भय को छोड़ आइये अंदर की रौनक देखते हैं

भय को छोड़ आइये अंदर की रौनक देखते हैं

मीडियावाला.इन।

भय को छोड़ आइये अंदर की रौनक देखते हैं

चारों ओर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है , कहीं कोई आवाज़ नहीं , कोई इंसान नहीं । भय इतना कि लॉक डाउन होते ही शहर ही नही घर के दरवाजे भी बंद हो गए । बाहरी दुनिया से नाता टूट चुका है । बातें होती है पर कोरोना से आगे कोई बढ़ नही पाता । गाड़ियों का शोरगुल थम गया है , पक्षियों की चहचहाहट सुनाई दे रही है पर लगता है जैसे वो आवाज़ें भी उदासी में जा रही , क्योंकि उनकी चहचहाहट पर खुशी से झूमने वाले बच्चे घरों में अंदर जबरजस्ती बैठा लिए गए हैं । जैसे ही दूधवाला आता है सबसे पहले दौड़कर घरों से बच्चे ही बाहर भागते हैं ।
बाहर अजीब सी मायूसी छा गई है ।

आइये अब अंदर झाँककर देखते है । घरों के अंदर जैसे रौनक लौट आई हो । वो रौनक जिसे हम सब बाहर बाज़ारो में , थिएटर में , मॉल में , क्लबो में ढूंढते आये हैं उससे कहीं खुशनुमा रौनक तो अब हम हमारे घर मे देख रहे हैं । पूरा परिवार साथ मे सो रहा है , जाग रहा है , खा रहा है तो गा भी रहा है । एक दूसरे को पूरा का पूरा वक़्त दे रहे हैं । घर के सभी कामों में सभी खुश होकर हाथ बटा रहे हैं ।
पहले जिन साहब को वक़्त की कमी बनी रहती थी वो अब झाड़ू पौछा से लेकर रसोई में नए नए व्यंजन बनाने की कोशिश कर रहे हैं । जो बच्चे , स्कूल , कॉलेज , पढ़ाई , कोचिंग में उलझे रहते थे , कपड़े यहाँ वहां उड़ाते रहते थे वो अब अपनी अपनी अलमारियों में कपड़े तह कर के जमा रहे हैं ।
कैरम , साँप सीढ़ी , लूडो के साथ ताश के पत्तो की बाज़ी का इंतज़ाम होने लगा है । राजा मंत्री चोर सिपाही , अंग बंग चोक चंग जमने लगे ।
सुबह की पूजा में परिवार के सभी सदस्य साथ मे हवन और आरती कर रहे हैं तो शाम को दिया बत्ती के समय साथ मे भजन । रात को पुराने गोल्डन एरा के गीत गूँजते है । दादाजी सहगल , रफी , तो पापा किशोर , शैलेन्द्र सिंग , माँ और दादी सुरैया , लता दीदी , आशा , सुमन तो बच्चे अरिजीत , श्रेया , मीका , नेहा ,के गीत गाकर झूम रहे हैं ।

घर के बुजुर्गों के चेहरों पर चमक आ गई है । उनकी कमजोर याददाश्त में भी उन्हें दंतकथाएँ याद आ गई हैं , बच्चे उन कहानियों में खोए जा रहे हैं और बुजुर्ग और बड़े अपना बचपन फिर जिये जा रहे हैं ।
फिल्मों की सीडी , डीवीडी की जगह विवाह समारोह की डीवीडी देखकर ऐसे खुश हो रहे हैं जैसे कोई जबरजस्त सुपर डुपर हिट फिल्म देख रहे हो । उस पर छुटके बच्चों की नाराजगी कि मम्मा पापा आप गंदे हो आपकी शादी में आपने हमको तो बुलाया ही नही , ऐसे कोई करता है क्या ? जाओ बात नही करना । उनकी इस मासूमियत पर पूरा परिवार एक साथ ठहाका लगा उठता है ।

भोजन में नाश्ते में रोज के नए नए व्यंजनो का मेनू तैयार हो गया । जिन पड़ोसियों की आपस मे गाहे बगाहे बात होती थी अब वो एक दूसरे से बात करने को छटपटाते है दिखते ही सबसे पहले हालचाल जानते हैं फिर बड़े ही प्यार से कहते हैं , अरे भैया किसी सामान की जरूरत हो तो बोलना , अपने यां खूब भरा है , पेले ही किराना भर लिया था , और हाँ दवाइयों की जरूरत हो तो भी बताना अपने दोस्त की दुकान है घर भिजवा देगा ।
ये केवल शब्द नही है ये भावनाओ का वो छुपा दरिया है जो अंदर कहीं गहराई में बह रहा था और हम भागदौड़ में उसमे डूब ही नही पा रहे थे ।
मोबाईल पर अब फालतू के जोक्स कम और अपनों से बात ज्यादा होने लगी है । वर्क फ्रॉम होम के कारण दूर बैठे बच्चे माता पिता के बेहद करीब आ गए , वीडियो कॉलिंग से झट एक दूसरे के चेहरों को पढ़ लेते हैं । कुछ खाया नही खाया , कैसा है तू , सामान सब है न तेरे पास , बाहर मत निकलना , कुछ भी हो तुरन्त फोन करना वगेरह वगैरह ये वो प्रश्न है जो दोनो तरफ से बराबर चलते हैं और उत्तर मिलते ही भयग्रस्त चेहरे सुकून से चमक उठते हैं कि सब ठीक है । हाथ ईश्वर के सामने जुड़ जाते हैं कि सब कुछ ठीक रखना ।
घर मे काम करने वाली बाईयो और कर्मचारियों जिनसे हर छोटी बात पर कहासुनी , डांट डपट हो जाती थी आज उनसे एक अलग ही अपनापन हो गया । छुट्टियां तो दी ही साथ ही घर का कुछ जरूरी सामान , दवाइयां , सेनिटाइजर भी देने लगे हम । फोन पर उनके हालचाल जानने लगे हम । वो भी उतनी ही आत्मीयता से बोलती कि दीदी आपकी तबियत खराब रहती है , अगर तबियत खराब हो तो आफत मत उठाना एक फोन करना मैं आ जाउंगी , पास में ज तो रेती हूँ ।
कितना पास पास आ गए न हम । एक दूसरे से कितने प्यार से अपनेपन से जुड़ गए हैं हम ।
कहते हैं इंसान जब भयभीत होता है तो अपनो का साथ चाहता है पर डर तो कहने की बात है , हम तो पहले से ही जुड़े हुए थे पर जीवन की जरूरतों को पूरा करने की आपाधापी में कभी रिश्तो की इन ख़ूबसूरतियों को देख ही नही पाए । प्रेम के दरिया में डूब ही नही पाए ।तो लॉक डाउन तक क्यों , हम हमेशा के लिए रिश्तो में लॉक क्यों न हो जाए ।खूबसूरत रिश्तों के साथ ये कठिन वक्त यूँ पल में गुजर जाएगा , डरिये नहीं , आप बस मुस्कुराते रहिये 😊

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दीपा मनीष व्यास

डॉ दीपा मनीष व्यास सहायक प्राध्यापक श्री वैष्णव विधि संस्थान इंदौर म.प्र.  एम .ए . पी एच -डी हिंदी साहित्य में साहित्यिक संस्था " सृजन संवाद" में  अध्यक्ष  पद पर  । श्री श्री साहित्य सभा  द्वारा  "काव्य सुरभि " सम्मान राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा " अखिल भारतीय संचेतना लघुकथाकार  " सम्मान   श्री श्रीगौड़ ब्राह्मण समाज द्वारा  बतौर अतिथि व अभिनन्दन  समाज की प्रतिभा सम्मान श्री श्रीगौड़ युवा परिषद द्वारा  प्रतिभा सम्मान  सामाजिक पंचायत द्वारा प्रतिभा सम्मान मालव मयूर अलंकरण समारोह के मंच से श्रेष्ठ अभिनन्दन पत्र वाचन के लिए सम्मान  जत्रा संस्कार महोत्सव में पाँच दिवसीय संचालन हेतु सम्मान  डॉ एस.एन. तिवारी स्मृति सम्मान विविध लेख लिखने हेतु  जिला स्तरीय कहानी उत्सव प्रतियोगिता में विशिष्ट अतिथि  सम्मान  श्री चैतन्य मण्डल इंदौर द्वारा मुख्य अतिथि सम्मान  विभिन्न साहित्यिक गोष्ठियों में बतौर मुख्य अतिथि , चर्चाकार , समीक्षक , व निर्णायक की भूमिका का निर्वाह ।  साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में संचालनकर्ता , सूत्रधार की भूमिका । नई दुनिया नायिका , पत्रिका समाचार पत्र में कविता , लघुकथाएं व कहानियां प्रकाशित ।