नैसर्गिक अभिनय के 'नटसम्राट' की भूमिका का अंत!

नैसर्गिक अभिनय के 'नटसम्राट' की भूमिका का अंत!

मीडियावाला.इन।

स्मृति शेष : श्रीराम लागू 

जब मैंने 'घरौंदा' फिल्म देखी तब मेरी उम्र बहुत कम थी! इतनी कम कि फिल्म को समझना भी मेरे लिए संभव नहीं था! लेकिन, फिल्म देखने के बाद जिस कलाकार को मैंने पहचाना वो श्रीराम लागू ही थे। फिल्म में जरीना वहाब और अमोल पालेकर के रहते इस अभिनेता ने अपनी अलग ही छाप छोड़ी थी। बड़े होने के बाद मैंने फिल्म को दोबारा देखा, तो वो जहन में ही बस गई! अधेड़ बॉस मिस्टर मोदी की भूमिका में लागू ने अपने अपने का जो प्रभाव छोड़ा था, वो यादगार बन गया! बीमार बॉस अपने ऑफिस में काम करने वाली लड़की जरीना वहाब से बॉस शादी कर लेता है!

जरीना वहाब भी प्यार अमोल पालेकर से प्यार करती है, लेकिन मुंबई में घर पाने के लालच में अपने बीमार बॉस से शादी कर लेती है। लेकिन, धीरे-धीरे अधेड़ और बीमार बॉस और युवा लड़की के बीच प्यार पनपता जाता है और फिल्म नया मोड़ ले लेती है! 'घरौंदा' के लिए श्रीराम लागू को सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेता का फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला था। नसीरुद्दीन शाह ने एक बार कहा था कि श्रीराम लागू की आत्मकथा 'लमाण' एक्टरों के लिए बाइबल की तरह है। श्रीराम लागू का पुणे के दीनानाथ मंगेशकर हॉस्पिटल में निधन हो गया! वे 92 साल के थे। 

श्रीराम लागू ने अपने करियर की शुरुआत 'वो आहट: एक अजीब कहानी' से की थी। ये फिल्म साल 1971 में आई थी। इसके बाद उन्होंने हिंदी फिल्म पिंजरा, मेरे साथ चल, सामना, दौलत जैसी कई शानदार फिल्मों में काम किया। लेकिन, हिंदी दर्शक उन्हें घरोंदा (1977), विधाता (1982), खुद्दार (1994), लावारिस (1981) और काला बाज़ार (1989) में उनके अभिनय से ज्यादा पहचानते हैं। बताया जाता है कि वे पुणे के जिस भवे स्कूल में पढ़ते थे, वहां नाटकों को काफी तवज्जो दी जाती थी! श्रीराम लागू छुपकर लोगों की नकलें उतारा करते थे! जब ये बात सबको मालूम पड़ी तो उन्होंने ही श्रीराम को मंच पर आने के दबाव डाला और यहीं से उनके अभिनेता बनने की कहानी शुरू हुई!

मराठी रंगमंच पर नट सम्राट की उपाधि पाने वाले श्रीराम लागू ने हिंदी और मराठी फिल्मों में कई यादगार रोल किए। 'नटसम्राट' नाटक में उन्होंने गणपत बेलणकर की भूमिका सशक्त भूमिका निभाई थी, जिसे मराठी रंगमंच के लिए मील का पत्थर माना जाता है। गणपत बेलवलकर का रोल मुश्किल माना जाता है। क्योंकि, इस रोल को निभाने वाले बहुत सारे एक्टर बाद में गंभीर रूप से बीमार भी हुए। उन्हें मराठी थिएटर में तो उन्हें 20वीं सदी के सबसे बेहतरीन कलाकारों में गिना जाता है।

सिंहासन, सामना, पिंजरा जैसी मराठी फिल्मों और चलते-चलते, मुकद्दर का सिंकदर, सौतन और 'लावारिस' जैसी कई हिंदी और मराठी फिल्मों में उन्होंने काम किया । रिचर्ड एटनबरो की फिल्म 'गांधी' में गोपाल कृष्ण गोखले का उनका छोटा सा रोल भी हमेशा याद रहता है! उन्होंने यही रोल बचपन में पुणे के अपने स्कूल में भी किया था। सातारा में 16 नवंबर 1927 को जन्मे श्रीराम लागू लम्बे समय से बीमार थे। उन्होंने फिल्मों के अलावा मराठी, हिंदी और गुजराती रंगमंच पर भी काम किया। 20 से अधिक मराठी नाटकों का निर्देशन भी श्रीराम लागू ने किया था। 

RB

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