जीता-हारा कोई हो पर ईवीएम तो जीत ही गई...

जीता-हारा कोई हो पर ईवीएम तो जीत ही गई...

मीडियावाला.इन।

देश के पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव और कई राज्यों में हुए विधानसभा उपचुनाव में परिणामों ने यह साबित करने की पूरी कोशिश की है कि ईवीएम पर होने वाले हमले बेमानी हैं। सबसे अहम चुनाव परिणाम पश्चिम बंगाल के थे, जहां पर देश-विदेश सभी जगह की नजरें टिकी हुई थीं। दीदी और दादा के बीच आमने-सामने की लड़ाई थी, दादा जहां रविंद्र नाथ टैगोर के परिवेश में पश्चिम बंगाल की जनता को जय श्री राम और हिंदुत्व की नाव पर बैठा कर भाजपा की वैतरणी पार करने में लगे थे तो दीदी व्हील चेयर पर टिककर अपनी पार्टी को पश्चिम बंगाल की टिकाऊ सरकार साबित करने में जी जान से जुटी थीं। जिस तरह पश्चिम बंगाल में आठ चरणों में चुनाव की रूपरेखा तैयार हुई थी उससे केंद्र सरकार और चुनाव आयोग दोनों को ही कटघरे में खडा़ किया गया था तो ईवीएम को हमेशा कांग्रेस और विपक्षी दलों ने स्थाई रूप से सलाखों के पीछे डाल ही रखा है। ऐसे में यह बात तय थी कि अगर मोदी,नड्डा और शाह की उम्मीदों के अनुरूप पश्चिम बंगाल में भाजपा 200 पार के नारे पर खरी उतरती तो ईवीएम पर ठीकरा फूटना तथा तथा साथ ही केंद्र सरकार और चुनाव आयोग की मिलीभगत पर मुहर लगना भी तय था। खैर ईवीएम ने अपनी लाज बचा ली और तृणमूल कांग्रेस ने ममता को व्हीलचेयर पर बैठाकर ही मुख्यमंत्री की चेयर पर तीसरी बार दो सौ पार के साथ कब्जा कर लिया है।  कोलकाता की काली माई की पीठ ने पश्चिम बंगाल के इस विधानसभा चुनाव पर ऐसी नजर डाली कि ईवीएम अपनी आबरू को बचाने में सफल रही है और खुद को निष्कलंक साबित कर पाक साफ होने का दावा अब चीख-चीखकर कर सकती है। आगामी लोकसभा चुनाव के समय या अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव, नगरीय निकाय चुनाव, पंचायत चुनाव में ईवीएम खुद अपनी निष्पक्षता का दावा सिर ऊंचा कर करने की हकदार भी हो गई है।

असम में भाजपा की सरकार बनना तय है जो कि पहले से जनता की राय के मुताबिक तय माना जा रहा था। तो तमिलनाडु में परिवर्तन की प्रक्रिया आश्चर्य का कोई मुद्दा नहीं है। चूंकि द्रमुक-कांग्रेस गठबंधन की जीत हुई है सो असल जीत तो ईवीएम की ही हुई है। केरल में भी चुनाव परिणाम अपेक्षाओं पर खरे उतरे हैं और एलडीएफ सत्तारूढ होने को है जो कि ईवीएम को गले लगाने के लिए काफी हैं। तो पुडुचेरी के चुनाव परिणाम भी हैरत में डालने वाले नहीं है। सो कुल मिलाकर ईवीएम सौ फीसदी अंकों के साथ खुद को अव्वल साबित कर आगे मैदान मारने के लिए तैयार है। इसके बाद भी यदि विपक्षी दल-कांग्रेस ईवीएम पर संदेह जताते हैं तो यह दलों की कुंठा साबित करने के लिए काफी होगा। हां फिर भी विपक्षी दल अब भी यह राग अलाप सकते हैं कि मोदी का ईवीएम मैनेजमेंट लोकसभा चुनावों में ही अपना असर दिखाता है। सो इस तरह की बयानबाजी भी हताशा, निराशा और कुंठा के दायरे में ही आएगी। यह ठीक उसी तरह राम को ही कटघरे में खड़ा करेगी जिन्होंने अग्निपरीक्षा के बाद भी सीता को वनवास भेजकर जहां उनकी पवित्रता पर प्रहार किया था तो मनगढंत आरोपों पर मनमाना फैसला लेकर राजधर्म पर भी सवालिया निशान लगाया था। ईवीएम अग्निपरीक्षा दे चुकी है और अब इस पर संदेह करने वालों की मानसिकता को कुत्सित ठहराने के लिए तथ्य मौजूद हैं।

मध्यप्रदेश विधानसभा उपचुनाव की बात कर ईवीएम को विपक्षी दलों की कसौटी पर पूरी तरह से खरा उतरता देखा जा सकता है। यहां पर कांग्रेस को संतुष्ट होने के लिए काफी है कि भाजपा उम्मीदवार अपने बूथ पर भी पिछड़ गयी और स्टार प्रचारक जयंत मलैया के प्रभाव क्षेत्र में भी मुंह की खाई है। कांग्रेस के लिए एक सीट जीतने का कोई खास मतलब नहीं है लेकिन ईवीएम की इज्जत पर चार चांद लगाने के लिए यह बहुत खास है। तो फिलहाल ईवीएम को जिंदगी सिर ऊंचा कर जीने कुछ समय के लिए तो ऑक्सीजन मिल ही गई है, बाद में कोरोना मरीजों की बदनसीबी की तरह ऑक्सीजन कब अंगूठा दिखा दे, यह अलग बात है। फिलहाल तो पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों के उपचुनावों में जीता हारा कोई हो पर ईवीएम तो जीत ही गई...।

RB

0 comments      

Add Comment


कौशल किशोर चतुर्वेदी

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के जाने-माने पत्रकार हैं। इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया में लंबा अनुभव है। फिलहाल एसीएन भारत के स्टेट हेड हैं। इससे पहले स्वराज एक्सप्रेस (नेशनल चैनल) में विशेष संवाददाता, ईटीवी में संवाददाता,न्यूज 360 में पॉलिटिकल एडीटर, पत्रिका में राजनैतिक संवाददाता, दैनिक भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ, एलएन स्टार में विशेष संवाददाता के बतौर कार्य कर चुके हैं। इनके अलावा भी नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित विभिन्न समाचार पत्रों-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन किया है।