कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया...

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया...

मीडियावाला.इन।

कोरोना की मार ने आज जिस तरह हर व्यक्ति को आईना दिखाया है,उसके बाद यह पंक्तियां पूरी तरह से चरितार्थ हो रही हैं कि कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया...। किसी भी व्यक्ति को यह अंदाजा नहीं था कि कोरोना की दूसरी लहर अपने विकराल और रौद्र रूप में सभी के वहम को कुचल कर रख देगी। सरकारें कितने भी दावे करें लेकिन आज ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जिसने अपने किसी करीबी को अभाव की आग में जलते-जलते मौत के मुंह में जाते हुए ना देखा हो। अस्पताल में आईसीयू बेड के लिए संघर्ष से लेकर रेमदेसीविर इंजेक्शन, दूसरे इंजेक्शन, वेंटिलेटर, प्लाजमा थेरेपी, दवाओं के लिए हर संभव कोशिश करने के लिए मजबूर इंसान का मद तब चूर-चूर हो रहा है, जब संसाधनों की मौजूदगी और संसाधनों के अभाव जैसी दोनों ही परिस्थितियों में परिजनों की सांसें छिन रही हैं। जिन लोगों ने सत्ता के करीबी होने के नाते बेड भी हासिल कर लिया हो, दवाइयां भी उपलब्ध करा ली हों, तब भी वह अपनों को सांसो का तोहफा नहीं दे पा रहे हैं। कोरोना जैसे अदृश्य राक्षस ने ऐसे लोगों को यह अहसास करा दिया कि सर्वशक्तिमान होने का दावा करना छोड़ दो, भलाई इसी में है। अब यह समझ लो कि सत्ता और सरकार में होने या इसके करीबी होने से कोई भी व्यक्ति करोड़पति और अरबपति तो हो सकता है लेकिन चंद सांसें उस धन से नहीं खरीदी जा सकती हैं।

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया... बात निकली तो हर इक बात पर रोना आया। आज हर बात ही रोने को मजबूर कर रही है। सभी राजनैतिक दल कल तक पांच राज्यों के चुनाव में अलग-अलग मैदानों में किस तरह भीड़ को जुटाकर निर्लज्जता की हद पार कर रहे थे।आज उनके परिणाम का भी दिन है। शायद हम सभी ने देखा है कि किस तरह राजनैतिक दल के दिग्गज नेता अपनी उपलब्धियों के लाख दावे कर रहे थे और दूसरे दलों को नाकारा साबित करने पर तुले थे। ऐसा लग रहा था मानो उनकी सरकार बनने पर रामराज्य ही लाने वाले हैं। हालांकि कोरोना की लहर ने आखिरकार उन्हें भी चुनाव प्रचार बंद करने पर मजबूर कर दिया। पर क्या यह सभी लोग निकम्मे हैं या गैर जिम्मेदार हैं या फिर इन्हें नाम मात्र की अक्ल नहीं है कि एक जगह यही लोग सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क, सेनेटाइजर और लॉकडाउन जैसे दूसरे नाटक-नौटंकी करने के लिए आम आदमी को मजबूर कर रहे थे, उपदेश दे रहे थे तो दूसरी तरफ लोकतंत्र के नाम पर भीड़ जुटाकर आम आदमी को मौत के मुंह में धकेलने में धृतराष्ट्र की भूमिका खुशी-खुशी निभाकर छाती चौड़ी करने में खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे? क्या यह सत्ता में आने की भूख का घृणित उदाहरण नहीं है? वही पश्चिम बंगाल अब पॉजिटिविटी रेट में रिकॉर्ड बना रहा है जो कल तक राजनैतिक दलों की चुनावी भट्टी में भीड़ को झौंककर अमानवीयता का इतिहास रच रहा था। नेता मंच से इस तरह हाथ हिला रहा था मानो कोरोना वायरस उसके हाथ के इशारे से ही संचालित हो रहा हो। नेता कहेगा कि स्टॉप तो किसी को न दिखने वाला वायरस भी नेता के हाथ का इशारा देखकर अनुशासन की लकीर के दूसरी तरफ खडा़ हो जाएगा।  
आखिर कौन है इसका जिम्मेदार और किसको सूली पर लटकाया जाए ताकि यह फैसला हो सके की लोकतंत्र के नाम पर भी क्या आम आदमी की जान से खिलवाड़ किया जा सकता है? जितनी धन की बर्बादी लोकतंत्र बचाए रखने के लिए राजनैतिक दल भीड़ जुटाने और भाषण सुनाने में बर्बाद करते हैं, क्या उसी धन से हजारों लाखों वेंटिलेटर, आईसीयू ऑक्सीजन बेड, और हर तरह की दवाइयां नहीं खरीदी जा सकती थी, जिसके अभाव में आज गरीब-अमीर सभी दम तोडने पर मजबूर हैं। चुनाव के समय गाड़ियों में करोड़ों रुपए यूं ही आसन जमाए रहते हैं, मानो बिना पसीना बहाए ही लक्ष्मी अपने राजनैतिक पुत्रों पर हमेशा मेहरबान रहती है और कहती है कि बेटा चिंता मत करना, केवल इतना ध्यान रखना कि लोकतंत्र को बचाने का नाटक खेलने में कोई कोताही न हो।

वाह भाई वाह...क्या मजाक है? नेताओं के पास पैसों का अंबार है और सरकारें कंगाल हैं? आबादी के हिसाब से न अस्पताल हैं, न डॉक्टर हैं और न ही पैरामेडिकल स्टॉफ है। स्वास्थ्य के नाम पर करोड़ों की बंदरबाट के आरोप हर समय मौजूं हैं। आम आदमी का परिवार कोरोना की चपेट में दम तोड़ रहा है, किसी का इकलौता चिराग कोरोना की आग में जल चुका है तो लाखों बेगुनाह सिर्फ इसलिए जान गंवाने पर मजबूर हैं क्योंकि उन्हें कभी यह समझ ही नहीं आया कि उनके अधिकार क्या हैं, लोकतंत्र को बचाने के लिए उन्हें वास्तव में क्या करना है? लोकतंत्र का मतलब क्या सिर्फ एक 
किताब के पन्नो पर लिखी वह धरोहर है जो सरकार बनाने की प्रक्रिया तक सीमित है या फिर लोकतंत्र हर नागरिक को सरकार की तरह समृद्ध बनाने की आत्मा को खुद में संजोए है? यह किसी को नहीं पता लेकिन यह आबादी तो बस लोकतंत्र के नाम पर कठपुतली बनकर ढोंगियों की उंगलियों के इशारे पर नाचती रही है और अंत में मनोरंजन का साधन बनकर खुद पर ही तरस खाने को मजबूर है।
हास्यास्पद पहलू देखिए कि जिन लोगों को संसाधनों के अभाव में आत्महत्या करने पर मजबूर किया जा रहा है, उनकी सिफारिश भगवान से करने में आम से खास आदमी तक को अब भी शर्म नहीं आ रही है। भोलेपन के साथ, हक के साथ या मूर्खता और अदब के साथ यह लिखकर अपनी संवेदनशीलता प्रकट करने में जरा सा भी संकोच नहीं होता कि ईश्वर आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दे। अरे बुद्धिमानो, जो दुनिया तुम्हें मिली थी कि उसे सर्वोत्तम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना, उसे तो नरक बनाने में कोई कमी नहीं रहने दी और अब भी ईश्वर के नाम पर खिलवाड़ करने से बाज नहीं आ रहे। धरती पर खुद को ही भगवान घोषित कर लिया। धरती पर जिनकी हर बात खाली जा रही है, वह ईश्वर से ऐसे सिफारिश कर रहा है मानो ईश्वर के पास सिर्फ एक ही काम पृथ्वीलोक के कथित मठाधीशों की मौखिक सिफारिशों पर बिना पलक झपके अमल करवाना और अपने श्रीचरणों में इतने बंगले बनवा देना कि जो भी पृथ्वी से पहुंचे उसके नाम शानदार बंगला पहले ही आवंटित हो जाए। क्योंकि पृथ्वीलोक से उसके नाम की सिफारिश तो आना तय ही है। अरे भाई सिफारिश करने का मन है तो लैटर हैड पर मुहर लगाकर खुद ही एक बार भगवान के पास जाकर सिफारिश करके देख लो कि बात खाली तो नहीं जा रही। ऐसा तो नहीं कि जिस तरह यहां हर मरीज के लिए आईसीयू बेड नहीं मिल पा रहा, वैसे ही भगवान के श्रीचरणों में जगह न बची हो?
अब भी जाग जाओ लोकतंत्र के रक्षक, पृथ्वीलोक के सर्वशक्तिमान बासिंदो, देवभूमि भारत के कर्णधार वरना तुम्हारी गलतियों की सजा तुम भी भुगतोगे और आम बेगुनाह लोकतंत्र का वह प्रहरी भी, जिसके वोट में उतनी ही ताकत है जितनी सर्वशक्तिमान, देश के कर्णधार के वोट में। श्मशानघाट, कब्रिस्तान में वेटिंग चल रही है और कंधा देने वाला नसीब नहीं हो रहा है। सरकारी आंकड़े फिर भी सच्चाई कबूल करने को राजी नहीं हैं। अब भी किस बदतर हालात की कल्पना जेहन में समाई है? एक बार आत्मविश्लेषण करने का समय नहीं है क्या अब भी ? इंसानियत का कचूमर ऐसे हालात में भी सामने है कि दवाओं और संसाधनों की कालाबाजारी हो रही है, राष्ट्रभक्तों को अब भी शर्म नहीं आ रही कि स्वास्थ्य व्यवस्था का दम घुटा हुआ है...कैसे सरकार की तरफ सम्मान की निगाह से देखा जाए, अस्पताल मालिक पैसा बटोरने में ऐसे लगे हैं जैसे कोरोना केवल इन्हें ही मोटी रकम के  बदले जीननदान देने का वादा कर चुका है। खैर कहानी बहुत लंबी है, बाकी मुद्दों पर बात करें तो भी सच्चाई सभी के सामने है। कोरोना ने यह तो आइना दिखा ही दिया है कि प्रकृति और प्रकोप जाति, धर्म, वर्ग और द्वीपो- महाद्वीपों, देशों-राज्यों और अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, शक्तिमान-दुर्बल, पदासीन और पदहीन में कोई भेद नहीं करते। इसके बाद भी अगर आंखें नहीं खुल रहीं तो इस बिडंबना पर क्या आंसू बहाने के अलावा और कोई विकल्प बचता है? क्या अब भी न कहें कि कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया...बात निकली तो हर इक बात पर रोना आया...।

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के जाने-माने पत्रकार हैं। इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया में लंबा अनुभव है। फिलहाल एसीएन भारत के स्टेट हेड हैं। इससे पहले स्वराज एक्सप्रेस (नेशनल चैनल) में विशेष संवाददाता, ईटीवी में संवाददाता,न्यूज 360 में पॉलिटिकल एडीटर, पत्रिका में राजनैतिक संवाददाता, दैनिक भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ, एलएन स्टार में विशेष संवाददाता के बतौर कार्य कर चुके हैं। इनके अलावा भी नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित विभिन्न समाचार पत्रों-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन किया है।

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