भाजपा की राजनीति के लिए जरुरी है 'कांग्रेस युक्त' भारत

भाजपा की राजनीति के लिए जरुरी है 'कांग्रेस युक्त' भारत

मीडियावाला.इन।

चौंकिये नहीं| गंभीरता से विचार कीजिये| भारतीय जनता पार्टी ही नहीं देश के लोकतंत्र के लिए जरुरी है किसी न किसी रूप और नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी का अस्तित्व| आजादी के पहले और बाद भी कितनी बार, कितने उप नामों, नए पुराने नेतृत्व से बंटती टूटती  बनती रही  है कांग्रेस| इस समय भले ही राहुल गाँधी के कारण कांग्रेस बुरी तरह दिशाहीन हो गई है और सिद्धांत विचारधारा केवल पार्टी संविधान एवं घोषणा पत्रों तक सीमित रह गए हैं| लेकिन यह तो भाजपाई ही नहीं देश विदेश के प्रेक्षक स्वीकारेंगे कि कांग्रेस की अखिल भारतीय पहचान है और उसके समर्थक हर हिस्से में रहे थे| पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों के चुनाव यह साबित करते हैं कि भाजपा या कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों से मुकाबला करना बहुत कठिन है| जिन राज्यों में इन दो राष्ट्रीय दलों का वर्चस्व रहा  और टक्कर रही, बदल बदल कर सही, लेकिन सत्ता मिली और उसका लाभ लोक सभा में बहुमत लाने भी मिला|

भाजपा ने अपने बल पर सत्ता में आने के लिए आठ साल पहले 'कांग्रेस मुक्त भारत' का नारा अवश्य दिया था, लेकिन अनुभव और समय के साथ नारे और दिशा बदलनी भी पड़ती है| इस समय कांग्रेस के कमजोर होने के कारण  शरद पवार, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव तथा कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों के  नेता भाजपा के विरुद्ध मोर्चा बनाकर आगामी लोकसभा चुनाव में सत्ता में आने की भूमिका बनाने में लगे हुए हैं| कांग्रेस अब तक नया अध्यक्ष ही नहीं तय कर पा रही है| सोनिया गाँधी एक तरह से कार्यवाहक अध्यक्ष की तरह काम कर रही हैं| राहुल गाँधी केवल सांसद रहते हुए भी पार्टी की बागडोर संभालकर चुनावी मैदान और डिजिटल मीडिया परफ गरजते बरसते रहते हैं| पूरी ताकत लगाने पर भी केरल, असम में हाल के विधान सभा चुनाव में पराजय और बंगाल तथा तमिलनाडु में और बदतर हालत हुई| अनिश्चितता, अविश्वास , विचारधारा के नाम पर कभी जनेऊ कार्ड, कभी मुस्लिम और कभी सेकुलर कार्ड के चक्कर में मतदाता ही नहीं पार्टी के कार्यकर्त्ता भी भ्रमित और निराश हो रहे हैं| उन्हें यह समझ नहीं आता कि वे ममता, ठाकरे, पवार, अखिलेश यादव, लालू यादव या येचुरी की पार्टियों का कब विरोध करें और कब उनका झंडा निशान लेकर जयगान करें| मोर्चा गठबंधन होने पर यही संकट क्षेत्रीय दलों के कार्यकर्ताओं और समर्थक मतदाताओं के सामने आता है|

 ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद ने कांग्रेस इसी कारण छोड़ी, क्योंकि न केवल पार्टी दिशाहीन हो गई, केंद्रीय नेतृत्व भी उन्हें केवल उलझाए रखा| सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा, आर पी  एन सिंह ही नहीं मनीष तिवारी जैसे युवा नेताओं को भी महत्वपूर्ण भूमिका नहीं  दी जाती है|  कमल नाथ, अशोक गेहलोत, भूपेश बघेल और अमरेंद्र सिंह अपने बल पर प्रदेशों में हैं| केंद्रीय नेतृत्व से उन्हें वोट नहीं मिल सकते हैं| हाँ पुरानी पार्टी और प्रमुख  प्रतिद्वंदी भाजपा या अकाली होने से मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पंजाब में विधान सभा चुनाव में सफलता मिल जाती है| अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव यह भी स्वीकारते हैं कि पिछले चुनावों में कांग्रेस के साथ समझौतों से उन्हें भारी नुकसान  हुआ|

बहरहाल, कोर्ट मार्शल या पोस्टमार्टम करना बहुत तकलीफ़देह लगता है | हमारे कई पत्रकार, चिंतक, एक्टिविस्ट और राजनेता गठबंधन की राजनीति को सही और अपरिहार्य भी मानते हैं| हमारे संविधान निर्माताओं ने भी शायद व्यापक उदारता के कारण चुनावों के लिए दलों की सीमा और लक्ष्मण रेखा तय नहीं की| लेकिन 1967 से लेकर अब तक क्या गठबंधन की सरकारें अधिक सफल हुई| सबसे बड़ा गठबंधन तो आपात काल के बाद जयप्रकाशजी, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, जगजीवन राम और अटल बिहारी वाजपेयी, जार्ज फर्नाडीज, मधु लिमये जैसे नेताओं की छत्र छाया में जनता पार्टी के नाम पर बना था, लेकिन दो साल भी नहीं टिका| राज्यों में तो कई बार गठबंधन बने और बुरी तरह टूटे| अटलजी या मनमोहन सिंह के राज में घटक दलों के दबाव और भ्रष्टाचार के कारण न केवल भाजपा या कांग्रेस को बल्कि देश को बहुत नुकसान हुआ|  लोकतान्त्रिक अधिकारों की दुहाई देने वाले क्या यह नहीं मानेंगें कि अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, फ़्रांस सहित दुनिया के किसी भी लोकतान्त्रिक देश में तीन चार से अधिक प्रमुख दल नहीं है| व्यव्हार में दो या तीन दल हैं| हाँ केवल जर्मनी में एक सौ साल पहले बीस तीस दलों का दौर आया तो लोगों ने हिटलर को ही नेता स्वीकारा और उसकी परिणति आज तक सब जानते समझते हैं|

सवाल केवल बहुदलीय व्यवस्था का नहीं है| विचारधारा और प्राथमिकता की दृष्टि से भाजपा एक हद तक उदार हिंदुत्व के साथ उदार अर्थ व्यवस्था को खुलकर घोषित करती हैं| कांग्रेस यदि अपने धर्म निरपेक्ष और सीमित उदार अर्थ व्यवस्था और प्रगतिशीलता के लम्बे चौड़े पार्टी संविधान के हिसाब से संगठन को चला सकती है| इसी तरह समाजवादी विचारों वाली और अति प्रगतिशील मार्क्सवादी कम्युनिस्ट विचारों वाली पार्टी हो सकती हैं| समय रहते यदि आत्म मंथन कर क्षेत्रीय पार्टियां भी विचारों और क्षेत्रीय हितो की गारंटी मांगकर ऐसे चार दलों में से किसीको चुन सकते हैं| इससे कम से कम हमेशा टकराव, अनिश्चितता, असंतोष नहीं बढ़ेगा और सही मायने में देश एक साथ प्रगति भी कर सकेगा| सौदेबाजी, तात्कालिक हितों पर दल बदल, समय असमय चुनाव से गरीब जनता को कोई लाभ नहीं होता| इस संदर्भ में जो नेता या पार्टियां इस समय वर्तमान भाजपा सरकार को बेहद अलोकप्रिय होने का दावा कर रही हैं, क्या वे आने वाले महीनों में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वयं सुझाए गए 'एक देश एक चुनाव' के सिद्धांत को संसद से स्वीकृति दिलाने के लिए तैयार होंगी? RB

आलोक मेहता

पद्मश्री (भारत सरकार) से सम्मानित, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार-पत्रकार सम्मान-2006, दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा श्रेष्ठ लेखन पुरस्कार-1999 पद्मश्री आलोक मेहता हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे "नई दुनिया" के प्रधान सम्पादक हैं।

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