Saturday, December 14, 2019
जब हम हार के साथ खड़े होते हैं

जब हम हार के साथ खड़े होते हैं

मीडियावाला.इन।

जब हम हार के साथ खड़े होते हैं

क्योंकि तय है कि न कोई हार आखिरी होती है और न कोई जीत अंतिम। फूलों की माला में यह फैसला करना मुश्किल ही है कि कौन सा सबसे पहले पिरोया गया होगा और कौन सा सबसे आखिर में। लहरों की तरह जीवन में उत्थान-पतन भी स्वाभाविक स्पंदित होते हैं। जीत के जश्न में उत्साह सहज है। जब आप हार के साथ खड़े होते हैं तो अगली जीत देहरी पर आरती की थाल लिए नजर आती है। टीम इंडिया के वर्ल्ड कप से बाहर होने के बाद लोग जिस तरह अपनी टीम के साथ नजर आ रहे हैं, यह साधारण नहीं है।

हमने देखें हैं, टीवी फोडऩे वाले अनगिनत दृश्य। उन पर खूब ठहाके भी लगाए हैं। हार की कगार पर पहुंचते ही पाकिस्तान को लेकर वे सारे जुमले और चुटकुले सोशल मीडिया पर दौड़ जाते हैं, जिनमें आंकड़े बताए जाते हैं। कहा जाता है कि पाकिस्तान की टीवी इंडस्ट्री में जल्द बूम आने वाला है। वर्ल्ड कप में इंडिया के हाथों हार के बाद वहां यही तो कहानी होती है। फुटबॉल और बास्केटबॉल में हार के बाद यूरोप के देशों में भी ऐसे ही कुछेक किस्से सुनने को मिल जाते हैं। हार को हजम करने के लिए, निराशा में तब्दील भावों के अतिरेक और जीत की उत्कंठ अभिलाषा पर तुषारापात के बाद अक्सर आम हो या खास ऐसा ही कुछ कर बैठते हैं।

ईडन गार्डन का वह मैच कोई कैसे भूल सकता है। जब मानो पूरा स्टेडियम ही बोतलों से भर दिया गया था। इतना भी धैर्य नहीं रहा कि मैच पूरा होने तक का इंतजार कर पाते। विनोद काम्बली के वे आंसू आज भी ईडन की छाती पर शूल की तरह चूभते हैं। उन आंसूओं में हार की हताशा से कहीं अधिक प्रशंसकों का भरोसा खो देने की पीड़ा थी। अभिमन्यु की मृत्यु तय थी बावजूद, उसे भेजा गया, ताकि वह चक्रव्यूह को बेध सके। उसे गर्भ में सीखी विद्या से अधिक अपनों के आत्मविश्वास ने वह शक्ति दी, जिसके दम पर वह आधे-अधूरे ज्ञान के साथ ही महासमर में कूद गया। काम्बली के आंसुओं में नमक से ज्यादा खीज थी, जिसे उन्हें आजीवन कुंठित रहने को अभिशप्त कर दिया। चौहान एक बार चूका तो फिर कभी लय हासिल नहीं कर पाया।

और इस बार भी तो मैच के दौरान वही सब चल रहा था। एक दिन पहले बॉलर्स के करिश्मे पर तालियां बजाता जनसमूह बैट्समैन के विकटों की झड़ी पर खीज रहा था। कोई रायडू को याद कर रहा था तो कोई दिनेश कार्तिक पर सवाल खड़े कर रहा था। धोनी को देर से भेजने पर तो इतने सवाल थे मानो उन्हीं से पितामह भीष्म के लिए शर शैया सजाई जाना हो। लोगों ने अनुष्का तक पहुंचने में भी गुरेज नहीं किया। विराट के बहाने अपना अवसाद चीखों में निकाल दिया। मिडिल ऑर्डर की नाकामी पर बहस के बीच व्यक्तिगत कुंठाए भी तो चरम पर ही थीं। कोई टीवी बंद करना चाहता था तो कोई क्रिकेट को फिजूलखर्ची बताकर बंद कराने पर आमादा था।

हालांकि इन सब प्रतिक्रियाओं में जीत की उत्कठ अभिलाषा ही झलक रही थी। लोग जीतना चाहते हैं, देश के साथ खुद को उस जश्न का हिस्सा बनाना चाहते हैं। क्योंकि जीत अकेली नहीं आती। वह रगों को फडक़ा देती है, खून की गति बढ़ा देती है। नथूने फुला देती है और धडक़नों व सांसों को शिखर पर ले जाकर खड़ा कर देती है। उस वक्त सब कुछ तिरोहित हो जाता है। सारे गम किसी बदली के पीछे जाकर छुप जाते हैं। सारे अभाव मिट जाते हैं।

जीवन में कुछ कर पाने न कर पाने के मलाल धूमिल हो जाते हैं। क्षणिक ही सही लेकिन हर जीत उस मुकाम पर ले जाकर खड़ा कर देती है, जहां हम जीवन भर खड़े रहना चाहते हैं। इसलिए बार-बार चाहते हैं कि हम जीते, हम न जीत पाएं तो हमारे भाई-बहन, सगे-संबंधी, दोस्त-यार, अड़ोसी-पड़ोसी कोई तो जीते। और हम उस जीत में वह सब छुपा ले जिससे हमारी कमजोरियां झलकती हैं, अवसाद टपकते हैं और कुंठाएं बह निकलती हैं।

मगर एक हार वह सब दोगुनी-तीन गुनी रफ्तार और कहीं अधिक वजन के साथ वापस पीठ पर लाद देती है। जीवन की तमाम हार के जख्म हरे हो जाते हैं। अवचेतन में वे घंटियों की तरह बजने लगती है। एक ही सवाल कानों में गूंजने लगता है कि और कितनी हार पार्थ। कितने मोर्चे और हारना बाकी है। एक हार तेजी से गर्त में ले जाकर पटक देती है। लेकिन जब हम हाथ बढ़ाकर उसे थाम लेते हैं। फेल की मार्कशीट लाए बेटे का माथा चूम लेते हैं। लड़ कर हारे हो, कह देने भर से हार अगली जीत की जमीन तैयार कर देती है।

धोनी के पराक्रम और कौशल ने ही सही आखिर तक लड़ने का जज्बा फिर से जगा दिया है। इस हार में अंधेरा नहीं है, मुंह छुपाकर भागने की नौबत नहीं है। हम सबने उसके साथ खड़े होकर उसे जीत की सुरंग बना दिया है, जिसमें आज अंधेरा जरूर है, लेकिन कुछ कदम बाद उम्मीदों का सूरज नई किरणेें बिखेरता नजर आएगा। मजा तब आया जब लोग बोले हम वन डे के चैम्पियन हैं सेकण्ड डे के नहीं और सात जीत के लिए मीठे की फरमाइश सुनाई देने लगी। ग्रेट जॉब टीम इंडिया एंड इंडिया। 
 

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अमित मंडलोई

Studied B.Sc. BJ MA LLM Dlit (H), 18 years in Journalism. Working on all media platform TV, WEB and print. 

In Patrika this is third edition earlier looking after Ujjain and Gwalior as editor. Now in Indore as Zonal editor.