क्या इन इस्तीफों के बाद कांग्रेस का खुद पर भरोसा लौटेगा? 

क्या इन इस्तीफों के बाद कांग्रेस का खुद पर भरोसा लौटेगा? 

मीडियावाला.इन।क्या इन इस्तीफों के बाद कांग्रेस का खुद पर भरोसा लौटेगा? 

देश की सबसे पुरानी और आजादी के बाद सबसे ज्यादा सत्ता में रही कांग्रेस पार्टी में अजब नजारा है। हाल के लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद पार्टी में परााजय की जिम्मेदारी लेकर बड़े पैमाने पर इस्तीफे इसलिए नहीं हो रहे थे कि राहुल गांधी  को अध्यक्ष बनाए रखना है और अब पार्टी में इस्तीफों की झड़ी इसलिए लगी है कि राहुल गांधी को ही पार्टी अध्यक्ष बनाए रखना है। दूसरी तरफ राहुल गांधी हैं कि बतौर पार्टी अध्यक्ष हार की जिम्मेदारी खुद लेकर पद से इस्तीफा देने की ठाने बैठे हैं। पहले कांग्रेसियों को लगा था कि एकाध महीने में राहुल गांधी का मन बदल जाएगा और फिर पार्टी का काम काज देखने लगेंगे। लेकिन लगता है कि राहुल कुछ अलग मिट्टी के बने हैं और इस मिट्टी को कांग्रेस के देसी अखाड़े के पहलवान भी ठीक से बूझ नहीं पा रहे हैं। राहुल को अखाड़े में बनाए रखने का उनका हर दावं फेल होता दिख रहा है। दरअसल राहुल ने दरबारियों के सामने ऐसा यक्ष प्रश्न उछाल दिया है कि उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि ऐसे हालात में क्या करें? 
हालिया लोकसभा चुनाव कांग्रेस ने राहुल गांधी  के नेतृत्व में लड़ा। उनकी मदद के लिए ताबड़तोड़ तरीके से बहन प्रियंका गांधी को पार्टी महासचिव के रूप में पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई। माहौल बना कि भाई-बहन की जो़ड़ी की मेहनत से कांग्रेस के अच्छे दिन आने ही वाले हैं। दोनो ने परिश्रम तो काफी किया,  लेकिन नतीजा लगभग सिफर रहा। जी-तोड़ मेहनत के बाद भी कांग्रेस अपनी सीटों में केवल 8 का ही इजाफा कर पाई। खुद राहुल अमेठी से हारे और पूरे यूपी  के रणक्षेत्र में  रायबरेली सीट ही सोनिया गांधी बचा पाईं। नतीजों ने कांग्रेस की रणनीतिक चूकों को साफ तौर पर उजागर कर दिया। 

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इसके ठीक 5 माह पहले मप्र सहित तीन राज्यों में कांग्रेस  की सत्ता मे वापसी से राहुल गांधी का राजनीतिक ग्राफ बढ़ा था। माना जाने लगा था कि मतदाताअों और खासकर युवाअों में उनकी स्वीकृति बढ़ी है। लेकिन लोकसभा चुनाव में 12 करोड़ मत हासिल करने  के बाद भी सीटों के मामले में कांग्रेस की कंगाली दूर नहीं हुई। 
कांग्रेस में (अब कुछ हद तक बीजेपी में भी) जीत का श्रेय अपने नेता को देने की पंरपरा तो है, लेकिन हार का ठीकरा फोड़ने का ‍िरवाज नहीं है। लेकिन इस बार हार के बाद तो मान लिया गया कि ‘यह तो होना ही था।‘ चुनाव में हार जीत तो चलती ही रहती है। जब‍कि असल कारण यह था कि पार्टी ने चुनाव की बिसात जिन मुद्दों को ध्यान में रखकर बिछाई थी, वही जनता की अदालत में खोटे साबित हुए। चुनाव प्रचार में राहुल ने सबसे ज्यादा हमले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर ‍िकए। मोदी ने उसी को अपनी ताकत में बदल डाला। 
ऐसे में राहुल ने चुनावी हार की अपनी नैतिक‍ जिम्मेदारी स्वीकार कर पद से इस्तीफे का ऐलान कर दिया और वो उस पर अब तक कायम है, जो कि कांग्रेसी संस्कृति में नया और असहज करने वाला अंदाज है। क्योंकि अमूमन ऐसे मामलों में रस्मी तौर पर इस्तीफों की पेशकश की जाती है और पार्टी की मनुहार के बाद वापस भी ले ली जाती है। यानी सांप भी मर जाता है अौर लाठी भी नहीं टूटती। लेकिन इस बार राहुल गांधी ने ऐसी लाठी घुमाई है कि सांप खुद हैरान है। 
राहुल गांधी की यह अपेक्षा गैर वाजिब नहीं थी कि उनके पद से  इस्तीफे देते ही पार्टी के अन्य तमाम पदाधिकारी भी शरमा शरमी में हार का जिम्मा लेते हुए अपने पदों को त्याग देंगे। शुरूआत में दो-चार इस्तीफों की पेशकश हुई जरूर, लेकिन वे हकीकत में हुए भी या नहीं, साफ नहीं है। शायद इसीसे आहत होकर राहुल गांधी ने पाटी की युवा इकाई के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों से मुलाकात के दौरान दर्द बयान किया कि मुझे इस बात का दुख है कि मेरे द्वारा  पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश के बाद भी कुछ मुख्यमंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं को अपनी जवाबदेही का अहसास नहीं हुआ। 
इसके पहले चुनाव में हार के बाद हुई कांग्रेस कार्यसमिति की  बैठक में उन्होंने दो मुख्यमंत्रियो को लेकर अपनी नाराजगी व्यक्त की थी। साथ ही यह भी कहा,था कि 'मैं अब अध्यक्ष नहीं रहूंगा। पार्टी में लोकतांत्रिक प्रक्रिया होनी चाहिए।  किसी दूसरे को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए।  हालांकि कांग्रेस कार्यसमिति ने राहुल के इस्तीफे की  पेशकश खारिज करते हुए उन्हें पार्टी में आमूलचूल बदलाव का अधिकार दे दिया था, लेकिन लगता है कि राहुल बदलाव की शुरूआत भी खुद से ही करना चाहते हैं। अब जब दूसरी बार उन्होंने अपनी पीड़ा का इजहार किया तो कांग्रेस में इस्तीफों का सिलसिला शुरू हो गया। मध्यप्रदेश से राज्यसभा सांसद और पार्टी के वरिष्ठ नेता विवेक तन्खा, दिल्ली कांग्रेस उपाध्यक्ष राजेश लिलोठिया, तेलंगाना कांग्रेस उपाध्यक्ष पूनम प्रभाकर और हरियाणा महिला कांग्रेस अध्यक्ष सुमित्रा चौहान सहित लगभग सवा सौ लोगों द्वारा संगठन के विभिन्न पदों से इस्तीफे की खबरे हैं। जबकि ये इस्तीफे पहले भी हो सकते थे। माना जा रहा है कि इन नेताओं के इस्तीफे राहुल गांधी का इस्तीफा रोकने के लिए कराए जा रहे हैं। मकसद यह कि राहुल कांग्रेस अध्यक्ष  बने रहे और संगठन में जरूरत के हिसाब से फेरबदल कर सकें। 
सबसे आश्चर्य की बात यह है कि राहुल पद त्यागकर पार्टी में नए नेतृत्व को आगे लाने की बात कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस में कोई भी इतनी बड़ी जिम्मेदारी लेने के लिए आगे नहीं आ रहा। यानी ‘शिव’ के कहने पर भी कोई पार्टी का शिव धनुष उठाने को तैयार नहीं है। लोग पद छोड़ने को राजी हैं, लेकिन ( सर्वोच्च) पद स्वीकारने को राजी नहीं है। कई लोग तो गांधी विहीन कांग्रेस की कल्पना से भी सिहर उठते हैं। ऐसे लोगों को राहुल ने सचमुच सुई चुभो दी है। शायद वे जागें और कांग्रेस का खुद पर भरोसा लौट आए। लेकिन क्या ऐसा होगा? 

 

 

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अजय बोकिल

जन्म तिथि : 17/07/1958, इंदौर

शिक्षा : एमएस्सी (वनस्पतिशास्त्र), एम.ए. (हिंदी साहित्य)

पता : ई 18/ 45 बंगले,  नार्थ टी टी नगर भोपाल

मो. 9893699939

अनुभव :

पत्रकारिता का 33 वर्ष का अनुभव। शुरूआत प्रभात किरण’ इंदौर में सह संपादक से। इसके बाद नईदुनिया/नवदुनिया में सह संपादक से एसोसिएट संपादक तक। फिर संपादक प्रदेश टुडे पत्रिका। सम्प्रति : वरिष्ठ संपादक ‘सुबह सवेरे।‘

लेखन : 

लोकप्रिय स्तम्भ लेखन, यथा हस्तक्षेप ( सा. राज्य  की नईदुनिया) बतोलेबाज व टेस्ट काॅर्नर ( नवदुनिया) राइट क्लिक सुबह सवेरे।

शोध कार्य : 

पं. माखनलाल  चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि में श्री अरविंद पीठ पर शोध अध्येता के  रूप में कार्य। शोध ग्रंथ ‘श्री अरविंद की संचार अवधारणा’ प्रकाशित।

प्रकाशन : 

कहानी संग्रह ‘पास पडोस’ प्रकाशित। कई रिपोर्ताज व आलेख प्रकाशित। मातृ भाषा मराठी में भी लेखन। दूरदर्शन आकाशवाणी तथा विधानसभा के लिए समीक्षा लेखन।  

पुरस्कार : 

स्व: जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी उत्कृष्ट युवा पुरस्कार, मप्र मराठी साहित्य संघ द्वारा जीवन गौरव पुरस्कार, मप्र मराठी अकादमी द्वारा मराठी प्रतिभा सम्मान व कई और सम्मान।

विदेश यात्रा : 

समकाालीन हिंदी साहित्य सम्मेलन कोलंबो (श्रीलंका)  में सहभागिता। नेपाल व भूटान का भ्रमण।