हक़ बनते ही क्यों शुरू होती है बर्बादी

हक़ बनते ही क्यों शुरू होती है बर्बादी

मीडियावाला.इन।

आप अपने आसपास खुद देखें.फिर बताएं कि शिक्षा पर दिए जाने वाले भाषणों या सुन्दर और रंग बिरंगे विज्ञापनों और संविधान से जनता को मिले 'शिक्षा के अधिकार' पर आपको भरोसा होता है ?

 

भारत में,शायद भगवान ने ही एक विरोधाभास कर छोड़ा है कि जिस भी चीज़ को आप 'जनता का अधिकार' बना दें, वह खुद-ब-खुद  लापरवाही और बर्बादी के लिए अभिशप्त हो जाती है.

खाद्य सुरक्षा के तहत मिला 'भोजन का अधिकार'  सबको अपनी असफलता के चरम पर दिखता है. पानी के मामले में यह तय हो गया है कि 2020 के आते आते भारत के 21 शहरों का भू-जल समाप्त हो जाएगा या आपके अपने आसपास पानी हजारों फुट नीचे चला गया है.किन्तु,सरकार 'पानी के अधिकार का कानून' बनाने वाली है.

आप कोई एक अधिकार ढूँढ लें, जिसका या तो दुरूपयोग नहीं हो रहा है,या वह अपने उद्देश्य में सफल हुआ है.सारे अधिकार आपके सामने हैं.उनसे सम्बंधित सरकारी विज्ञापन जरूर आपको दिलासा देते हैं कि 'मुस्कुराइए आप स्वर्ग के रास्ते में हैं'.

हमारे देश में  संविधान प्रदत्त 'भोजन के अधिकार' की तरह ही 'शिक्षा का अधिकार'भी अस्तित्व में है. चूँकि नया शिक्षा सत्र शुरू हो चुका है,इसलिए याद कराया जाना जरुरी है कि वहां भी स्थितियां अशोभनीय रूप से चिंताजनक हैं. भारत में एक राष्ट्रव्यापी स्वेच्छिक संस्था है 'CRY '(चाइल्ड राइट्स एंड यू ) .इसने वर्ष 2018 के आखिर आखिर में एक सर्वे किया था. उससे निकला था कि अपने यहाँ 89 प्रतिशत स्कूलों में बाक़ायदे के प्रधान अध्यापक नहीं हैं. शिक्षकों की कमी का आलम यह है कि स्वीकृत से साठ प्रतिशत शिक्षक कम हैं.कई जगह तो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ही बच्चों को पढ़ा रहे हैं.सत्तर से ज्यादा प्रतिशत स्कूलों में खेल मैदान नहीं हैं,या उन पर अतिक्रमण हो चुका है. मध्यप्रदेश की विधान सभा में सरकार ने ही माना था कि यहाँ 97000 स्कूलों में बिजली नहीं है.

 

अब बात उच्च शिक्षा की. मध्यप्रदेश में अभी लगभग 500 सरकारी,617 निजी और 75 के आसपास अनुदान प्राप्त कॉलेज हैं.लेकिन पढ़ाने वालों के लगभग साढ़े पांच हजार पद खाली हैं.पिछले साल प्रदेश के कॉलेजों में पांच लाख के आसपास छात्र भर्ती हुए थे,जो इस वर्ष बढ़ने ही हैं.शायद यह संख्या सवा छह लाख है.

विश्वास कीजिये कि आप मध्यप्रदेश में हैं,जहाँ इतने कॉलेज होते हुए भी सिर्फ आठ-दस नियमित या पात्रता रखने वाले प्राचार्य हैं.शेष सब 'एडहॉक'हैं.यानी प्राचार्य एडहॉक (प्रभारी),शिक्षक एडहॉक,और शिक्षा पद्धति भी एडहॉक. क्योंकि कभी वार्षिक परीक्षा वाली व्यवस्था है,तो कभी सेमिस्टर तो कभी पुनः वार्षिक. यानी, सब कुछ 'एडहॉक'. बस प्रयोग ही प्रयोग . और प्रयोगों के साथ कहीं कोई स्थायित्व देने वाली सोच है ही नहीं.

अब आप ही बताइये कि कभी आपने एडहॉक कलेक्टर,कमिश्नर,सचिव या तहसीलदार और पटवारी कभी एडहॉक सुने हैं,तो फिर यहीं 'एडहॉक'क्यों ? 

सब बड़े लोगों के भाषणों में शिक्षा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण,या प्राथमिकता का विषय होती है,यहीं से देश-प्रदेश या समाज का नेतृत्व निकलना है,तो शिक्षा ही 'एडहॉक'के भरोसे क्यों ?

'एडहॉक'स्टाफ के भरोसे चल रहे अधिकांश कालेजों में साधन,सुविधाएँ और भवन की बातें करने से निराशा और अधिक बढ़ जाती है.इसलिए कभी भी समय मिले,तो छोटे-छोटे कस्बों में खुले कॉलेजों,उनकी छात्र और शिक्षक संख्या या वहां उपलब्ध सुविधाओं को जरूर देखें.आप स्वयं कहेंगे कि अपने देश या राज्य में शिक्षा एक जबरदस्त 'अभिशप्त'विषय है.

विश्वविद्यालयीन शिक्षा से समाज को उम्मीद होती है कि उसकी ज्वलंत समस्याओं पर शोध होकर,उनके समाधान शिक्षा परिसरों से मिलें. लेकिन, वहां भी,गहन निराशा ही हाथ लगती है.

संभव है आपको आंकड़े पढ़ने या सुनने में गुस्सा आता हो,लेकिन वे स्थिति की गंभीरता समझने में या सबको चौंकाने में सहायक तो होते ही हैं.चालू वित्तीय वर्ष में भारत के कुल बजट से लगभग 94000 करोड़ रुपये शिक्षा को मिले थे.यह राशि पिछले साल से दस प्रतिशत ज्यादा है.तब स्थिति यह है.चौंकाने वाले आंकड़े और भी बहुत हैं,पर उनकी बात करने से सिवाय दिल जलने के कुछ भी नहीं होगा.

 

हम भारतीय लोग सरकारी योजनाओं के नाम रखने में बहुत निपुण हैं.उच्च शिक्षा में विकास के लिए एक योजना का नाम रखा गया है 'राइज़'. आप यह शब्द ‘उदय’ के रूप में प्रयोग करते होंगे. किन्तु यहाँ उसका पूरा नाम 'रिवाइटलाइजेशन ऑफ़ इंफ्रास्ट्रक्चर एंड सिस्टम्स इन एजुकेशन' है. इसके तहत शोध को बढ़ावा देने की बात है.

अब यहाँ कोई भी बता दे कि मध्यप्रदेश के किस विश्वविद्यालय में,कोई भी शोध ऐसा पंजीकृत हुआ है जो मालवा,निमाड़,महाकोशल, बघेलखंड या बुंदेलखंड की किसी ज्वलंत समस्या का हल खोजने या उन पर बात करने का काम करता हो.या,कोई ऐसा भी शोध हुआ हो जिसके अंशों को  जन हित  में लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाओं ने छापने योग्य भी समझा हो. ऐसे शोध कार्यों की संख्या नगण्य ही है .

शिक्षा और शोध की इस दरिद्रता पर एक विदेशी विद्वान रिचर्ड फेनमैन की एक बात एकदम सटीक बैठती है कि शिक्षा परिसरों में पहले दर्जे के लोगों ने दूसरे दर्जे के लोगों को भर्ती किया,दूसरे दर्जे के लोगों ने तीसरे दर्जे के लोगों को,और फिर देखते ही देखते  शिक्षा, शोध व विकास की 'भैंस पानी में चली गई'.

मेरे एक मित्र मुझे सुधारते हुए कहते हैं कि आप उम्मीद ही क्यों करते हैं कि पहले दर्जे के लोग शिक्षा के क्ष्रेत्र में आएंगे. उनकी पहली पसंद तो उद्योग,व्यापार,प्रशासनिक सेवाओं आदि से जुड़े क्षेत्र हैं.यहाँ तो कुछेक को छोड़ कर बचे हुए लोग ही आएंगे. अब ऐसे लोगों का दर्जा आप तय कर लें. मान लें कि कोई पहले दर्जे का आदमी अपने शौक के कारण आ भी गया तो क्या वह पीएच.डी. भी अपनी पसंद के विषय पर कर सकेगा. विषय 'गाइड' तय करेंगे और 'गाइड' विश्वविद्यालय. यहाँ तो सारे काम, ‘कॅरियर एडवांसमेंट’ के लिए तथाकथित ‘परफॉरमेंस बेस्ड अप्रेज़ल सिस्टम’ के अंतर्गत नंबर बढ़ाने,जो प्रमोशन के काम आ सकें,के लिए होते हैं. इसके लिए 'येन-केन प्रकारेण'नंबर जुटाने के प्रयासों के आगे, शिक्षकों  के लिए ये 'राइज',उदय और सूर्योदय सब फ़ोकट की बातें हैं.

इतनी निराशा भरी बातें करने के बाद यदि अच्छी बातें न करें,तो अन्याय हो जाएगा. ये सब बुरी बातें किसी न किसी को दिखी जरूर हैं.तभी तो सत्र  2011 -12  को 'गुणवत्ता वर्ष' के रूप में तथा अगला सत्र ‘गुणवत्ता विस्तार वर्ष’ के रूप में मनाया गया था. इसके अंतर्गत परिसरों का जड़त्व तोड़ने के लिए भाषा सुधार,प्रतिभा बैंक,एम्बेसेडर प्रोफ़ेसर या उत्कृष्टता के लिए कई प्रोत्साहन की योजनाएं बनी थीं. ये सब सरकारी योजनाएं थीं.इनके लाभ भी हुए थे,लेकिन विभागीय वेबसाइट पर दिखाई देने के बावजूद ये सारी योजनाएं 

वर्तमान में 'फील्ड'में नदारत हैं.

उच्च शिक्षा विभाग ने ‘गुणवत्ता प्रबंधन’ पर एक मार्गदर्शी पुस्तिका भी प्रकाशित की थी, जो सभी संबंधितों को वितरित भी की गई थी. इसकी सामग्री वेब साईट पर अब भी उपलब्ध है. माना कि ईश्वर ने मनुष्य को पीठ पर आँख नहीं दी हैं. लेकिन मुड़कर पीछे तो देखा ही जा सकता है.

 जिन योजनाओं से अच्छे परिणाम आये थे, उनकी बाक़ायदा मुद्रित किताबें हैं.वे किताबें कहीं न कहीं होंगी जरूर, उनका लाभ लिया जा सकता है, और लिया जाना भी चाहिए. तभी शिक्षा पर दिए जाने वाले भाषणों या सुन्दर और रंग बिरंगे विज्ञापनों की सार्थकता सामने नज़र आने लगेंगी.

 

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कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...