कुछ अभागे जिनका भाग्य भूगोल लिखता है

कुछ अभागे जिनका भाग्य भूगोल लिखता है

मीडियावाला.इन।

अपने संविधान की प्रस्तावना ही हमें आश्वस्त करती है कि सभी देशवासियों को समान जीवन स्तर,समान दर्ज़ा और जीवन में समान अवसर,अधिकार के रूप में मिलेंगे.किन्तु, क्या यह सच नहीं है कि 'भूगोल'भी अपने यहाँ ज्यादातर का 'भाग्य' लिखता है.कोई कहाँ रहता है,यह भी उसके लिए ये तीनों अधिकार तय करता है.

इक्का-दुक्का या इससे थोड़ा सा ज्यादा अपवाद को छोड़ दें,तो पाएंगे कि अपने देश में सेवाओं,सुविधाओं और अवसरों का केन्द्रीकरण सिर्फ शहरों में है.भले अपने देश में साढ़े छह लाख गाँव हों,इनमें देश की आबादी के सत्तर प्रतिशत लोग रहते हों,पर संख्या के मामले में,उनसे छोटी मात्रा में रह रहे शहरी भाइयों की तुलना में वे कम ही भाग्यशाली होते हैं.यानी भाग्य भी भौगोलिक परिस्थितियां लिख रही हैं.

अपने देश में हम वैश्वीकरण,खुले बाज़ार और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि सहित कई उपलब्धियों की बातें जरूर कर लें,पर उन अनार्थिक मुद्दों की तो बात ही नहीं करते जो जिंदगी से सीधी-सीधी जुड़ी हैं.

ग्रामीण या क़स्बाई इलाकों में शिक्षा,स्वास्थ्य,परिवहन,भण्डारण और वहां के बाज़ार में मिलने वाली चीज़ों की गुणवत्ता वाक़ई चिंता की बातें हैं.ये वहां रह रहे लोगों के कमतर भाग्य के कारण ही हैं.मगर वे हमारे रोज़-मर्रा के विमर्श में शामिल नहीं हैं.

हमारे रोज़-मर्रा के विमर्श में क्या है,व क्यों है,यह अलग बात है,किन्तु यह तय है कि इसके कारण बड़ी संख्या में अपने ही देश के लोगों का भाग्य कमतर है.अंग्रेजी भाषा का एक मुहावरा इन पर सटीक बैठता है कि ये 'चिल्ड्रन ऑफ़ लैसर गॉड' हैं.

जीडीपी में योगदान,प्रति व्यक्ति आय और खर्च की गिनती रखने वाले मानते हैं कि भारत का ग्राम-समाज अपने शहरी साथियों से बराबर नहीं, तो बहुत कम भी नहीं है.किन्तु,ग्रामीण बाज़ारों में खुल्लम-खुल्ला 25000 करोड़ रुपये मूल्य की उपभोक्ता वस्तुएं नामी-गिरामी ब्रांड्स की आड़ में बिक जाती हैं.

एसी नीलसन नाम की बाज़ार सर्वेक्षण करने वाली कंपनी ने अपने एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में यह पाया था.'डेरीमिल्क'के नाम पर हू-बहू वैसी ही पैकिंग में 'डेलीमिल्क'नाम की चॉकलेट बिक जाती है.'हेयर एन्ड शोल्डर'नाम के शेम्पू की जगह 'हेयर एंड शावर'मिल जाता है.'फेयर एंड लवली'जैसा ही लिखकर 'फेयर एंड लोनली' खपा दिया जाता है.इस नक़ली बाज़ार में चीज़ों की पैकिंग,रंग,लिखाई और कहीं कहीं तो पहली गंध-सुगंध सब मिलते जुलते होते हैं.

दुर्भाग्य की पराकाष्ठा तो तब दिखती है जब नक़ली खाद,बीज,दवाइयां,पशु आहार और बच्चों के पौष्टिक आहार भी नक़ली खप जाते हैं.

चूँकि ये सब नक़ली और घटिया के साथ सस्ते भी होते हैं,इसलिए इनके उपयोग से हानि तो जरूर होती होगी.वह सारी हानि ग्राम-समाज के भाग्य में व्यवस्था द्वारा लिखी होती है.

आप एक बार गाँवों में बिकने वाले पान मसाले और तमाखू के पैक ही देख लें,इनके हरेक कण में आपको 'कैंसर'का दम दिखेगा.विश्वास न हो,तो इस बाज़ार के किसी जानकार से पूछ लें.पता लगेगा कि गाँवों के लिए अलग माल बनता है और शहरों के लिए अलग.

सरकारें 'शुद्ध के लिए युद्ध'जरूर चला लें,पर इसके लिए जरूरी अमला कहाँ से आएगा.इस काम के लिए उपलब्ध अमले की संख्या बाज़ार के मान से दयनीय रूप से कम है.जो अमला है,वह भी तो शहरों में ही रहना चाहता है.इसलिए मुनाफाखोरी की हवस में बाज़ार ने भी ग्राम-समाज को 'चिल्ड्रन ऑफ़ लैसर गॉड' बना लिया है.

सड़कों की बढ़ी हुई संख्या ने एक परिवर्तन जरूर किया है.खेती को दोयम दर्ज़े का काम मानकर खाली बैठे युवक समाज की लाज-लिहाज़ के रहते,अपने शौक पूरा करने दूसरे क़स्बों में चले जाते हैं,और खतरनाक बीमारियां गाँव में ले आते हैं.

एक सर्वेक्षण में से निकल कर आया था कि शहरी अस्पतालों में 86 प्रतिशत लोग गाँवों से आते हैं.इन्हीं में बड़ी मात्रा में 'यौन-जनित' बीमारियों से पीड़ित लोग भी होते हैं.

सरकारें राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की सफलता गिनाते हुए भवन और वस्तुएं दिखा सकती हैं,पर इलाज़ करने वाले डाक्टर नहीं हैं.सरकारें खुद मानती हैं कि भारत के ग्रामीण इलाक़ों में डाक्टरों की संख्या का कुल 3 प्रतिशत ही उपलब्ध है.

पूरे देश में शायद ही कोई ग्रामीण प्राथमिक चिकित्सा केंद्र हो,जिसमें स्वीकृत या मान्य संख्या में डाक्टरों की पूरी पदस्थी हो.राष्ट्रीय ग्रामीण मिशन की सफलता दिखाने के लिए अस्पतालों में दवाओं की मात्रा तो दिखाई जा सकती है,पर उन दवाओं का उपयोग कितना हुआ,या हो सकता है,पर बात करें तो पाएंगे कि अभागे ग्राम-समाज पर यह एक और अन्याय है.

जीवन स्तर सुधारने या भविष्य के सभी भावी अवसर गढ़ने के केंद्र स्कूलों और कालेजों की स्थिति भी उतनी ही दयनीय है.हमारे किसी भी राजनीतिक दल या राजनीतिक नेता ने इसे समाज के एक बड़े तबके के साथ हुए अन्याय के रूप में नहीं देखा.पूरे समाज द्वारा संविधान के समानता वाले प्रावधान से जोड़कर तो ये मुद्दे कभी देखे ही नहीं गए.

सारे जिम्मेदार लोग भवन,कर्मचारी और कच्चे-पक्के शिक्षकों की गिनती बता देंगे,और हम सब खुश भी हो लेंगे.लेकिन एक ताज़ा सर्वेक्षण (एन्युअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशनल रिपोर्ट) में निकल कर आया है कि ग्रामीण अंचल के आठवीं कक्षा के आधे से ज्यादा बच्चे देश के नक़्शे पर अपना राज्य भी नहीं पहचान पाए.आठवीं कक्षा के 43 प्रतिशत बच्चे चौथी कक्षा के गणित के सवाल हल नहीं कर पाए थे.कुछ तो ऐसे भी मिले जो दूसरी कक्षा के लिए निर्धारित पुस्तक भी नहीं पढ़ पाए.'ए एस ई आर' की रिपोर्ट कोई गुप्त दस्तावेज नहीं है.

कुल मिलाकर कहना यह है कि हम इन चीज़ों को संविधान के समानता वाले कोण से नहीं देख रहे हैं.पिछले बीस वर्षों में जिंदगी के लिए जरूरी हर मुद्दे पर जनता में चेतना तो दिखी है,पर व्यवस्था ने गुणवत्ता को प्राथमिकता पर कभी नहीं रखा.

साफ़-साफ़ दिखता है कि हमारी विकास की रणनीति 'शहर केंद्रित'है.शिक्षा और स्वास्थ्य सहित ज़िंदगी के हर पहलू में सब सुविधाओं का 'ध्रुवीकरण' शहरों में है.परिणाम स्वरुप एक बड़ी संख्या में अपने ही लोग 'अभागों' की तरह उनसे वंचित हैं.

विकास की इसी प्यास में शहर बढ़ते नहीं,'पसरते'जा रहे हैं.जनगणना का एक मान्य सिद्धांत है कि जहाँ की कम से कम आबादी 5000 हो,वहां के 75 प्रतिशत पुरुष कृषि के अलावा किसी अन्य आजीविका में लगे हों,और आबादी का घनत्व प्रति वर्ग किलोमीटर 400 व्यक्ति हो तो वह 'नगर'माना जाएगा.इन तथाकथित शहरों में जिंदगी की हर सुविधा का अभाव है.

वर्ष 2021 की जनगणना में इस क़िस्म के भी कई आश्चर्य सामने आएंगे.शहर तो बहुत हैं,पर वहां जीने के वैसे साधन नहीं हैं.रोजगार या जीवन के अवसरों की चाह में अपनी जड़ों से उखड़कर शहर आ चुके ग्रामीण 'अभागे'अब शहरी जिंदगी की पीड़ा सहने को अभिशप्त होंगे.

कुल मुद्दा यह है कि 'वोट' के बाहर भी ज़िन्दगी है. विकास का सोच भी सम्पूर्णता मांगता है,तभी तो संविधान में समानता की बात सच होगी.

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कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...