डॉ.अपूर्व पौराणिक: अपने व्यक्तित्व में जीवन मूल्यों को समाहित करने वाला नायाब इंसान

डॉ.अपूर्व पौराणिक: अपने व्यक्तित्व में जीवन मूल्यों को समाहित करने वाला नायाब इंसान

मीडियावाला.इन।

Doctors' Day पर विशेष 

एक आदर्श व्यक्तित्व की छबि मेरे साथ चली आई जो उनके व्यक्तित्व में तब से लेकर आज तक सतत नए कीर्तिमान जोड़ती चली गई।

                         डॉक्टर अपूर्व पौराणिक एक ऐसा व्यक्तित्व, जिनके लिए मुझे लगा बहुत कुछ लिखा जा सकता है ,उनका एक आदर्श व्यक्तित्व है ,पर सच यह है कि उन पर लिखना बहुत कठिन लगा ,क्योंकि जब उनके व्यक्तित्व के लिए शब्दों को सोचने लगी तो लगा क्या लिखा जाय ?और जो लिखा जाय उसके लिए उस व्यक्तित्व के अनुरूप शब्दों का चयन कैसे किया जाय। नीरू दी सच्ची बताऊँ तो डाक्टर साहब पर लिखना इतना आसान नहीं है।लिखते हुए जो भी शब्द मैं सोचती हूं, मुझे लगता नहीं ,ये उनके व्यक्तित्व पर कमतर है ,फिर अगला शब्द ,फिर अगला रिजेक्ट करती रही। हर बार लगा ये उनके व्यक्तित्व पर फिट नहीं होगा और तब मैंने सोचा सूरज तो सदा सूरज ही रहता है। मेरे दीया दिखाने से सूरज की चमक पर कुछ खास अंतर नहीं पड़ता। तो पहला शब्द जो मैंने लिया वह उनके लिए बस उसी तरह है जैसे सूरज को दीया दिखाना।शब्दों से कहीं ज्यादा भावों का महत्त्व है और जो मैं कहना चाहती हूँ उसका भाव तो डाक्टर दंपत्ति  अच्छे से समझ लेंगे, क्योंकि एक अतरंग मित्र है और एक दिमाग ,संवेदना ,भावना और सब कुछ को ना केवल वैज्ञानिक भाषा में जानते है बल्कि वे  मन के भावों को मनोवैज्ञानिक होकर भी तो समझते है।दोनों ही यह समझ जायगें कि हम दोनों आप दोनों से अपार स्नेह करते हुए आपके ना केवल प्रशंसक है बल्कि दिल की गहराइयों से आप दोनों का सम्मान करते है।और सवाल यह है कि करें भी क्यों नहीं, बिरले व्यक्तित्वों में जिनकी गिनती हो, अगर वे हमारे मित्र -स्नेही शुभचिंतक चिकित्सक और  श्रेष्ठ सलाहकार अभिभावक की तरह है तो हम गोरवान्वित है उनके सानिध्य से।कहते है कि जब हम सहस्त्रों की संख्या में पुण्य करते है तब ईश्वर प्रसन्न होकर हमें आप जैसे मित्र देता है .तो चलिए मैं सूरज को दीया दिखाने की कोशिश करने जा रही हूँ .

                   बात तब की है जब हम  इंदौर आये थे और मैं पिछले कई वर्षों से माइग्रेन से पीड़ित थी।रेसीडेंसी क्लब में डॉ.नीरजा से मुलाकातें होने लगी थी।हम दोनों क्लब के सदस्य थे।एक दिन डॉ.नीरजा ने सलाह दी कि मायग्रेन के लिए डाक्टर साहब को क्यों नहीं दिखा देती।तब डाक्टर साहब एम. वाय. में देखते थे। समय लिया गया, सुबह 9.30 का समय मिला था।पंहुचने में मुझे  9.40 हो गए ,डाक्टर साहब मुझे केबिन से निकलते हुए मिले और बोले आप लेट हो गई, अब मेरी क्लास का समय हो गया है, अब आप कल आईये।थोड़ा बुरा भी लगा था ,ऊपर से पति महोदय ने कहा तुम समय का ख्याल कब रखती हो, वो डॉक्टर है और उनके लिए एक -एक मिनिट कीमती है।तब पहली बार समय और डॉक्टर ,डॉक्टर और समय एक ऐसा सम्मुचय दिमाग में बैठा कि समय के अनुशासन का पहला पाठ वहीं से शुरू हो गया।अगले दिन डरते हुए गई ,और मेरी मुलाकात हुई बहुत कुशल न्यूरो चिकित्सक से ,एक आदर्श व्यक्तित्व की छबि मेरे साथ चली आई जो उनके व्यक्तित्व में तब से लेकर आज तक सतत नए कीर्तिमान जोड़ती चली गई।और फिर पता ही नहीं चला कब नीरजा नीरू दी हो गई और डॉक्टर साहब बड़े स्नेही भाई में बदल गए। एक ऐसा प्रभावशाली व्यक्तित्व जिसके लिए व्यक्तित्व की परिभाषा भी कमतर लगती है।साधारणतः व्यक्तित्व एक स्थिर अवस्था न होकर एक गत्यात्मक समष्टि है, जिस पर परिवेश का प्रभाव पड़ता है और इसी कारण से उसमें बदलाव आता रहता   है। व्यक्ति के आचार-विचार, व्यवहार, क्रियाएं और गतिविधियों में व्यक्ति का व्यक्तित्व झलकता है। व्यक्ति का समस्त व्यवहार उसके वातावरण या परिवेश में समायोजन करने के लिए होता है।जनसाधारण में व्यक्तित्व का अर्थ व्यक्ति के बाह्य रूप से लिया जाता है, परन्तु मनोविज्ञान में व्यक्तित्व का अर्थ, व्यक्ति के रूप गुणों की समष्ठि से है, अर्थात् व्यक्ति के बाह्य गुण और आन्तरिक गुण , दोनों को माना जाता है।लेकिन डाक्टर अपूर्व पौराणिक के व्यक्तित्व में बाह्य गुण और आन्तरिक गुण  के अलावा कुछ आलौकिक गुण भी दिखाई देते है। और ऐसा सिर्फ और सिर्फ लाखों में किसी एक में ही देखा जाता है।

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             उन्होंने जीवन मूल्यों को अपने व्यक्तित्व में इस तरह से समावेशित कर रखा कि आप उनको अपनी समस्या बताकर ही दवाई से पहले ठीक होना शुरू  हो जाते है।दरअसल मुझे लगता है कि चिकित्सक के जीवन की पढ़ाई उसी दिन से शुरू होती है जब एक चिकित्सक रोगी के प्रति करूणा का भाव  रखते हुए उसे ध्यान से सुने और समझने की मंशा के साथ उसे एक स्नेहिल मुस्कान के रूप में पहला  उपचार यह दे कि कोई भय नहीं, सब ठीक हो जायगा।मनोबल का चिकित्सा विज्ञान में वही स्थान है जो सृष्टि में चमत्कारों का है और डॉक्टर अपूर्व  को मैंने मनोबल के नुस्खे के साथ इलाज शुरू करते देखा है।           कहीं पढ़ा था कि डॉ. अपूर्व की प्रशंसा में देश के ख्यातनाम पत्रकार डॉ.वेदप्रताप वैदिक ने कहा कि मैं यह देखकर आश्चर्यचकित हूं कि विज्ञान के क्षेत्र का व्यक्ति भी भारतीय दर्शन और शास्त्र की इतनी गहरी समझ रखता है। तो इसमें इजाफा करते हुए सुरेश तिवारी ज़ी कहते है कि 

             वे एक एसी शख्सियत है, जो डाक्टर होने के साथ साथ प्रखर वक्ता, लेखक, चिंतक, मनोवैज्ञानिक ,अध्यात्मिक  एवं करिश्माई व्यक्तित्व के धनी है .ऐसे व्यक्ति एक्स्ट्रोवर्ट (बहिर्मुखी) व इंट्रोवर्ट (अंतर्मुखी) की विशेषताओं का अनूठा कॉम्बिनेशन होते हैं ,जिन्हें बिरले कहा जाता है और शायद विलक्षण प्रतिभाएं ऐसी ही होती होंगी जैसे डॉ अपूर्व -नीरजा है।जब उनके ब्लॉग पढ़ती हूँ या उनके भाषण सुनती हूँ तो लगता है कभी कला उनके व्यक्तित्व पर छा जाती है तो कभी व्यक्तित्व कला में, तब वे एक चिन्तक के रूप में प्रभावित करते है ।  डॉ.अपूर्व  इन सब के साथ बहुत अच्छे  सम्पादक भी है।  उनका भाषाओँ पर भी बहुत कमांड है। वे मेडिकल की बात को हिंदी में भी इतना सहज, सरल और शुद्ध लिखते है कि मजाल है कोई मात्रा की एक भी गलती मिल जाय। ज्ञान ,व्यवहार और विज्ञान का ऐसा संगम इसलिए है कि उच्च कुलीन पुराणों के ज्ञाता ब्राहमण कुल में कृष्णवल्लभ जी के वंशज , जिनका जन्म ज्ञान, कला और संस्कारों की त्रिवेणी [माता ] से हुआ है और जीवनपथ पर जिन्हें नीरजा का साथ मिला ,जितना मैं नीरजा को जानती हूँ उस अनुरूप कह सकती हूँ    'नीरजा’ से  उनकी प्रतिभा और भी भव्य रूप में  हमारे सामने आती है।चिकित्सा जगत  के साथ साथ यह समाज और मनुष्यता, हमेशा डॉक्टर साहब आपकी ऋणी रहेगी ,क्योंकि न्यूरो जैसे जटिल विषय में आप जैसे धैर्यवान ,धीर -गंभीर ,विद्वान् का होना जीवन को जीवन मूल्यों से समृद्ध करता है।संवेदन चिकित्सा के लिए आप जैसे संवेदनशील डॉक्टर दुर्लभ कहे जा सकते है। आप शतायु हों ,दीर्घायु हों। हम सब मंगल कामना करते है ,और तिवारी परिवार पर आपका स्नेह सदा बना रहे।

   शुभकामना है कि नयी पीढ़ी आप दोनों में अपना आदर्श देखे --दाम्पत्य जीवन में भी आप एक आदर्श है --आप  दोनों को  समर्पित है ये पंक्तियाँ --

रश्मी रथी के रथ सा मंथर ,दम्पति का जीवन चलता |

दृढ़ता,शुचिता संयम ना हो ,अमृत घट नहीं भरता |

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