अब देशभक्त की दावेदारी से मुकाबला

अब देशभक्त की दावेदारी से मुकाबला

मीडियावाला.इन।

दिल्ली शहर न्यूयॉर्क, बीजिंग से छोटा हैं| उन शहरों के मेयर कुछ सदस्यों के साथ उन्हें सँभालते हैं| सत्तर के दशक तक दिल्ली का मेयर प्रथम नागरिक की तरह महत्वपूर्ण और सम्मान पता था| विदेशी मेहमान राष्ट्रपति प्रधान मंत्री की अगवानी का दायित्व भी संभालता था| पिछले दो दशकों में चार मेयर, एक उप राज्यपाल, एक मुख्यमंत्री, एक नई दिल्ली नगर पालिका प्रशासक, दिल्ली विकास प्राधिकरण उपाध्यक्ष, सात संसद, फिर विधायक, पार्षद (गिनना पहचानना मुश्किल) दिल्ली को दुरुस्त रखने में लगे समझे जाते हैं| जिसके दरबार में जाएंगे, वह किसी अन्य की जिम्मेदारी बताकर बाहर का रास्ता बता देगा| आलम यह है कि कुछ इलाकों में सड़क के इस पार उस पार के लिए अलग अलग जिम्मेदार , नेता, अफसर, कारिंदे इत्यादि| पानी वाला गड्ढा खोदेगा तो बिजली वाला दो महीने बाद उसे खोदेगा| इलाके में यदि पार्क दो हैं, तो उन पर नगर निगम या प्राधिकरण के अलग अलग हक हैं| सौभाग्य से मुझे दुनिया के प्रमुख देशों की विशाल राजधानियां जाने देखने के अवसर मिले हैं| लेकिन इतनी विकराल व्यवस्था कहीं नहीं देखी और इससे अधिक समस्याएं भी दुनिया में कहीं नहीं| फिर भी मुझ जैसे लाखों लोगों को दिल्ली से प्यार है, गौरव है| अब इस सप्ताह दिल्ली के सबसे बड़े मालिक, आम और खास मुख्यमंत्री अरविन्द  केजरीवाल ने नया नारा उछाला- 'देशभक्त बजट'| तो क्या मुंबई, कोलकाता या पुणे जैसे शहरों के बजट देशभक्त नहीं और देश के दुश्मन बजट होंगे?

 क्रन्तिकारी केजरीवालजी और दिल्ली के उप राज्यपाल के अधिकारों की सीमाओं का विवाद  पिछले साल अदालत पहुँच गया था| सीमा और उत्तरदायित्व को स्पष्ट  करने के लिए अब संसद में एक विधेयक लाया गया है| निश्चित रूप से संविधान और कानूनों में संशोधन के अधिकार संसद के पास होते हैं| अदालतें उसी आधार पर व्याख्या करके निर्णय देती हैं| फिर भी केजरीवाल और उनकी पार्टी ने इसे आज़ादी और लोकतंत्र पर हमला करार दिया है| वे चाहते हैं कि उन्हें मनमाने निर्णय और खर्च की पूरी स्वच्छंदता दी जाए| वे केंद्र  शासित प्रदेश के बजाय पूर्ण राज्य की तरह सारे अधिकार चाहते हैं| यह उनका भ्रम कहा जाए अथवा राजनीतिक महत्वाकांक्षा? वह हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अथवा देश के प्रधान मंत्री तक बनने का सपना देख सकते हैं| उनसे करोड़ों रुपयों का विज्ञापन लेने वाले कुछ संसथान अथवा सर्वे कम्पनियाँ चुनावों के दौरान उन्हें अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों और प्रधान मंत्री के साथ लोकप्रियता की तुलना के लिए रखते भी हैं| लेकिन जब तक दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं बन पाता, तब तक वह अपनी सीमाएं स्वीकारने को क्यों नहीं तैयार रहते? सही बात तो यह है कि दिल्ली में मुंबई की तरह एक महानगरपालिका, एक मेयर से काम चल सकता है| सत्तर के दशक से पहले शान और काम खर्च से चल भी रहा था| लंदन और न्यूयॉर्क में आख़िरकार मेयर अच्छा प्रशासन चला रहे हैं| दिल्ली में तो सब अधिकार, वित्तीय साधन लाभ चाहते हैं, लेकिन जिम्मेदारी दूसरों पर डालते रहते हैं|

 प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 मार्च की दांडी यात्रा का पुण्य स्मरण करते हुए आज़ादी के 75 वर्ष का शंखनाद करते हुए अमृत महोत्स्व का शुभारम्भ किया| वह गाँधी द्वारा दिलाई आज़ादी को अक्षुण्ण रखने, लोकतंत्र को मजबूत करने, कर्तव्यों के पालन की बात भी हमेशा करते हैं| दूसरी तरफ केजरीवाल और कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गाँधी, उनके समर्थक, संगठन और मीडिया का एक वर्ग भी आज़ादी और लोकतंत्र ख़त्म होने  का ढोल बजाते रहते हैं| पराकाष्ठा यह है कि वे दुनिया भर में भारत को पाकिस्तान से भी ख़राब तानाशाही राज और जुल्मों सितम में हिटलर युग से अधिक दयनीय बताने के झूठे अपमानजनक प्रचार में लगे हुए हैं? सत्ता की लड़ाई क्या इस हद तक गिरी हुई और घृणित हो सकती है? दोनों नेता सड़कों पर महीनों के धरनों, आंदोलनों का समर्थन करते, गरीब लोगों को भड़काते घूमते हैं, संसद या अन्य मंचों पर मनचाहा भाषण देते हैं, चुनाव में जीत हार का सामना करते हैं| सरकारी खजाने के अलावा पूँजीपतियों से चंदा लेते हैं, उनसे उद्योग धंधा बढ़ाने का आग्रह करते हैं, वहीं  देश के प्रधान मंत्री और पूरी सरकार को केवल दो चार पूंजीपतियों के लिए ही काम करने का आरोप लगते हैं| ऐसा टकराव क्या किसी अन्य लोकतान्त्रिक देश के जिम्मेदार नेता करते दिखाई देते हैं?

लगभग यही स्थिति पश्चिम बंगाल में दिख रही है| ममता बनर्जी ने बंगाल और बंगालियों की अस्मिता के साथ अन्य दलों के नेताओं और उनके समर्थकों को बाहरी-पराया बताने का अभियान चला रखा है| चुनाव से पहले भी वह केंद्र सरकार और उसके कार्यक्रमों, जान हितकारी योजनाओं तक को स्वीकारने को राजी नहीं होती|  केंद्रीय एजेंसियों को भी नहीं घुसने देती| क्या यह स्वतंत्रता और संविधान का अपमान नहीं है? महाराष्ट्र में शिव सेना वर्षों से राष्ट्र भक्त और हिन्दू रक्षक के ठेकेदार जैसा दावा करती रही, लेकिन हत्या और आतंकवादी जैसे अपराधियों को संरक्षक पुलिस अधिकारीयों का बचाव स्वयं मुख्य मंत्री उद्धव ठाकरे कर रहे हैं| ताजा मामला तो बहुत गंभीर है| पुलिस हिरासत में एक हत्या और अपराधी गिरोह की तरह डरा धमकाकर लोगों से धन वसूलने वाले एक अदने से सहायक पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वाजे को निलंबन के दौरान वर्षों तक शिव सेना के नेता बनाकर रखना और 16 साल बाद रातों रात निलंबन रद्द कर अपराध अन्वेषण विभाग का जिम्मा सौंप देना क्या उचित कहा जा सकता है ? फिर देश के सबसे बड़े उद्योगपति के निवास के बाहर आतंकी हथियार सामग्री  वाली गाड़ी और धमकी भरे पत्र बरामद होने के बाद एक व्यक्ति की हत्या के आरोपी का बीस दिनों तक बचाव और केंद्रीय जाँच एजेंसियों का प्राम्भिक विरोध सम्पूर्ण संघीय व्यवस्था को चुनौती ही कहा जा सकता है| आजादी के 75 वर्ष में प्रवेश के जश्न के साथ ऐसे गंभीर राजनीतिक विरोध , टकराव और स्वतंत्रता को स्वछंदता की तरह इस्तेमाल के मुद्दों पर गंभीरता से आत्म मंथन की आवश्यकता है|

(लेखक पद्मा श्री से सम्मानित और एडिटर्स गिल्ड के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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आलोक मेहता

पद्मश्री (भारत सरकार) से सम्मानित, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार-पत्रकार सम्मान-2006, दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा श्रेष्ठ लेखन पुरस्कार-1999 पद्मश्री आलोक मेहता हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे "नई दुनिया" के प्रधान सम्पादक हैं।

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