कालिदास सत्ता में क्यों न हों ?

कालिदास सत्ता में क्यों न हों ?

मीडियावाला.इन।

कोरोना काल से साहित्य संसार को कहाँ कैसे नुक्सान हो सकता है | सच तो यह कि साहित्य लेखन की लहरें किसी महासागर के तूफान से ऊँची आकाश छू रही हैं | सब फुर्सत में , घर - आँगन में बैठे - लेटे , लिखते - लिखाते कभी बीबी या बच्चों को तो कभी फ़ोन घुमाकर मित्र , शिष्य , शिष्या को सुनते रहे | आस पास के लोग भी प्रेरणा ले रहे | फेस बुक के युग में तो साहित्य का ऐसा जनतंत्रीकरण हुआ है कि वाग्देवी सरस्वती , गणेशजी के दरवाजों , खिड़कियों  पर करोड़ों रचनाओं  के अम्बार लग गए होंगे | अब वे पता नहीं कितने करोड़ लोगों के अनुनय विनय को स्वीकार कर आशीर्वाद देंगे | इसलिए देवताओं के निर्णय की अपेक्षा एक पत्रकार के नाते हमने  साहित्य अकादमी में अगले वर्ष के पुरस्कार के लिए पहुंच रही प्रविष्टियों का पता लगाने के लिए एक युवा संवाददाता के साथ रवीन्द्र भवन के चक्कर लगाए | एक तो कोरोना काल , सीमित कर्मचारी , डाक और कुरियर तो तीन महीने पहुँच ही नहीं सके और महा गोपनीयता वाली चयन समितियों के वरिष्ठ साहित्यकार कुछ बताने को तैयार नहीं |

   सो थोड़े निराश - परेशान सीढ़ियां उतरकर आगे बढ़ रहे थे , तभी पीछे से आवाज आई --  ' अरे संपादक महाराज कहाँ भागे जा रहे हो ? ' पीछे मुड़कर देखा तो चेहरे से पहचान नहीं पाया | इसलिए धीमे से बोला ' जी , कहिये | ' चमकदार रेशमी कुर्ता , कपाल पर बड़ा सा चन्दन का  टीका , गले में भारी सी चेन में भगवान् शिवजी के आकार वाला लाकेट  और हाथों में पुस्तकों का एक बण्डल लिए पंडित ने  आगे आकर कहा - ' अरे सम्पादकजी यहाँ क्या कर रहे हैं ? " सामने आते ही पहचाना यह तो अपने उज्जयिनी के पंडित कालिदास हैं | संस्कृत साहित्य और ज्योतिष के बल पर बड़े बड़े नेता और अधिकारियों को चमत्कृत करते रहते हैं | मैंने कोरोना काल के नियमानुसार थोड़ी दूर रखते हुए कहा - ' हम तो बहुत दिनों बाद बाहर निकले हैं | लेकिन आप इस खतरे के माहौल में कहाँ आ गए ? ' कालिदास कभी हमारे साथ पढ़े हुए है | इसलिए उन्होंने कोई संकोच नहीं किया - ' भैया , इसी माहौल में ही तो सबको हमारी जरुरत होती है | अब मिल गए हैं , तो पास में ही अपने मित्र सांसद का बंगला है | वहां कोई नहीं है , केवल एक सेवक है , वहां बैठकर विस्तार से बात करेंगे | ' मुझे भी सत्ता के करीबी पंडित से असली कहानियां और नेताओं को दिए गए फॉर्मूले समझने की इच्छा हुई | अपने साथी संवाददाता को विदा किया और पंडित के साथ गाड़ी में बैठ गए |

    पंडित कालिदास के मित्र नेता का बंगला अंदर बड़ा सजा धजा था | सेवक इस तरह तैनात जैसे वह पंडित का ही घर हो | पंडित कालिदास ने सेवक को ठंडाई और कुछ नमकीन , काजू , पिश्ता आदि लाने का आदेश दिया | मलाईदार ठंडाई आने पर पंडित ने अपने बैग से चांदी का पानदाननुमा डिब्बा निकाला और सामने रखा - ' लीजिये संपादक महाराज - महाकाल का प्रशाद है , फिर कोई कोरोना नहीं प्रवेश करेगा | ,मैंने हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी - पंडित जी आज तक स्वाद नहीं चखा और कुछ गड़बड़ हुआ तो डॉक्टर अस्पताल जाना कतई नहीं चाहता | आप ग्रहण करें | मैं ठंडाई पीता हूँ | तब श्रीमान कलिदासजी ने दो मोटे गोले मुंह में डाले और ठंडाई फटाफट पी ली | फिर बताने लगे चार दिनों में वह किस किससे मिले , उन्हें भविष्य के लिए क्या पुड़िया दी | कहने लगे हर कोई मंत्री , मुख्यमंत्री बनना चाहता है | ये प्रगतिशील कहलाने वाले नेता तक यज्ञ - पूजा , तंत्र मंत्र , सब कुछ करवाने के लिए चरण छूकर कितना ही खर्च करने के लिए तैयार रहते हैं | फिर आज की बात नहीं है | आपने तो महा ठग चंद्रास्वामी  कितने देखे होंगे | नेताओं की निजी ज़िंदगी के भी कुछ किस्से सुनाने लगे | बातों  की रंगीनी के साथ भांग की तरंग भी चढ़ने लगी |

तब कालिदास ने अपना दिल दिमाग खोलकर समझाना शुरू किया - 'भैया तुम कितने ही बड़े पत्रकार संपादक , मालिक या सलाहकार हो , जब तक सत्ता अपने हाथ में न हो तो कोई लाभ नहीं | मैंने भांग भले ही खाई हो , अब तय कर लिया है | विद्वान् मेरा हमनाम कालिदास था , दरबार में नव रत्न माना जाता था , लेकिन साला नाम राजा का आज तक ज्यादा बड़ा है | विक्रम सम्वत आज भी लिखा जाता है | चाणक्य हो या विदुर , केवल सलाह देते रहे | हमारे पंडित व्यासजी से राष्ट्रपति , प्रधान मंत्री , सभी पार्टियों के नेता सलाह लेते थे , लेकिन उन्हें पद्म पुरस्कार के साथ एक सौ एक रुपया भी नहीं मिला | मैंने तय कर लिया है , सम्मान लेना नहीं सत्ता लेनी है | सबको राहु केतु , बृहस्पति , मंगल के गृह इस तरह समझाऊंगा कि वे मुझे नेता माने | लिख लो सात साल बाद तुम्हारे कालिदास का राज होगा | मेरा तंत्र मंत्र का काम शुरू हो चुका है | तुम बड़ा लिखते रहते हो - गठबंधन जरुरी है | राष्ट्रवादी , प्रगतिशील , समाजवादी , साम्यवादी , तमिल - तेलुगु पार्टी जैसी पचासों पार्टियां एक ही राग गाती हैं - सत्ता दो , हम भत्ता देंगें | सबके छोटे बड़े नेता मेरे पैर छूते हैं | मैंने उनसे ज्यादा पढ़ा लिखा है | फिर कविता , उपन्यास भी लिखे हैं | देखना अमृतलाल नागर से ज्यादा मेरी किताबें हो जाएँगी | इसलिए मैं देश में पहली बार - राष्ट्रीय सरकार बनाऊंगा | सभी पार्टियों की  एक  सरकार | दुनिया में पहली बार कालिदास जैसा  विद्वान राष्ट्रपति - प्रधान मंत्री दोनों पदों पर विराजमान होगा |

 मुझसे रहा नहीं गया ,टोककर बोला - पंडित कुछ ज्यादा हो रहा है | कालिदास का मुंह सुर्ख हो गया ,उत्तेजित होकर बोले - ' क्या ज्यादा हो गया | क्या तुमको सुनकर अभी से ईर्ष्या होने लगी | देखो तुम पुराने दोस्त हो | इसलिए अपनी योजना बता रहा हूँ | तुमने तो किताब लिखी थी ना - ' राव के बाद कौन ' | तुमने तो पांच सात नाम और उनका अच्छा बुरा सब लिख दिया | पहले भी किसीने लिखा था - ' नेहरू के बाद कौन ' | देखो मैं तुम्हें सुनहरा मौक़ा दे रहा हूँ | किताब लिख दो - नेहरू से मोदी तक के बाद कौन | और उन सबकी थोड़ी अच्छी , अधिक कमजोरियां शुरू में  लिखो और बस बाकी मेरे और मेरे सत्ता में आने से होने वाले लाभ के बारे में | मैं जानता  हूँ बेचारे प्रकाशक आजकल खस्ता हाल में हैं | सरकारी खरीदी ठप्प सी है | बाजार ठंडा है | फिर भी बीस हजार कॉपी का खर्चा पानी मेरा - बस पचास लाख मैं दिलवा दूंगा | आपने पास नेताओं की पत्नियों से ज्यादा सेठानियों की जन्म पत्रियां अधिक आती है | नेता तो पत्नी के बजाय मित्राणी की कुंडली अधिक दिखाते हैं | शायद तुम्हें समझ में नहीं आ रहा | देखो भृतहरी राजा ऋषि थे या नहीं | मैं उन्हीका अवतार हूँ | संस्कृत , राजनीति , अर्थ शास्त्र , कूटनीति , काम शास्त्र तक का ज्ञान रखने वाला इस भारत भूमि पर नहीं है | बेकार मंत्रियों पर खर्चा होता है | हम केवल सात सलाहकार रखेंगे और लक्ष्य होगा - विश्व विजय का | ये सांसदों के बंगले तोड़कर जमीन सेठों को बेच दी जाएगी | दिल्ली ही बदली हुई होगी | कालिदास की दिल्ली |

 मुझसे रहा नहीं गया - ' पंडित लोक तंत्र के बजाय राज तंत्र | इस बंगले में बैठकर इसे ही ढहाने के सपने देख रहे हो | आखिर  मेरे ही शहर के कालिदास हो ना | जिस पेड़ पर बैठे हो उसे काट रहे हो | ' आखिर आधुनिक कालिदास और वह भी शिवजी के प्रशाद से मस्त शक्तिवान | अपने लम्बे बालों पर हाथ फेरते हुए कालिदास ने अपने पैर सोफे पर रख पूरी पालथी मारी और प्रवचन की मुद्रा में जवाब दिया - ' बड़े पढ़ाकू और जमीनी पत्रकार माने जाते हो | बताओ किस क्षेत्र में ऐसा नहीं होता | स्कूल हो उसके मास्टर से शुरू करो और विश्वविद्यालय तक चले जाओ , एक दूसरे के कंधे पर चढ़ने वाले उन्हीं कन्धों को तोड़ने में जुटे रहते हैं | गांव का किसान हो या मुंबई का सबसे बड़ा धन्ना सेठ सबसे पहले अपने साथ वाले खेत से लेकर कारखाने को पीछे धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ता | किसी डॉक्टर को देखा है , जो कहे सामने वाला डॉक्टर मुझसे बेहतर है | तुम तो बिहार में रहे हो , वहां तो स्टेशन पर एजेंट कह देगा फलां डॉक्टर तो मर चुका , दूसरा डॉक्टर ऑपरेशन कर देगा | जबकि दूसरे मोहल्ले वाला डॉक्टर जिन्दा ही होता है | बाबु से अफसर तक एक अर्से तक दोस्ती निभाते हैं , तरक्की का मौका आये तो साथी की सारी कमिया गिनाने में नहीं चूकते | वकीलों की प्रतियोगिता कई बार दुश्मनी में बदल जाती है | अभी आप जिस साहित्य अकादमी से आप निकलकर आये हैं न , जरा अगली बार किसी सहयोगी को पटाकर पुराने पत्र व्यवहार या किसी बुजुर्ग स्पष्टवादी लेखक के साथ कुछ घंटे बैठकर देखेंगे , तो पता चलेगा तथाकथित कई लेखकों ने अपने ही गुरुओं या साथियों का पत्ता कटवाने के लिए क्या क्या षड्यंत्र - चिट्ठी पत्री नहीं की |संगीत और सिनेमा के लोगों के आपसी मुकाबले - गाला काटू षड्यंत्रों की कहानियां तो तुमने अपनी पत्रिका में ही छापी थी | तुम तो कभी मुझे ही सुना चुके , तुम्हारे कुछ साथियों ने तुम्हारी कितनी ऐसी तैसी की | तुम तो फिर भी बचे हुए हो | तुमसे ज्यादा बड़े संपादक माने  जाने वालों ने तो साथी , मालिक ही नहीं पत्र पत्रिका तक को ख़त्म करवा दिया | कभी महिला क्रन्तिकारी , दलित या पिछड़े या अल्पसंख्यक संगठनों के मुखियाओं से मिलो तो वे  केवल स्वयं और उनकी संस्था के अलावा किसी को ठीक नहीं बताएगा | फिर महाराज हम सत्ता के सिंहासन वाले बंगला तोड़े , नया बनवाएं , सिंहासन के लिए दूसरे के गृह नक्षत्र पर पानी फेरकर अपने पसंदीदा लोगों को सत्ता सुख दें दें तो असली लोकतंत्र ही तो होगा | यह कौनसी किताब में लिखा है कि अपने को समुद्र में डूबा लो और पड़ोसियों को सत्ता दे दो | अच्छा देखो फिर याद दिला दूँ - किताब लिखो -  ' कालिदास सत्ता में क्यों न हो ' | पचास लाख नगद या चेक से लेना यह प्रकाशक से पूछ लेना , तुम तो गईं भी नहीं सकोगे और चेक पर तुम्हारे दस्तखत कई बार मिलते नहीं | " और हाँ यह वायदा रहा सत्ता में आने के बाद तुम्हरी सिफारिश पर जितने लेखक संपादक या मेरे जैसे कुछ ज्ञानी अज्ञानी को दस दस लाख के पुरस्कार देने का वायदा भी कर रहा हूँ |

 मुझे समझ में आ गया अब पंडित का विश्राम  का वक्त आ गया है | सपने और वायदे निभाने तोड़ने वाले बहुत देखे हैं | इसलिए कहा - ' सब समझ गया | जो पंडित कहे वही सही , वही होगा | मुझे आज्ञा दें प्रणाम |

आलोक मेहता

पद्मश्री (भारत सरकार) से सम्मानित, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार-पत्रकार सम्मान-2006, दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा श्रेष्ठ लेखन पुरस्कार-1999 पद्मश्री आलोक मेहता हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे "नई दुनिया" के प्रधान सम्पादक हैं।

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