फास्टैग जुनून: अच्छी नीयत के साथ नजाकत भी चाहिए...

फास्टैग जुनून: अच्छी नीयत के साथ नजाकत भी चाहिए...

मीडियावाला.इन।

कोई भी नई व्यवस्था, कितनी भी अच्छी क्यों न हो,
बगैर पूरी तैयारी के लागू हो तो हालत फास्टैग जैसी हो
जाती है। बीते 15 दिसंबर से पूरे देश में ई टोलिंग की
फास्टैग व्यवस्था लागू हो चुकी है। लेकिन बहुत से
लोगों को इस नई टोल वसूली व्यवस्था के बारे में
ज्यादा जानकारी नहीं है। व्यवस्था जिस तेजी से लागू
की गई है, उससे असमंजस काफी है। इसे लागू करते
वक्त कहा गया था कि फास्टैग से आपकी यात्रा
‘फास्ट’ गति से हो सकेगी। राष्ट्रीय राजमार्गों पर
स्थि‍त टोल नाकों पर टैक्स वसूली में आपका वक्त
जाया नहीं होगा। टोल नाकों पर पैसे चुकाने और रसीद
लेने का झंझट खत्म। बेशक, राजमार्गों पर बेखटके
यात्रा की दृष्टि से यह नई व्यवस्था स्वागत योग्य है,
लेकिन जिस तेजी से इसे लागू किया गया है, उससे कई
व्यावहारिक दिक्कतें आ रही है। सबसे चिंताजनक
शिकायत यह है कि भले आपकी गाड़ी घर पर खड़ी हो,

लेकिन फास्टैग के जरिए आपकी जेब कट जाएगी।
अर्थात अगर आप फास्टैग जेब में रखकर भी घूम रहे हैं
तो इलेक्ट्राॅनिक सेंसर वहां भी कैंची चला देगा। फास्टैग
के बारे में कम या बिल्कुल जानकारी नहीं होने से टोल
पर उन लेनो पर लंबी लाइने लग रही हैं, जहां अभी
भी नकदी जमा कराने की सुविधा है।
पहले फास्टैग के बारे में। फास्टैग दरअसल एक प्री पेड
ई कंट्रोल्ड टोलिंग सिस्टम है, जिससे गाड़ी का टोल
टैक्स खुद ब खुद कट जाता है। भारत सरकार ने इसे
अपने राजमार्गों के 547 टोल नाकों पर लागू किया है।
फास्टैग दरअसल रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन
टेक्नोलॉजी पर आधारित स्टीकर है, जो गाड़ियों के
सामने वाले शीशे पर चिपकाया जाता है। टोल बूथ पर
लगे रेडियो फ्रीक्वेंसी आईडेंटीफाइंग रीडर इसे स्कैन
करते हैं। इससे फायदा यह है कि टोल नाके की लंबी
लाइन में झुंझलाते रहने के बजाए गाड़ी चलाते हुए ही
आपका टोल टैक्स चुका सकते हैं। अर्थात आपकी गाड़ी
बिना रूके चलती रहेगी। इसके लिए सम्बन्‍धित टोल
नाकों पर फास्टैग लेन चि्न्हित की गई हैं। फास्टैग 22
बैंकों, टोल नाकों, पेट्रोल पंपों, टोल प्लाजा और पेटीएम

पर भी मिल रहे हैं। एक फास्टैग की वेलेडिटी पांच साल
तक है। पेमेंट और ड्यू की सूचना आपको एसएमएस से
मिलती है। आपको फास्टैग अपने सेविंग बैंक से लिंक
कराना होता है। फास्टैग में कम से कम 150 रू. का
बैलेंस जरूरी है, वरना यह ब्लैकलिस्ट हो सकता है। एक
फास्टैग केवल एक गाड़ी में काम आएगा। इसे खरीदने
के लिए आपको कुछ न कुछ आईडी‍ दखाना होगा।
फास्टैग अकाउंट में सौ रू. से लेकर 1 लाख रू. तक
रखे जा सकते हैं।
वैसे इस तरह ई-ट्रां‍जेक्शन का विचार सबसे पहले
अमेरिकी नोबेल पुरस्कार विजेता विलियम विक्रे के
दिमाग में 1959 में आया। इसको लेकर काफी प्रयोग
हुए और 1970 में इस सिस्टम का पहला प्रोटो टाइप
दुनिया के सामने आया। विश्व में सबसे पहले इस
प्रणाली को नाॅर्वे ने 1986 में तब लागू किया, जब
हमारे देश में कम्प्यूटरीकरण किया जाए या न किया
जाए, इस पर व्यापक बहस चल रही थी। लोग इस नई
प्रौद्योगिकी को लेकर आशंकित थे। इटली ने 1989 में
अपने राजमार्गों पर ई-टोलिंग सिस्टम को बड़े पैमाने पर
अपने यहां लागू किया। आज यह व्यवस्था विश्व के

अनेक देशों में लागू हो चुकी है। केन्द्रीय सड़क परिवहन
मंत्री नितिन गडकरी को भी उम्मीद है कि भारत में
–‘फास्टैग युग’ आने से न केवल यात्रा ‘फास्ट’ होगी
साथ ही सरकारी खजाना भी तेजी से भरेगा। गडकरी ने
दावा किया फास्टैग लागू होने के बाद देश में कुछ ई-
टोल्स पर कमाई 10 गुना तक बढ़ गई है।
लेकिन इसकी वजह से वाहन चालकों को जो दिक्कतें
हो रही हैं, वो भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। इसका मु्ख्य
कारण फास्टैग के प्रति समुचित जागरूकता और
जिज्ञासा की कमी है। सरकार के आदेश के बाद राष्ट्रीय
राजमार्गों के टोल नाकों पर नकदी पेमेंट की केवल एक
लेन बची है। ऐसे में जानकारी के अभाव में ज्यादा
गाडि़यां इसी लेन से गुजरने पर मजबूर हैं। यानी समय
की बर्बादी और बढ़ गई है। इससे भी बड़ी समस्या है
उन वाहन चालकों और मालिकों की है, जिनके पास
एक से ज्यादा गाडि़यां हैं। वो एक गाड़ी में तो फास्टैग
लगवा लेते हैं और दूसरी का फास्टैग स्टीकर जेब में
रख लेते हैं। वो जब किसी टोल से गुजरते हैं तो जेब में
पड़ा फास्टैग भी अपने आप स्कैन होकर खाते से टोल
राशि कट जाती है। जेब पर टोल का यह अनचाहा

‘डाका’ टालने के लिए कुछ रोमांटिक होते हुए उस
फास्टैग को उसे कपड़े या किताब में ( गुलाब की
मानिंद !) छिपाकर रखना जरूरी है। यह बहुत कम
फास्टैगियों को मालूम है। दूसरे शब्दों में यह नए किस्म
की लेकिन ‘जायज’ लूट है। दूसरे, फास्टैग अकाउंट में
अगर पैसा न हुआ तो नतीजे में आपको टोल से नकदी
की पर्ची कटवानी पड़ेगी। पैसा दोगुना लगेगा और वक्त
की बर्बादी अलग से। ऐसे में कई लोग इस ‘फास्टैग
मुसीबत’ से बचने के लिए लंबी दूरियों वाले रास्ते
अख्तियार कर रहे हैं।
बेशक हर नई व्यवस्था आपके कम्फर्ट जोन को बेरहमी
से तोड़ती है। फास्टैग के साथ भी कुछ ऐसा ही है। जैसे
नकदी लेन-देन से डिजीटल लेन-देन पर जाने में अभी
भी करोड़ों लोगों को दिक्कत आ रही है, कुछ वैसा ही
हाल फास्टैग का भी है। दरअसल मोदी सरकार हर नई
और अच्छी व्यवस्‍था को भी थानेदारी मानसिकता से
लागू करने में ज्यादा यकीन रखती है, फिर चाहे नोटबंदी
हो, जीएसटी हो या फिर नागरिकता संशोधन अधिनियम
ही क्यों न हो। गोया सरकार पर सीखने का वक्त देने
के बजाए ( सबक ) सिखाने का जुनून हावी हो। ऐसे में

कोई भी सिस्टम सहजता और क्रमिकता से लागू होने
के बजाए समस्याअो की बाढ़ में उतराते हुए लागू
होता है।
हालांकि मंत्री गडकरी इसे ‘टीथिंग ट्रबल’ मानते हैं।
बेहतर होता कि फास्टैग सिस्टम को भी देश में
चरणबद्ध प‍द्धति से लागू किया जाता। टोल नाकों
पर फास्टैग की लेने क्रमश: बढ़ाई जातीं। जब लोगों को
लगेगा कि इससे सचमुच समय की बचत हो रही है तो
लोग खुद ही फास्टैग लगाने लगेंगे। फिलहाल तो
दिक्कतें ज्यादा है। धैर्य की दरकार जनता के साथ
सरकार से भी है। अच्छी नीयत के साथ वैसी नजाकत
भी तो चाहिए।

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अजय बोकिल

जन्म तिथि : 17/07/1958, इंदौर

शिक्षा : एमएस्सी (वनस्पतिशास्त्र), एम.ए. (हिंदी साहित्य)

पता : ई 18/ 45 बंगले,  नार्थ टी टी नगर भोपाल

मो. 9893699939

अनुभव :

पत्रकारिता का 33 वर्ष का अनुभव। शुरूआत प्रभात किरण’ इंदौर में सह संपादक से। इसके बाद नईदुनिया/नवदुनिया में सह संपादक से एसोसिएट संपादक तक। फिर संपादक प्रदेश टुडे पत्रिका। सम्प्रति : वरिष्ठ संपादक ‘सुबह सवेरे।‘

लेखन : 

लोकप्रिय स्तम्भ लेखन, यथा हस्तक्षेप ( सा. राज्य  की नईदुनिया) बतोलेबाज व टेस्ट काॅर्नर ( नवदुनिया) राइट क्लिक सुबह सवेरे।

शोध कार्य : 

पं. माखनलाल  चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि में श्री अरविंद पीठ पर शोध अध्येता के  रूप में कार्य। शोध ग्रंथ ‘श्री अरविंद की संचार अवधारणा’ प्रकाशित।

प्रकाशन : 

कहानी संग्रह ‘पास पडोस’ प्रकाशित। कई रिपोर्ताज व आलेख प्रकाशित। मातृ भाषा मराठी में भी लेखन। दूरदर्शन आकाशवाणी तथा विधानसभा के लिए समीक्षा लेखन।  

पुरस्कार : 

स्व: जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी उत्कृष्ट युवा पुरस्कार, मप्र मराठी साहित्य संघ द्वारा जीवन गौरव पुरस्कार, मप्र मराठी अकादमी द्वारा मराठी प्रतिभा सम्मान व कई और सम्मान।

विदेश यात्रा : 

समकाालीन हिंदी साहित्य सम्मेलन कोलंबो (श्रीलंका)  में सहभागिता। नेपाल व भूटान का भ्रमण।