इस साल का क्या भूलें, क्या याद रखें!

इस साल का क्या भूलें, क्या याद रखें!

मीडियावाला.इन।

जब पिछले साल 31 दिसंबर को लोग 2020 के स्वागत की तैयारी की योजना बना रहे थे, तब किसी ने सोचा नहीं था कि ये साल इतनी मनहूसियत से भरा होगा! एक अदृश्य वायरस ने दुनिया की गति और सोच दोनों को बदल दिया! ये ऐसी घटना ऐसी थी, जो किसी के सोच से भी परे थी! हॉलीवुड की फिल्मों की काल्पनिक कहानी की तरह इस वायरस के कारण मानव सभ्यता पर संकट आ गया! सर्दी, खाँसी और निमोनिया जैसे लक्षणों वाली बीमारी ने लोगों की जान लेने में कोई कोताही नहीं बरती! वायरस के असर से लाखों लोगों ने 'अपनों' को खोया और करोड़ों लोगों ने 'सपनों' को खोया! अभी भी ये सिलसिला जारी है! बीत रहे इस साल को इसकी मनहूसियत के लिए कभी कोई भुला नहीं सकेगा। 

    किसी ने कभी सोचा नहीं होगा कि 2020 साल ऐसा बीतेगा। एक अदृश्य संकट ने जैसे दुनिया बांधकर रख दिया। दुनियाभर में लाखों लोगों की मौत हो गई। ऐसी ही दुखद यादों के साथ बीत रहा ये साल कभी भुलाया नहीं जा सकेगा! ये अनुभव हर किसी की जिंदगी को दर्द दे गया। नए साल के शुरू होने के साथ लोग कुछ वादे करते हैं। अपने आपसे भी और अपनों से भी! कई सपने जो देखे जाते हैं, उन्हें पूरा करने के रास्ते खोजे जाते हैं। लेकिन, बीते साल ने सपनों को आकार तो नहीं दिया, कुचला ज्यादा! दुनियाभर के लोगों ने जैसा सोचा होगा, वैसा तो शायद कहीं कुछ नहीं हुआ! फिर भी इस साल ने ऐसे सबक जरूर सिखाए जो बरसों नहीं, सदियों तक ये दुनिया याद रखेगी! दुनिया ने अभी तक ऐसे संकटों को सिर्फ हॉलीवुड की फिल्मों में ही देखा गया था! लेकिन, फिल्म के अंत में हीरो आकर ऐसी मुसीबत का हल खोज ही लेता था! पर, अभी वायरस का सटीक इलाज किसी के पास नहीं है! शरीर के नकली अंगों से असली जैसा काम लेने वाले चिकित्सा विज्ञानियों ने भी इसके सामने हथियार डाल दिए!    

    दुनियाभर के लोगों ने 2020 में बहुत ख़राब समय देखा। इतना ख़राब, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। अज्ञात खतरा सबके आसपास मंडराता रहा! लोगों का अपनों से विश्वास टूट गया। वायरस ने शारीरिक दूरी के साथ संबंधों में भी दूरियां बना दी। जब साल के शुरूआती महीनों में पूरी दुनिया में हाहाकार मचा था और लोगों पर मौत का खतरा मंडरा रहा था, तब अपने गाँवों से मजदूरी करने आए लाखों मजदूर पैदल ही अपने घरों के लिए निकल पड़े! उन्हें ये तो पता था कि जो खतरा शहरों में है, गाँव उससे मुक्त नहीं है, पर वे निकल पड़े! देश की बड़ी आबादी सड़कों पर आ गई! बिना कुछ सोचे, समझे! लेकिन, इस वक़्त मानवीयता भी अपने घरों से निकली और इन पैदल चल रहे लोगों की हरसंभव मदद की! इस दौर में देश ने इंसानियत भी देखी और मानवीयता भी! जो लोग खाने और पीने की चिंता छोड़कर सड़कों पर आ गए थे, उनकी चिंता लोगों ने की! उन्हें पानी दिया, खाना दिया और ऐसे भी लोग थे, जिन्होंने उनको घर तक पहुँचाने इंतजाम किया! सोनू सूद जैसा चेहरा ऐसी ही मुसीबत में लोगों के लिए देवदूत बनकर सामने आया! आज यदि उसके मंदिर बन रहे हैं, उसे पूजा जा रहा है तो उसी संकटकाल में उसकी मदद का प्रतिफल है। ये वो नई दुनिया है, जो कहीं दुबकी पड़ी थी, पर ऐसे वक़्त में उबरकर सामने आई!   

     एक रिपोर्ट के मुताबिक वायरस संक्रमण के विश्वव्यापी खतरे के बीच दुनिया के 165 देशों के स्कूल और शिक्षा संस्थानों को बंद करना पड़ा! इस कारण करीब डेढ़ अरब से ज्यादा बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ा। स्कूल बंद थे तो 6 करोड़ से ज्यादा शिक्षक भी अपने पढ़ाने के काम से विलग रहे! दुनिया में इस तरह की ये पहली घटना है, जब पूरी दुनिया की शिक्षा संकट से प्रभावित हुई! विश्वयुद्ध के दौर में भी शायद पूरी दुनिया पर ये प्रभाव नहीं पड़ा था! स्कूलों ने इससे निजात पाने के लिए ऑनलाइन पढाई का रास्ता खोज लिया। आश्चर्य की बात यह रही कि छात्रों ने भी इसे आत्मसात करने में देर नहीं की! ये रास्ता  स्कूल की पढाई की तरह कारगर तो नहीं रहा, पर इस संकटकाल में ये उचित ही माना जाएगा। इस सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता कि मुसीबत के दौर में जो समाधान ढूंढ़े गए, सामान्य स्थिति में उनके बारे में सोचना भी संभव नहीं था! यदि ऐसा कोई प्रयोग किया भी जाता, तो उसे स्वीकार्य नहीं किया जाता। निश्चित रूप से शिक्षण पद्धति के मामले में ये एक नवाचार है, जिसका असर भविष्य में देखने को मिलेगा!  

   क्या कभी किसी ने ऐसा सोचा था कि बिना दफ्तर जाए घर में बैठकर दफ्तर का कामकाज सुचारू ढंग से चलाया जा सकता है! लेकिन, संक्रमणकाल में यह सब भी किया गया। जानकारियों के मुताबिक 'वर्क फ्रॉम होम' की परिकल्पना के साकार होने से कम्प्लीट ऑफिस का आसान विकल्प भी मिल गया। आजकल जब सारा काम कागज़ों के बिना ऑनलाइन ही होता है, तो कर्मचारियों को दफ्तर बुलाने की बाध्यता भी इस विकल्प ने ख़त्म कर दी। जो काम कर्मचारी दफ्तर में करते थे, वो घर से होने लगा और नियोक्ता उससे संतुष्ट भी हैं! क्योंकि, अब कर्मचारी उसके लिए 12 से 18 घंटे उपलब्ध होने लगे! उधर, कर्मचारी इसलिए संतुष्ट है कि उसे दफ्तर के तय समय, अनुशासन से मुक्ति मिल गई! 'वर्क फ्रॉम होम' ने नियोक्ता को दफ्तर के खर्च से भी बचा लिया! तय है कि संक्रमणकाल के बाद भी ज्यादातर दफ्तरों में ये वर्क कल्चर बना रहे, तो आश्चर्य नहीं!       

   इस साल न जाने कितने लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने वायरस संकट आने पर अपनी योजनाओं और सपनों का साथ छोड़ा दिया। किसी ने संसाधन की कमी से तो किसी ने आर्थिक कारणों से अपने सपनों को तिलांजलि दे दी। अब ये सपने कब पूरे होंगे, उन्हें भी नहीं पता जिसने सपने संजोए थे। लेकिन, 2020 के संक्रमणकाल ने इसके अलावा बहुत कुछ सिखा दिया। किसी ने किताबें पढ़ने की अपनी पुरानी आदत को फिर जिंदा किया तो किसी ने संगीत, नृत्य और लिखने की आदत को फिर शुरू किया। मुसीबत में सिनेमाघर बंद हुए, टीवी सीरियलों की शूटिंग थम गई तो मनोरंजन के विकल्प के रूप में ओटीटी प्लेटफॉर्म सामने आया। लोगों ने बड़े परदे की जगह मोबाइल और टीवी के परदे पर फ़िल्में और वेबसिरीज देखकर मनोरंजन करके अपना वक़्त गुजारा! इस नजरिए से कहा जा सकता है कि लोगों ने अपने आपसे साक्षात्कार किया। 

   वायरस संकट ने मानव सभ्यता को जीने का नया रास्ता भी दिखाया। आधुनिकता की आँधी और सबसे आगे रहने की होड़ में हम ये भूल गए थे कि प्रकृति के भी अपने नियम कायदे हैं। पर्यावरण को लेकर लोगों में नई चेतना जागृत हुई! शुद्ध हवा, पानी और स्वच्छ प्रदूषण की जरुरत को महसूस किया गया! ये अहसास भी हुआ कि जीने के लिए सिर्फ पैसा ही जरुरी नहीं है, उससे भी जरुरी है हमारे आसपास का परिवेश और हमारे अपने! लोगों ने कतार की जरुरत को भी समझा और स्पर्श के खतरे को भी! दूरियों को जरुरी समझा जाने लगा और इसी से जन्मा ऑनलाइन मनी ट्रांजेक्शन! जिस ऑनलाइन बैंकिंग और ऐसी प्रणालियों को अनुपयुक्त और खतरे वाली समझा जाता था, वे सुरक्षा की गारंटी बन गई! जब व्याख्यानों का सिलसिला शुरू हुआ तो वो भी भौतिक उपस्थिति के बजाए वर्चुअल हो गया। बड़े-बड़े कार्यक्रम वर्चुअल मंचों पर सफलता से आयोजित होने लगे और लोगों ने इसे ज्यादा बेहतर और सुरक्षित समझा! ये जीवन और व्यवस्था में हुए वे बदलाव हैं, जो हमेशा याद किए जाएंगे, अच्छे संदर्भों में भी और बुरे संदर्भों में भी। साल 2020 ने यदि मानव सभ्यता को दर्द दिया है तो कई मर्जों की दवा भी दी है। लेकिन, फिर भी कोरोना से जल्दी निजात पाना जरुरी है।   

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