Saturday, December 14, 2019
अब नहीं हो सकती एक और 'क्रांति'?

अब नहीं हो सकती एक और 'क्रांति'?

मीडियावाला.इन।

 

भारत के गाँवों की आर्थिक व सामाजिक हालत सुधारने,और हम सब हिन्दुस्तानियों को भरपेट के साथ पौष्टिक खाना भी मिल सके,इसके लिए तीन बहुत बड़े काम सरकारी स्तर पर शुरू हुए थे.ये तीनों काम इतने बड़े थे,या इनसे इतनी उम्मीद थी,कि हमने इन्हें 'क्रांति'का ही नाम दे दिया था.

इन क्रांतियों ने अच्छे-बुरे,जैसे भी परिणाम दिए हों,पर इन्होंने सब कुछ उलट-पुलट कर तो रख ही दिया है.लेकिन,अब हालत यह है कि इन क्रांतियों के लिए जान लगा देने वाले लोग भी इनके दुष्परिणामों से हैरान परेशान हैं.

ये तीन क्रांतियां थीं -साठ के दशक में आई 'हरित क्रांति'. इसके अगले दशक के आते-आते तक आई 'सफ़ेद क्रांति',और सत्तर का दशक ख़तम होते-होते आई 'पीली-क्रांति'.

हरित क्रांति ने हमें खाद्यान्न के मोर्चे पर आत्मनिर्भर बनाया,सफ़ेद क्रान्ति या 'ऑपरेशन फ्लड'से हम दुनिया के सबसे बड़े दूध उत्पादक देश बने.किन्तु,नीति निर्धारकों की कुंठा व अदूरदर्शिता से,खाने के तेल में देश को आत्मनिर्भर बनाने आई 'पीली क्रांति'आते आते तक मर भी गई.

ऐसे लोगों की संख्या अभी भी बहुत बड़ी है,जिन्होंने 1960 के दशक में खाद्यान्न की भीषण कमी देखी है.अमेरिकी लाल गेहूं की रोटी खाई है,और दुनिया के तथाकथित ताकतवरों को भारत की बेइज़्ज़ती करते हुए देखा है.तब हमारे पास न खाने को पर्याप्त अन्न था,और न जरूरी विदेशी मुद्रा थी. दूध और खाद्य तेल के संकट देख चुके लोग तो थोड़े ज्यादा ही संख्या में हैं.

हर क्रांति को हम भारतवासियों ने,पूरे उत्साह से 'सिर माथे'लिया व उसी अनुपात में उम्मीदें भी बाँध लीं. हरित क्रांति' के तहत ज्यादा पैदावार देने वाले विदेशी बीज आये,इनके अधिक उत्पादन के लिए रासायनिक खाद आये और कीट प्रकोप से बचने के लिए विदेशी ही कीटनाशक या कृषि-रसायन भीआये.इन सबने तात्कालिक रूप से निश्चित ही लाभ दिए हैं,पर दीर्घकाल के लिए,बहुत बड़े-बड़े घाव भी दे दिए हैं.हमारे समाज में अब ये घाव असहनीय हो चुके हैं.

शुरू-शुरू में पंजाब 'हरित-क्रांति' का पहला केंद्रबिंदु था.इसलिए सबसे पहले वहीँ इसके दुष्परिणाम भी दिखे.चंडीगढ़ की 'पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल एजुकेशन एन्ड रिसर्च'ने अपनी एक शोध रिपोर्ट में कहा है कि इस राज्य के लगभग शत प्रतिशत लोगों के रक्त में 6 से 13 कृषि-रसायनों,जो विष ही हैं,के अंश पाए जा रहे हैं.

दुर्भाग्य तो यह भी है कि स्तन-पान कराने वाली माताओं के रक्त की स्थिति भी यही है.दुधारू पशु भी इस विभीषिका से पीड़ित हैं.इसीलिए हम सबको मालूम है कि वहां कैंसर पीड़ित लोगों की संख्या अधिक है.वैज्ञानिक तो यहाँ तक कहते हैं कि आप अपनी मर्जी का कोई भी कुआँ चुन लें,कोई भी नलकूप चुन लें,आपको उन विषैले तत्वों के अंश उनके पानी में मिल ही जाएंगे.

बीज समान हैं,फसलें समान हैं,कीट प्रकोप समान हैं,कृषि रसायन समान हैं,और सारे देश में खेती भी एक जैसी होती है,तो हम सब पंजाब जैसी परिस्थितियों से कैसे व कितने दिन बचे रह सकते हैं ? इंदौर जिले का हरसोला और धार जिले का देहरी गाँव गवाही के रूप में हमें बता देंगे कि हम बड़े खतरे की पूरी 'जद' में हैं.

स्वास्थ्य के अलावा आर्थिक मामलों में भी परेशानियां कम नहीं हैं.खाद,बीज,दवाएं,डीजल,बिजली और मजदूर मिलने में तो तकलीफ पड़ती ही है,इनके दामों में भी रोज बढ़ोतरी हो रही है,जबकि कृषि उत्पादन के दाम लगभग स्थिर हैं.

सरकार और समाज की तमाम कोशिशों के बावजूद यह स्थिति बदल ही नहीं रही है.इसीके परिणाम स्वरुप आर्थिक मामलों में किसान और किसानी दोनों पिट रहे हैं.

तथाकथित हरित क्रांति के तहत मची तबाही से हम सब ही नहीं,इस क्रांति के भारत में पितृपुरुष डॉ.एम एस स्वामीनाथन भी उतने ही हैरान परेशान हैं,क्योंकि उन्हें भी तो सब कुछ दिखता ही है.
इस रास्ते में पानी,पैसा,जमीन और इंसान सब बर्बाद हो रहे हैं.पैसा निश्चित रूप से आया होगा,पैसे के साथ ताकत भी आई होगी,पर इसके लिए जो कीमत हमने चुकाई,या चुका रहे हैं,वह ज्यादा भारी है.इस मामले में वैज्ञानिक और शोध या अकादमिक संस्थान जो भविष्य देख रहे हैं,वह और भी भयावह है.
कहते हैं कि वक़्त जब बुरा होता है,तब हवा भी उलटी चलने लगती है और अच्छी खासी आँखें फूट जाती हैं.सरकारें अपनी राजनीति चमकाने के लिए खाद्य सुरक्षा के तहत सिर्फ गेहूं और चांवल ही खरीदती हैं.उन्हीं दो फसलों की खरीद के वादे राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्रों में होते हैं.इसलिए बहुतायत में किसान भी ये ही फसलें उगाते हैं.
इन दोनों फसलों में पानी ज्यादा लगता है,और पानी है नहीं.बड़ी नदियों में पानी कम होता जा रहा है.छोटी नदियां,गाँव के तालाब और भूजल समाप्त हो चुके हैं,फिर भी हम बाक़ी सब को छोड़कर ज्यादा पानी लेने वाले गेहूं और चांवल ही पैदा किये जा रहे हैं.अब तो इन्हें राजनीतिक फसलें ही कहा जाने लगा है.इन दोनों के कारण हमारी बहुमूल्य अन्न-विविधता समाप्त हो गई है.और हम हैं कि समझ ही नहीं रहे.
भगवान ने ही सारी जमीनें सारी फसलों के लिए नहीं बनाई हैं.लेकिन,मध्यप्रदेश के गेहूं उत्पादक गुना,विदिशा,रायसेन,सीहोर और भोपाल जिलों में अब किसान धान की खेती कर रहे हैं.
मेरे एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र श्री विजयमनोहर तिवारी बारिश शुरू होने के पहले विदिशा जिले के अपने गाँव गए थे.उन्होंने देखा कि लोग धान उगाने के लिए खेतों में 'थाले'बनाकर उनमें नलकूप और कुओं से पानी उलीच कर भर रहे हैं.न वे समझने को तैयार हैं,और न कोई उनको समझाने वाला है,कि अब प्रकृति से ही पानी ख़तम होने जा रहा है.उन किसानों की प्राथमिकता और चिंता सिर्फ पैसा है.इस तरह हरित क्रांति ने हमें पैसा देकर हमसे क्या-क्या छुड़ा लिया है, यह हम समझ ही नहीं रहे हैं.
'दूध की क्रांति'के भी वही हाल हैं.भारत की 'फ़ूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी'ने सुप्रीम कोर्ट में माना है कि हमारे देश में सत्तर प्रतिशत दूध और दूध से बनी चीजें मिलावटी बिक रही हैं.पशुओं के लिए चारा है नहीं,गाँवों में पशु चिकित्सक हैं नहीं और पशुओं के लिए पानी व रखने की जगह भी नहीं है.अब वह क्रांति कैसे हमारी जिंदगी बदले.
खाने के तेल में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए आई 'पीली क्रांति'मर चुकी है.हर साल नया कीड़ा और नयी बीमारी आने से किसान ने सोयाबीन से हाथ खींच लिया है.सरसों के साथ आये 'सत्यानाशी'ने सालों से लोगों को डरा रखा है.यहाँ भी कीट-प्रकोप बड़ा संकट है.मूंगफली और तिल्ली के साथ भी अपनी-अपनी मजबूरियां हैं.
'पीली क्रांति'के मरने की गवाही गाँव गाँव में 'भंगार'हो रहे,या सड़ रहे,बंद पड़े कारखाने दे देंगे.देश का पहला या दूसरे नंबर का खाने का तेल बनाने वाला उद्योग समूह बाबा रामदेव को अपना सबकुछ बेचकर घर बैठ गया है.
तीनों क्रांतियों ने सुख के साधन तो खूब ला दिए,पर सचमुच का सुख छीन लिया है.जानकार और समझदार यूं ही नहीं कहते हैं कि देश में भीषण कृषि संकट है,और अब यह संकट इंसानियत का संकट बन गया है.
इसलिए ऐसा नहीं हो सकता कि एक क्रांति ऐसी भी आये जिसमें सारी देशी परिस्थितियों को समझ कर,देशी तरीके से,देशी लोगों के कल्याण की बात हो, क्योंकि पहली तीनों क्रांतियां विदेशों से,विदेशी तरीकों और विदेशों से पढ़कर आये लोगों के मार्फ़त हुई थीं.
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...