संसद की गरिमा और विपक्ष का उत्तरदायित्व

संसद की गरिमा और विपक्ष का उत्तरदायित्व

मीडियावाला.इन।

मेरा सौभाग्य रहा है कि मुझे सन 1972 से संसद की रिपोर्टिंग करने का अवसर मिलता रहा है | पहले समाचार एजेंसी का संवाददाता होने से अधिक समय गैलेरी में बैठना होता था | नियम कानून का ध्यान में रखकर सुनना और लिखना पड़ता था | अख़बारों में रहने पर सदन के अंदर और बाहर अथवा संसदीय लाइब्रेरी में रहकर अधिकाधिक जानकारियां प्राप्त करनी होती थी | वर्षों तक अख़बारों में संसद की कार्यवाही - प्रश्नोत्तर और महत्वपूर्ण मुद्दों पर पहले पृष्ठ की खबरों से अधिक अंदर पूरा एक पृष्ठ की सामग्री जाती थी | महत्वपूर्ण भाषण के अधिकांश अंश छापे जाते थे | लेकिन दो दशकों से अधिकांश अख़बारों अथवा निजी टी वी समाचार चैनल पर केवल हंगामे और विवादास्पद मुद्दे प्रमुखता पाते हैं | इससे सम्पूर्ण संसद की छवि भी ख़राब होती जा रही है |   भारतीय संसद में आज भी योग्यतम सदस्य हैं | निश्चित रूप से इनकी तुलना आज़ादी के बाद बीस वर्षों तक रहे दिग्गज नेताओं से नहीं की जा सकती है | लेकिन विभिन्न दलों के कई नेता पूरी तैयारी , तथ्य और प्रभावशाली ढंग से अपनी बातें रखते हैं | लेकिन बेहद महत्वपूर्ण सवाल जवाब और भाषण मीडिया में न्यूनतम दिखते हैं | इस बार पिछले तीन हफ़्तों में संसद के कुछ दृश्य , गतिविधि और टिप्पणियों ने दुनिया में भारतीय लोकतंत्र की गरिमा को धक्का पहुँचाया है |

राष्ट्रपति के अभिभाषण का बहिष्कार , सभापति पर अनुचित अशोभनीय टिप्पणी , सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और अब राज्य सभा के मनोनीत सम्माननीय सदस्य पर लोक सभा में बेहद आपत्तिजनक आरोपों की चर्चा , प्रधान मंत्री के विरुद्ध भी अशोभनीय भाषा का प्रयोग , बजट सहित कई गंभीर विषयों पर निर्धारित समयावधि में अनुपस्थिति अथवा प्रतिपक्ष के प्रमुख नेता द्वारा विषय पर नहीं बोलने का दम्भपूर्ण दावा दुखद ही नहीं संसदीय व्यवस्था का सम्मान करने वालों को भी शर्मसार करता है | पराकाष्ठा यह है कि संसद के विषाधिकार के नाम पर कुछ सदस्यों ने न केवल अनर्गल आरोप लगाए , झुकने को तैयार नहीं हुए | उनकी पार्टी ने भी न रोका , न खेद जताया |

इस गंभीर मुद्दे पर संसदीय  नियम और अपनी लक्ष्मण रेखा का निर्वाह करते हुए यहाँ मैं उन सदस्यों और आपत्तिजनक बातों को नहीं लिख रहा हूँ | विडम्बना यह है कि पुरानी परम्परा और संसदीय नियमावली के अनुसार अध्यक्ष / सभापति सदनों की कार्यवाही से उन बातों को निकाल देने की आदेशात्मक घोषणा कर देते हैं , लेकिन लोक सभा या राज्य सभा के सीधे प्रसारण के समय न केवल वे आरोप , अशोभनीय दृश्य देश दुनिया में पहुंच जाते हैं और कोई कहीं भी उसे रिकार्ड करके रख लेता है | फिर सोशल मीडिया पर करोड़ों लोगों तक पहुंचा देते हैं | मैं उन पत्रकारों में से हूँ जो संसद और अदालत की कार्यवाही के टी वी पर सीधे प्रसारण के लिए बोलते लिखते रहे हैं | इसलिए अब किस तरीके से इस व्यवस्था पर किसी तरह के अंकुश की बात कर सकता हूँ ? फिर भी मैंने पिछले वर्षों के दौरान सदन के सभापतियों के समक्ष यह तगारक जरूर रखा था कि सदन की कार्यवाही से निकाले जाने की घोषणा से प्रिंट में छापना नियमानुसार  अपराध और बाहर उसी अंश के वीडियो चलने पर रोक नहीं हो पाती | यह कितना हास्यास्पद है | लेकिन यह नियम बरक़रार है | मतलब संसद को ही अपनी आचार संहिता पर विचार करना चाहिए | इसी तरह क्या राजनीतिक दलों और सांसदों को स्वयं अपनी और सदन की साख के लिए गंभीरता से नहीं सोचना चाहिए ?

 हाल की घटनाओं से लगता है कि राहुल गाँधी और उनके समर्थक भाजपा की मोदी  सरकार को हटाने के लिए ब्रिटिश नेता चर्चिल के फॉर्मूले को अपना रहे हैं | यों चर्चिल वर्षों तक प्रधान मंत्री रहा , लेकिन बुरे दिन आने और लेबर सरकार आने से दुखी होकर कहा था ' विपक्ष का धर्म है कि वह सत्तारूढ़ दल को सत्ता से हटाए ,चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े | ' इसी सिद्धांत को मानकर राहुल गाँधी और उनकी मण्डली  नागरिकता खत्म होने देश भर के , किसानों की सारी जमीन और फसल केवल दो उद्योगपतियों के पास चली जाने , अनाज विदेशी कंपनियों द्वारा विदेश ले जाने से भारत में लोगों के भूखे मरने , चीन द्वारा भारत में घुस जाने और प्रधान मंत्री द्वारा घुटने टेकने जैसे अनर्गल आरोप संसद के अंदर और बाहर लगा रहे हैं | ' निरंतर भ्रम और अफवाहों की वजह से क्या उनकी और भारत की छवि ख़राब नहीं हो रही है ? दूसरे सामान्यतः भारत में आजादी से पहले और बाद भी राजनीति को सेवा , ईमानदारी , राष्ट्र हित के लिए माना जाता था | ऐसा नहीं कि इस समय सतत्तरूढ़ नेताओं से कोई गलती नहीं हो रही अथवा उनकी गड़बड़ियों , कमियों की तीखी आलोचना नहीं होनी चाहिए | लोकतंत्र में तो पार्टी में भी अलग अलग राय होती है | संघ भाजपा के नेताओं में भी मत भिन्नता संभव है | लेकिन सुरक्षा और समाज के कल्याण से जुड़े विषयों पर पूरी तरह गलत जानकारियां फैलाना कितना उचित कहा जाएगा ?

 यह वही संसद है , जिसमें मेरे जैसे पत्रकारों और सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने पिछले पचास वर्षों में अटल बिहारी वाजपेयी , ज्योतिर्मय बसु , मधु लिमये , पीलू मोदी , जगजीवन राम , चौधरी चरण सिंह ,   , चंद्र शेखर , जार्ज फर्नांडीज , , हेमवती नंदन बहुगुणा ,  सुषमा स्वराज ,नरसिंह राव , प्रणव मुखर्जी जैसे दिग्गज सांसदों को संसद में पक्ष विपक्ष में रहकर आदर्श लोकतांत्रिक परम्परा को मजबूत किया | विरोध में नैतिक मूल्यों और संस्कारों की रक्षा की | तभी तो पिछले दिनों राज्य सभा में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद की स्वयं प्रधान मंत्री नफेन्द्र मोदी ने सराहना की | संसद में अब भी कई बुजुर्ग और युवा कहे जाने वाले सांसद पूरी तैयारी से बोलते और सकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं , लेकिन हंगामे और केवल टकराव के कारण कई दिन या तो काम ही नहीं होता अथवा केवल विवाद चर्चा में रहते हैं | दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहकर गौरवान्वित होने वाले सभी दलों के नेताओं को एक विशेष बैठक बुलाकर आत्म समीक्षा कर संसद के नए भवन से पहले नई आचार संहिता बनानी चाहिए | संसद में न्याय पालिका , मीडिया , सेना , वैज्ञानिकों तक की विश्वसनीयता पर दाग लगाने से पूरा भारत कलंकित हो रहा है | देश विदेश में नए सपने देखने वाले लाखों युवा भारतीयों को भ्रम के साथ निराशा होने लगती है | वास्तव में संसद ही भारतीय लोकतंत्र का दर्पण है | इसे टूटने से बचाना सबका कर्तव्य है |

आलोक मेहता

पद्मश्री (भारत सरकार) से सम्मानित, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार-पत्रकार सम्मान-2006, दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा श्रेष्ठ लेखन पुरस्कार-1999 पद्मश्री आलोक मेहता हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे "नई दुनिया" के प्रधान सम्पादक हैं।

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