Thursday, December 05, 2019
महाराष्ट्र की सेक्युलर सरकार - - रहेगा परिणामों का इंतज़ार

महाराष्ट्र की सेक्युलर सरकार - - रहेगा परिणामों का इंतज़ार

मीडियावाला.इन।

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में महाराष्ट्र की नई " सेक्युलर " सरकार ने आकार लेलिया ।
शिवसेना - रांकपा - कांग्रेस ने मिलकर जाजम बिछाई और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को बनाया 
            कई दिनों तक चले नाटकीय घटनाक्रम के दौरान जो कुछ हुआ , किसी भी लोकतंत्र के लिए गर्व का विषय नहीं होसकता । चुनाव पूर्व गठबंधन को मिला बहुमत आपसी क्लेश के चलते छिटक गया , वहीं तीन पृथक विचारों वाले दलों का एक घाट पर आना , जनादेश का अपमान है , तो फडणवीस - अजित पवार का रात के अंधेरे की कारगुजारियां लोकतांत्रिक मूल्यों व परम्परा का उपहास था ।
अब यह कहा जासकता है कि 
 "राजनीति के हम्माम में सब नंगे  हैं । "  देश के 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में संविधान का , प्रचलित परम्पराओं का जब - तब 
लोकतंत्र का " चीरहरण " कमोबेश हर राजनीतिक दल ने सुविधा के अनुसार किया है । अर्थात " सत्ता " महत्वपूर्ण मानी 
" जनतंत्र " की बनिस्बत ? 
            अब बड़ा और खड़ा सवाल यह है कि क्या नई सरकार चलेगी ? हां , कम से कम छह महीने तो पक्के ।
या , सरकार अपने विरोधाभासों या क्षुद्र आंतरिक क्लेशों का शिकार होगी ?  देखना होगा 
 बाला साहेब ठाकरे के ज्येष्ठ पुत्र उध्दव ठाकरे  मात्र 59 वर्ष के हैं , कोई चुनाव नहीं लड़ा , सीधे मुख्यमंत्री बने हैं , विधानसभा चुनाव छह महीने की अवधि में लड़ना होगा , जीतना होगा । 
वे महाराष्ट्र के आठवें मुख्यमंत्री हैं जो विधायक नहीं हैं । प्रदेश के 19 वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली है । गठबंधन के 6 अन्य मंत्रियों ने शपथ ली । उद्धव ठाकरे सबसे जूनियर हैं ।
विधानसभा स्पीकर निर्वाचन के बाद विश्वासमत हांसिल होने के बाद शुरू होगी कवायद , मंत्रिमंडल विस्तार की । दलों की कशमकश रहेगी चयन में ? 
महाराष्ट्र कई संदेश देरहा है ,  भाजपा से क्षेत्रीय दल छिटक रहे हैं , शिवसेना के बाद झारखंड में भी सहयोगी दल पृथक लड़ रहा है । अकाली दल , जनता दल , लोजपा , अगप , आठवले , आदि " कुछ " असहज महसूस करते दिखलाई पड़ रहे हैं ? बताया जाता है कि " घुटन " का परिणाम है तीनदशक का साथ छुटना । यह भी सामने आया कि महाराष्ट्र चुनाव के बाद सीधे बातचीत नहीं होपाई अमित शाह और उध्दव ठाकरे के बीच ? या होने नहीं दी गई ? अहम का प्रश्न युति को तोड़ गया ।
विधायकों को लामबंद करते हुए दलों ने  नजरबंद किया । जयपुर के होटल में रखे गए विधायकों पर 50 लाख से अधिक राशि व्यय की गई । प्रलोभन अपनी जगह था ही ? 
भाजपा का महाराष्ट्र से सत्ताच्युत होजाना बड़ी घटना है । निश्चित यह पीड़ा मोदी - शाह को 
" दुःख " देती रहेगी । तिलस्म टूटने का आधार भी बन सकता है ? मुंबई महानगर पालिका जिसका बजट ही 30 हजार करोड़ से अधिक का है , उस पर भी आंच आसकती है ।
शिवसेना सत्ता में साथ रही तब भी विपक्ष की भूमिका में रही , अपने मुखपत्र सामना में नीतिगत आलोचना करती रही । कांग्रेस से भी लड़ती रही , रांकपा से विरोध रहा । अपने अस्तित्व को नकारते हुए सेक्यूलर गठबंधन किया है । 
सन 1966 से लगातार शरद पवार के रिश्ते बाला साहेब ठाकरे से  भिन्न दलों के बावजूद बेहद नजदीकी रहे हैं । निश्चित ही महाराष्ट्र सरकार की कुंजी उनके पास ही रहना है ।
उध्दव ठाकरे ने पदग्रहण बाद लिए निर्णय में पर्यावरण हेतु  आरे वन क्षेत्र बचाने के निर्देश दिये , भाजपा शासन काल में भी तीव्र विरोध किया था । किसानों को राहत और ऋण मुक्ति  , पावर टैरिफ में कटौती ,  न्यूनतम मूल्य पर भोजन , मामूली शुल्क पर स्वास्थ्य परीक्षण जैसे मुद्दों का उल्लेख किया है ।
अब चिंता इस बात की है कि कोंकणतट पर जैतापुर परमाणु रिएक्टर प्रोजेक्ट का क्या होगा ? 
2008 में कांग्रेस ने बड़ा राजनीतिक मूल्य चुकाकर स्थापित किया , फ्रांस का बहुत बड़ा निवेश इसमें लगा है , वह अब प्रोजेक्ट संबंध में गारण्टी चाहता है । आशंका है , कि परमाणु रिएक्टर प्रोजेक्ट में निवेश बढ़ाये या वापस लिया जाय । देखना होगा ? 
वहीं अहमदाबाद - मुंबई के मध्य प्रस्तावित द्रुतगति बुलेट ट्रेन  चलाने के खिलाफ रही कांग्रेस कैसे समर्थन करेगी ?  तर्क दिया गया था कि प्रस्तावित मार्ग आदिवासियों और सधन वन क्षेत्रों से गुजरेगा यह नुकसानदेह होगा ।
मोदी - शिंजो आबे का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट निशाने पर होगा । इसकी वजह से भी बेचैनी है ।
महाराष्ट्र में सरकार किस दिशा में काम करेगी यह महत्वपूर्ण है । सेक्यूलर को आधार बना कर गठित सरकार पूर्ववर…

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