आख़िरकार आज वो दिन आ गया है जिसका हर नौकरीपेशा के जीवन में आना लाज़िमी…

आख़िरकार आज वो दिन आ गया है जिसका हर नौकरीपेशा के जीवन में आना लाज़िमी…

मीडियावाला.इन।

आख़िरकार आज वो दिन आ गया है जिसका हर नौकरीपेशा के जीवन में आना लाज़िमी है , यानी रिटायरमेंट का दिन | चौतीस वर्ष पाँच माह छह दिन पहले शुरू हुआ सफ़र आज अपने मुक़ाम पर आ गया है | मुझे आज भी याद है 23 नवम्बर 1986 की वो रात जब कटनी से बिलासपुर इंदौर एक्सप्रेस से मैं भोपाल जाने के लिए रवाना हुआ था | ढेर सारे साथी रेलवे स्टेशन में ऐसे उत्साह से छोड़ने आए थे मानो वे ही डिप्टी कलेक्टर की नौकरी को पा गये हों , दोस्तों की ख़ुशी ऐसी ही होती है | बहरहाल जब ट्रेन हबीबगंज रेलवे स्टेशन पर सुबह पाँच बजे पहुँची जहां मुझे उतरना था , तब मुझे समझ आया कि इस कड़ाके की ठंड में साथ में लाया इतना सामान उठाना कितना कठिन काम था | अकादमी में तीन महीने की ट्रेनिंग लेनी थी , लिहाज़ा अम्मा ने तीन महीने के हिसाब से सामान रखा था | एक सूटकेस तो कपड़े भर के था , फिर एक बोरे नुमा बेग में साबुन सर्फ़ , लोटा गिलास बाल्टी मग टेबल लेम्प और और भी ना जाने क्या क्या | पता तो था नहीं की अकादमी में क्या मिलेगा तो अपनी ओर से ज़रूरत की सारी चीजें भर के रख दीं , जो भोपाल में तो बहुत कम खुली पर नौकरी में राजनांदगाँव पहुँचने पर बहुत काम आयीं | रेलवे प्लेटफ़ार्म से जैसे तैसे सामान उठा कर बाहर लाए और ऑटो रिक्शा में बैठ कर अकादमी आ गए | अकादमी के गेट पर ताला जड़ा था , सुबह साढ़े पाँच बजे कौन उठ रहा था ? जैसे तैसे गेट खुला और जो बंदा गेट खोलने आया उसने जब साथ लाये सामान में से बोरे नुमा बैग को पकड़ कर कहा इसे मैं ले आता हूँ , क़सम से उसी समय महसूस हुआ की यार अपन भी कुछ बन गए हैं |
दूसरे दिन दोपहर शाम तक बाक़ी साथी आ गए | हमारे बैच से एक बैच सीनियर लक्ष्मीकांत द्विवेदी और चतुर्भुज सिंह भी साथ थे | ये दोनों साथी वरिष्ठ तो थे ही हम सब से पहले सरकारी नौकरी किये हुए थे , सो इस अकादमी में आते ही हम सबने उन्हें गुरु का दर्जा दे दिया | ट्रेनिंग कैसे लेना है ये तो अकादमी में बताया जाता पर दुनियावी समझदारी किसे कहते हैं ये इन दोनों गुरुओं की क्लास में हम सीखा करते | मैं शुरुआत से ही थोड़ा संकोची स्वभाव का था और साथ के पढ़े-लिखे , बने-ठने साथियों को देख देख कर कुछ कुछ हीन भावना से भी ग्रस्त रहता था | सारे के सारे स्मार्ट, मुझसे ज़्यादा पढ़े लिखे , मुझसे ज़्यादा ज़हीन | मैं ठेठ देसी टाइप का हिंदी मातृभाषी , अंग्रेज़ी में कमजोर ; इतना कमजोर की प्रारम्भिक बायोडाटा भरते समय डिप्टी कलेक्टर की स्पेलिंग ही ग़लत लिख दी जो बाजू में बैठे किसी साथी ने सुधरवाई | पर यही देशी पन मेरी ताक़त भी बना , जहां भी जो भी , जैसा भी सीखने को मिला , मैं हिचका नहीं बेझिझक सीखा और आगे की नौकरी में भी ये भाव मेरा बड़ा सहायक हुआ | आम जनता और गरीब , असहाय मुझे हमेशा अपने से लगते रहे और इसलिए उनके प्रति काम करने में मुझे बहुत आनंद आता | अभिजात्य वर्ग भले ही अभी भी मुझमें एक अलग सा असहज भाव पैदा करता है |
अकादमी तब इतनी आधुनिक ना हुआ करती थी | हमें रहने के लिये दिए कमरों में अटैच बाथरूम नहीं था , रोज़ सुबह ख़ाली बाथरूम ढूँढना पड़ता था | नया मुल्ला ज़्यादा प्याज़ खाता है , हमने सोचा यार “साला हम तो साहब बन गया “और बाथरूम के लिए लाइन लगानी पड़ती है | हमारे बीच के किसी साथी ने ही जोश चढ़ाया की अरे ये डिप्टी कलेक्टरों के लिए बनी अकादमी है और इसमें हमें ही अच्छे कमरे नहीं मिलते | नतीजा ये हुआ की एक दिन गुरुवाणी के प्रभाव में आकार हम सब डबल बेड वाले ऐसे कमरों में अपने आप घुस गए जिसमें बाथरूम कमरे में ही अटेच था | कुछ दिन तक तो ठीक रहा फिर किसी ने डायरेक्टर को शिकायत कर दी | डायरेक्टर साहब ने हमें बुलाया और ओ व्ही नागर साहब के हवाले कर दिया जो उन दिनों वहाँ ओ.एस.डी. थे | नागर साहब डिप्टी कलेक्टर केडर से ही आइ ए एस हुए थे , उनने हम सब की खूब झाड़ लगायी , कहने लगे तुम लोग तो ऐसा बिहेव कर रहे हो जैसे कालेज के लड़के हो , अरे भाई सरकारी नौकरी कर रहे हो और वो भी डिप्टी कलेक्टरी | बाद में पुचकारा भी की आइंदा ऐसा ना करना और हम सब वापस उन्हीं कमरों में भेज दिए गए जहां सुबह बाथरूम के लिए लाइन लगानी पड़ती थी |
तीन महीनों की इंडक्शन ट्रेनिंग के बाद हम सब अपने अपने ज़िलों में भेज दिए गए , मुझे राजनांदगाँव ज़िला मिला था जो अब छत्तीसगढ़ में है | कटनी से आगे ज़्यादा से ज़्यादा बिलासपुर तक जाना हुआ था , पर ये तो कुछ ज़्यादा ही दूर था | सारनाथ एक्सप्रेस कटनी से चला करती थी , वो भी दुर्ग तक ही थी , उसके बाद ट्रेन बदलनी पड़ती थी या बस से जाना पड़ता था | जैसे तैसे ज़िले में पहुँच कर दोपहर तक कलेक्ट्रेट पहुँचा और ढूँढता हुआ ए डी एम के कक्ष में प्रवेश किया जिसमें मिश्रा जी अपनी पूर्ण भव्यता के साथ विराजमान थे | तब तक राजनांदगाँव में कलेक्ट्रेट नई बन चुकी थी क्योंकि ये ज़िला पहले दुर्ग का भाग ही था अतः नए ज़िले को मिलने वाली सौग़ातों में भवन इसे नसीब हो चुका था | हर्षमंदर तब राजनांदगाँव के कलेक्टर थे | मिश्रा जी ने मुझे ले जाकर उनसे मिलाया और प्रथम बैठक में ही मैं उनके व्यक्तित्व से अभिभूत हो गया | वे अद्भुत थे , सरलता की प्रतिमूर्ति और प्रशासन में दृढ़ता वैसी फिर मैंने नहीं देखी | उन्होंने सिखाया कि प्रशासन का मतलब है आम आदमी की तकलीफ़ों को दूर करना और अफ़सरी का मतलब है मज़लूमों की रक्षा | उनके अनेक क़िस्से हैं जो मेरे ज़ेहन में आज भी ताज़ा हैं पर वो फिर कभी | राजनांदगाँव में कुछ दिनों बाद मुझे कलक्टर ने बुला कर कहा की मैं तुम्हें डोंगरगढ़ का एस डी ओ बनाना चाहता हूँ | मैं घबराया कुल नौकरी के आठ माह भी पूरे ना हुए थे | मैंने कहा साहब मैंने अपनी विभागीय परीक्षाएँ पास नहीं की हैं , मुझे अभी ये ज़िम्मेदारी न सम्भाली जायेगी | उन्होंने कहा सोच लो उसका इंतज़ाम मैं कर दूँगा तुमको न्यायालयीन कार्य नहीं करना पड़ेगा | मैं निकल कर एडीएम मिश्रा जी के पास पहुँचा और अपनी असमंजस की कथा कही | मिश्रा जी हंसने लगे और कहा अरे पानी में कूदने से ही तो तैरना सीखोगे , जाओ मैं बैठा तो हूँ यहाँ | मैंने जाने का मन बना लिया और ऑफ़िस में सबसे सीनियर डिप्टी कलेक्टर रंगलाल जयपाल से आशीर्वाद लेने गया वे उन दिनों ट्राइबल सब प्लान के चार्ज में थे | मैंने ख़बर सुनाई तो बड़े ख़ुश हुए , पूछा कब जाओगे , कैसे जा रहे हो ? मैंने कहा सर अभी तो मुझे कुछ मालूम नहीं बस स्टेंड जाकर बस पता करूँगा और पहुँच जाऊँगा | बोले अरे भाई एस डी ओ बस में थोड़ी जाएगा , चलो मैं छोड़ने चलता हूँ और वही से बी पी एस नेताम साहब को फ़ोन किया की आनंद को लेकर आ रहा हूँ , दोपहर बाद , ऑफ़िस में ही मिलना | और इस तरह खुद रंगलाल जयपाल जो साधु पुरुष का जीवन जीते थे खुद मुझे छोड़ने गए , अपने साथियों से ऐसा स्नेह इन सब ने ही मुझे सिखाया | मज़े की बात ये थी की दूसरे दिन जब मुझे बोर्ड में बैठ कर केस सुनने पड़े और वकील एक के बाद एक बहस करते रहे तो मेरे हाथ पैर फूल गए , कुछ समझ ही ना आया , ये तो कहें रीडर बाबू अनुभवी थे समझ गए बोले आज साहब ऑफ़िस के दूसरे काम देख लें पेशी बढ़ा देते हैं | मैंने उसे अनुग्रह पूर्ण नज़रों से देखते हुए सर हिलाया और फिर दोपहर बाद आदेश हुआ की न्यायालय का काम जी एस धनंजय साहब देखेंगे मुझे केवल रिपोर्टिंग करनी होगी | वहीं मुझे सर्व श्री जी एस धनंजय , गणेश शंकर मिश्र , सुरेंद्र बेहार , जैसे सीनियर अधिकारी मिले जिन्होंने समझाया की सरकारी कामकाज के अलावा सँवर्ग एक परिवार की तरह होता है और एक दूसरे की सहायता से ही प्रशासन होता है | के के सिंह जो अब ए सी एस हैं तब वहाँ राजनांदगाँव एस डी एम हुआ करते थे , और संजय बंदोपाध्याय जो अब केंद्र सरकार में अपर सचिव हैं , ज़िले में प्रशिक्षु सहायक कलेक्टर | वहाँ से शुरू हुआ सफ़र 30 अप्रेल 2021 को पूरा हो रहा है | नौकरी में भोपाल समेत कुल जमा बारह ज़िलों में नौकरी की और छब्बीस बार पद परिवर्तन हुआ या कहें ट्रांसफ़र हुआ , यानी जीवन पूरा यायावरी का ही रहा | आज ये ऐसा ही ख़त्म हो रहा है , बिना किसी तामझाम के , कोरोना काल में जश्न और समारोह तो त्याज्य हैं ही तो आज इस शासकीय सेवाक़ाल से आप सब का शुक्रिया कहते हुए विदा के रहा हूँ , इस उम्मीद के साथ की नौकरी में ना सही पर यादों में तो हमेशा हम साथ रहेंगे 

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आनंद कुमार शर्मा

आनन्द शर्मा भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवा निवृत अधिकारी हैं, वर्तमान में वे मुख्यमंत्री के ओएसडी है   कविता, फ़िल्म समीक्षा, यात्रा वृतांत आदि अनेक विधाओं में फ़ेसबुकीय लेखन| विशेष तौर पर मीडिया वाला के लिए ताज़ा फ़िल्म समीक्षा के लिए चर्चित ।