊपर और नीचे की जाति है। ब्राह्मणों में भी कान्यकुब्ज ब्राह्मण है, जो अपने आप को सबसे ऊंचा समझते है, सरयूपारीण ब्राह्मण उससे छोटे होते है, जो हीरो है। फिल्म में हीरो का नाम अयान रंजन रखा गया है। जिससे एकदम स्पष्ट पता नहीं चलता कि वे किस जाति का है, लेकिन पोस्टिंग होते ही सबको पता होता है कि वह किस जाति का है। 

आईपीएस अधिकारियों की ट्रेनिंग ही इस तरह होती है कि वे अपनी भूमिका अच्छे से निभा सकते हैं, लेकिन फिल्म में हीरो आयुष्मान खुराना को कच्चा खिलाड़ी दिखाया गया है। कहानी के माध्यम से फिल्म समाज में असमानता की परते उधेड़ती जाती है। डायरेक्टर अनुभव सिन्हा और पटकथा लेखक गौरव सोलंकी पूरे समय पर्दे पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते है। हास्य भी कहानी से ही उपजता है और दमदार संवाद दर्शकों को बांधे रखते है। फिल्म की सिनेमैटोग्रॉफी और बैकग्राउंड म्युजिक दृश्यों को जीवंत बनाते है। फिल्म की शुरुआत होती है, कॉमरेडों द्वारा गाये जाने वाले लोकगीत से और समापन होते-होते दर्शक अपनी बात रैप में कहने लगता है। फिल्म का एक दृश्य इंटरवल के पहले बेहद दमदार बन पड़ा है, जब आईपीएस हीरो अपने कार्यालय में संविधान के अनुच्छेद 15 के पन्ने सूचना पटल पर लगा देता है। अपने सहकर्मियों से वह कहता है कि तुमने जिसकी शपथ ली है, कम से कम उसकी भावना का तो ख्याल रखो। 

फिल्म में ओवरफ्लो हो रहे मेन होल में घुसकर सफाई करते हुए सफाईकर्मी का दृश्य बेहद मार्मिक है। आयुष्मान खुराना ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है, पूरी फिल्म उन्हीं के कंधों पर है। ईषा तलवार, सयानी गुप्ता, मनोज पाहवा, जिशान अय्युब, रोजिन चक्रवर्ती की भी छोटी भूमिका है। कुछ अलग हटकर देखना चाहें तो अच्छी फिल्म हैं।

 

 

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डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी

डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी जाने-माने पत्रकार और ब्लॉगर हैं। वे हिन्दी में सोशल मीडिया के पहले और महत्वपूर्ण विश्लेषक हैं। जब लोग सोशल मीडिया से परिचित भी नहीं थे, तब से वे इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। पत्रकार के रूप में वे 30 से अधिक वर्ष तक नईदुनिया, धर्मयुग, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर आदि पत्र-पत्रिकाओं में कार्य कर चुके हैं। इसके अलावा वे हिन्दी के पहले वेब पोर्टल के संस्थापक संपादक भी हैं। टीवी चैनल पर भी उन्हें कार्य का अनुभव हैं। कह सकते है कि वे एक ऐसे पत्रकार है, जिन्हें प्रिंट, टेलीविजन और वेब मीडिया में कार्य करने का अनुभव हैं। हिन्दी को इंटरनेट पर स्थापित करने में उनकी प्रमुख भूमिका रही हैं। वे जाने-माने ब्लॉगर भी हैं और एबीपी न्यूज चैनल द्वारा उन्हें देश के टॉप-10 ब्लॉगर्स में शामिल कर सम्मानित किया जा चुका हैं। इसके अलावा वे एक ब्लॉगर के रूप में देश के अलावा भूटान और श्रीलंका में भी सम्मानित हो चुके हैं। अमेरिका के रटगर्स विश्वविद्यालय में उन्होंने हिन्दी इंटरनेट पत्रकारिता पर अपना शोध पत्र भी पढ़ा था। हिन्दी इंटरनेट पत्रकारिता पर पीएच-डी करने वाले वे पहले शोधार्थी हैं। अपनी निजी वेबसाइट्स शुरू करने वाले भी वे भारत के पहले पत्रकार हैं, जिनकी वेबसाइट 1999 में शुरू हो चुकी थी। पहले यह वेबसाइट अंग्रेजी में थी और अब हिन्दी में है। 


डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी ने नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर एक किताब भी लिखी, जो केवल चार दिन में लिखी गई और दो दिन में मुद्रित हुई। इस किताब का विमोचन श्री नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के एक दिन पहले 25 मई 2014 को इंदौर प्रेस क्लब में हुआ था। इसके अलावा उन्होंने सोशल मीडिया पर ही डॉ. अमित नागपाल के साथ मिलकर अंग्रेजी में एक किताब पर्सनल ब्रांडिंग, स्टोरी टेलिंग एंड बियांड भी लिखी है, जो केवल छह माह में ही अमेजॉन द्वारा बेस्ट सेलर घोषित की जा चुकी है। अब इस किताब का दूसरा संस्करण भी आ चुका है।