पूरब से दक्खिन तक नई इबारत लिखने की तैयारी

पूरब से दक्खिन तक नई इबारत लिखने की तैयारी

मीडियावाला.इन।

समय का चक्र घूम रहा है | दस साल पहले किसने कल्पना की होगी कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और कम्युनिस्ट केवल नाम का अस्तित्व बचाने की हालत में हो जायेंगे | उत्तर , पश्चिम और पूर्वोत्तर की लहर से प्रभावित  होकर बंगाल के लाखों लोग भारतीय जनता पार्टी को कन्धों पर बैठाकर सत्ता के समक्ष एक शक्तिशाली विकल्प के रूप में खड़ा कर देगी | इसी तरह सुदूर दक्खन में तमिलनाडु की राजनीति में एम् जी रामचंद्रन , करूणानिधि , जयललिता के बाद दोनों द्रमुक पार्टियों का अस्तित्व खतरे में हैं | परिवारों से अलग नामी सितारे कमल हसन और रजनीकांत के राजनैतिक समर्थक और भारतीय जनता पार्टी प्रदेश को क्षेत्रीय संकीर्णता से निकालकर राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए खड़ी हो गई हैं | वहां भी कांग्रेस और कम्युनिस्ट दर्शक दीर्घा में दिखाई दे रही हैं |देश  के अन्यः राज्यों की अपेक्षा बंगाल और तमिलनाडु अपने राजकाज , भाषा , संस्कृति की अलग पहचान के लिए क्रांतिकारी प्रयास करते रहे हैं | पडोसी देशों में तो बंगाली और तमिल पहचान के लिए लाखों लोगों का खून खराबा हुआ | भारतीय लोकतंत्र की शक्ति और जनता के आत्म विश्वास का परिणाम है कि पिछले सत्तर वर्षों के दौरान विभिन्न विचारों और पार्टियों ने सत्ता और प्रतिपक्ष की भूमिका निभाई और 2021 में  एक नया अध्याय लिखा जाने वाला है |

बंगाल और तमिलनाडु के पुराने इतिहास को पढ़ने जानने वालों को यह मालूम हैं कि इन दोनों इलाकों में हिंदुत्व का गहरा प्रभाव था | बगल में तो मुगलों से पहले हिन्दू और बौद्ध धर्मावलम्बियों में कड़ा संघर्ष रहा | मुग़ल और ब्रिटिश राज में अनेक बदलाव आए | राष्ट्रवाद और आजादी की लड़ाई में धर्म और जातियों से ऊपर उठकर समाज का अलग रूप दिखा | हां विभाजन के दौरान अवश्य फिर धार्मिक आधार पर भयावह दंगे हुए और महात्मा गाँधी ने अपने अहिंसक तरीकों से लोगों को राष्ट्रीय धारा से जोड़ा | इसीलिए कांग्रेस पार्टी प्रारम्भिक बीस वर्षों तक बंगाल पर राज कर सकी | फिर भी स्वामी विवेकानंद और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के हिंदुत्व के  विचारों से लाखों लोग जुड़े रहे | दूसरी तरफ सत्ता की गड़बड़ियों ने कम्युनिस्ट पार्टियों , माओवादियों - नक्सल संगठनों ने एक बड़े वर्ग को हिंसक रास्तों की तरफ भटका दिया | दुनिया के कुछ अन्य भागों की तरह इस इलाके में भी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सोवियत रूस और चीन की मदद से कम्युनिस्ट तीन दशक तक सत्ता के चाबुक से बंगाल को हांकते रहे | इसी दमन से निजात के लिए करोड़ों मतदाताओं ने 2011  में कांग्रेस से हे निकली जुझारू महिला नेत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को सत्ता सौंप दी | उसे 2016  में भी दुबारा मौका दिया , लेकिन सत्ता के नशे और हिंसा का सिलसिला अब पराकष्ठा पर पहुँचता दिखने पर 2019 के लोक सभा चुनाव में भाजपा को सीधे अठारह सीटें देकर जनता ने विकल्प का नया दरवाजा खोलकर दिखा दियः है | आगामी अप्रैल मई में होने वाले विधान सभा के चुनाव के लिए अब तृणमूल कांग्रेस और भाजपा ही मुकाबले में दिखाई दे रही हैं |

 असल में बंगाल के भोले भाले संवेनशील और बुद्धिमान लोगों का हर सत्ताधारी ने शोषण किया | हिंसा की राजनीति और भावनाओं के दोहन से विकास की धारा नहीं बहने दी | कम्युनिस्ट पार्टियों ने मजदुर किसानों के अधिकारों के नाम पर लोगों को भड़काया और औद्योगिक प्रगति के बजाय हड़ताल चरित्र की बद्नामिका दाग लगा दिया |ममता बनर्जी ने न केवल कम्युनिस्टों के हथकंडों से उन्हें पराजित किया , बल्कि उनके अपराधी तत्वों को भी अपने साथ जोड़ लिया | परिणामस्वरूप अत्याचार और हिंसा से बंगाल लगभग अराजक स्थिति में पहुंच गया है |बंगाल की दशा दिशा पर एक वरिष्ठ पत्रकार रासबिहारीजी ने करीब दो वर्ष के शोध कार्य के बाद एक साथ तीन पुस्तकें लिख दी हैं | हिंदी में बंगाल की रक्तरंजित राजनीति पर यह बहुत महत्वपूर्ण कार्य है | रक्तांचल , बंगाल - वोटों का खुनी लूट तंत्र ,और रक्तरंजित लोकसभा चुनाव -2019 शीर्षकों से प्रकाशित इस पुस्तक श्रंखला में प्रस्तुत तथ्य और विवरण दिल दहलाने वाले हैं | उत्तर भारत में रहने वाले संभवतः  इस जीवंत इतिहास से लगभग अनजान हैं | इस दृष्टि से आगामी विधान सभा चुनाव न केवल प्रदेश के लिए वरन सम्पूर्ण देश की राजनितिक दशा दिशा के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे |

उधर दक्षिण के तमिलनाडु में विधान सभा के अगले चुनाव के लिए रजनीकांत और कमल हासन के सक्रिय होने से द्रविड़ पार्टियों के लिए खतरे की घंटियाँ बजने लगी है | रजनीकांत स्वास्थ्य की आकस्मिक समस्या के कारण पार्टी नहीं बना रहे हैं , लेकिन पृष्ठ्भूमि में रहकर करुणानिधि और जयललिता से रिक्त स्थान को अपनी लोकप्रियता से भरने की कोशिश कर रहे हैं | इसी दौड़ में वर्षों से सक्रिय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा के नेता तथा समर्थक कांग्रेस - कम्युनिस्ट के सशक्त विकल्प के रूप में पेश हो रहे हैं | तमिलनाडु तो सैकड़ों वर्षों तक हिन्दू राजाओं द्वारा शासित रहा और धार्मिक सांस्कृतिक मान्यताओं में अग्रणी रहा है | मतलब हिंदुत्व की गहरी जड़ें रही हैं | मुगलों के बाद ब्रिटिश तथा फ्रांसीसी शासन काल ने इसे आधुनिक बनाया | फिर आज़ादी के बाद द्रविड़ पहचान , कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों की प्रतिक्रिया में पहले जस्टिस पार्टी और फिर द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम पार्टी का गठन हुआ | एम् जी रामचंद्रन की सिने लोकप्रियता ने उन्हें सत्ता में बैठाया और उनके बाद करुणा निधि तथा जयललिता ने अलग रहकर दशकों तक सत्ता सुख प्राप्त किया | कांग्रेस ने आजादी के बाद बीस वर्षों तक राज किया , लेकिन कामराज के बाद उसका  कोई जन  नेता प्रदेश में नहीं तैयार हो सका | चिदंबरम केवल धन बल और जोड़ तोड़ से केंद्र में सत्ता के आनंद लेते रहे | इसे दुर्भाग्य कहा जायेगा कि भ्रष्टाचार चरम सीमा पर पहुंचता रहा और चुनावों में जनता को भी रिश्वत की तरह महंगे सामान बांटकर द्रमुक अथवा अन्नाद्रमुक बारी बारी से सत्ता में आती रही हैं | इस कारण आज भी लाखों लोग गरीबी , अशिक्षा और बेरोजगारी से प्रभावित हैं | द्रमुक आंदोलन जाति प्रथा के विरुद्ध था , लेकिन पिछले दशकों में राजनेताओं ने वहां भी जातीय आधार पर लोगों को विभाजित कर अपने स्वार्थ पुरे किये हैं | इसलिए राष्ट्रीय दल के रूप में भाजपा के लिए संभावनाओं की खिड़कियाँ खुलती दिख रही हैं |इसमें कोई शक नहीं कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ही एकछत्र नेता हैं और उनके विकास कार्यक्रमों तथा प्राथमिकताओं ने व्यापक सफलता दिलाई है | भाजपा के लिए यह स्वर्ण अवसर है और कश्मीर से कन्याकुमारी और गोवा से अरुणाचल - नागालैंड तक उसके राजनीतिक पंख फ़ैल सकते हैं | बहरहाल बंगाल हो या तमिलनाडु भाजपा समर्थक अति कट्टरवादी तत्व उसकी छवि को अवश्य कलंकित करते हैं | सवाल  यह है कि इन बेलगाम हिंसक तत्वों को केंद्र सरकार और स्वयं भाजपा कितनी काबू कर पाएगी ?

 

 

आलोक मेहता

पद्मश्री (भारत सरकार) से सम्मानित, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार-पत्रकार सम्मान-2006, दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा श्रेष्ठ लेखन पुरस्कार-1999 पद्मश्री आलोक मेहता हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे "नई दुनिया" के प्रधान सम्पादक हैं।

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