सरकार,किसान और सुप्रीम कोर्ट ... प्रधानमंत्री कहीं नहीं !

सरकार,किसान और सुप्रीम कोर्ट ... प्रधानमंत्री कहीं नहीं !

मीडियावाला.इन।

किसानों के आंदोलन को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के रास्ते ही सही सरकार को सम्मानपूर्वक समेटने का एक अवसर तो मिल ही गया। आगे जो होगा, सो होगा। फिलहाल तो कमेटी के बहाने ही सही सरकार और किसान दोनों की लाज तो बच ही गई। सुप्रीमकोर्ट ने भी सरकार को लताड़ लगाकर यह संदेश देने में कोई कंजूसी नहीं बरती कि आखिर अन्नदाता के पास भी इज्जत का खाता तो है ही, भले ही सत्ता के मुकाबले में उसका बेलेंस निल ही क्यों न हो? अहम बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के बहाने ही सही सरकार ने भी सुकून भरी सांस तो ली ही होगी कि गणतंत्र दिवस पर देश के लाखों किसानों के साथ जद्दोजहद करने की नौबत टल गई। वरना हो सकता है कि सरकार तीन कृषि कानूनों के फेर में किसान विरोधी छवि का दाग खुद पर लगाने पर मजबूर हो जाती, क्योंकि किसान जिस जिद के साथ जीने-मरने की हुंकार भर चुका था...उस गंभीरता को कम करके नहीं आंका जा सकता। आंदोलन के दौरान  किसानों की मौत हो या फिर आत्महत्या का मामला...आखिर किसानों ने साबित कर दिया है कि यदि किसान ठान ले तो उसकी आन,बान और शान पर कोई मैला निशान नहीं लगा सकता। किसान मैले,फटे कपड़े पहनकर भले ही जीवन गुजार दे लेकिन सरकारें ताकत के बल पर उन्हें झुकने पर मजबूर नहीं कर सकती फिर चाहे सरकार मोदी की हो या फिर किसी और की। 

सरकार,किसान और सुप्रीम कोर्ट के बीच इन दो दिनों में जो भी संवाद सामने आए हैं, उससे यह अंदाज कतई नहीं लगाया जा सकता कि भविष्य के गर्त में क्या छिपा है? सरकार के किसान बिलों की जीत होने वाली है, या किसानों की उम्मीदें पूरी होकर किसान बिलों के खात्मे पर मुहर लगने वाली है अथवा कोई बीच का रास्ता निकलेगा जिस पर किसानों और सरकार को सुप्रीम कोर्ट के सम्मान की खातिर अड़ियल रवैया से तौबा करते हुए मध्यममार्ग अपनाने पर रजामंदी देना पडे़गी। पर हो सकता है कि एक बार फिर यह रजामंदी सरकार के तेवर बरकरार रखे और अन्नदाता अपमान का घूंट पीने को खुशी-खुशी राजी होने पर मजबूर हो जाए। और दिल्ली किसानों के लिए इतनी दूर हो जाए कि किसान अपने-अपने राज्य की सीमा तक सिमटकर अपने हौसलों को पंख लगाकर दिल्ली की उडा़न ही न भर सकें। 

 

पर एक बात जरूर है कि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल तीनों कृषि कानूनों को लागू करने पर अगले आदेश तक रोक लगाकर वर्तमान संकट से सरकार को निज़ात दिला दी है। साथ ही समिति का गठन कर चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामासुब्रमण्यम की बेंच ने सरकार को अपनी एक्सरसाइज पूरी करने का भरपूर समय दे दिया है ताकि वे किसान बिलों को अडानी-अंबानी या व्यापारियों के साए से मुक्त कर किसानों की नजर में उनके हितैषी होने का टैग लगा सकें।वैसे कमेटी बनाने की इच्छा सरकार की ही थी ताकि किसान बिलों को नकारने की जगह स्वीकारने के मोड में आने का मन बना सकें। 

अंततः यही माना जा सकता है कि ‌किसान बिलों से पल्ला झाड़ने की बजाय दिक्कत पर मशक्कत करें और दिक्कत मुक्त बिलों पर सहमत होने की राह पर चलें, कहीं न कहीं समिति के बहाने सरकार की मंशा के मुताबिक समाधान की दिशा में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सरकार के हित में एक बड़ा कदम माना जा सकता है। किसान बिलों पर अस्थायी रोक लगाकर कहीं न कहीं समिति के बहाने पिछले 48 दिनों से दिल्ली के किनारों पर चल रहा किसानों का कोहराम थमेगा तो सरकार एक कदम पीछे हटकर दो कदम आगे बढा़ने के लिए खुद को तैयार भी कर सकेगी। पिछले 48 दिनों के दंश से उबरकर अब सरकार अमृत मंथन की प्रक्रिया से गुजारकर किसानों को बिलों को जेहन में उतारने का स्वांग रचने की पुरजोर कोशिश भी करेगी। हो सकता है कि फिर किसानों का विरोध उन्हें ही बदलते वक्त के साथ नायक की जगह खलनायक की भूमिका में खडा़ करने में सक्षम हो जाए और सरकार के साथ समय भी ठहाका लगाता नजर आए। मजे की बात है कि किसान हैं, सरकार है और सुप्रीम कोर्ट है, पर पूरे मामले में प्रधानमंत्री कहीं नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि प्रधानमंत्री से कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह मामले में पक्षकार नहीं हैं। तो देखिए समय किसको क्या मानने पर मजबूर करता है?

 

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कौशल किशोर चतुर्वेदी

श्री कौशल किशोर चतुर्वेदी भोपाल में जाने-माने पत्रकार हैं। वे वर्तमान में न्यूज़ 360 चैनल के एडिटर हैं।