Saturday, December 14, 2019
ईश्वर व कलेक्टर के बीच फंसी मिर्ची बाबा की जान और दिग्विजय...! 

ईश्वर व कलेक्टर के बीच फंसी मिर्ची बाबा की जान और दिग्विजय...! 

मीडियावाला.इन।

अगर वैराग्यानंद जैसे ढोंगी साधु भगवान से मरने की परमिशन मांगे तो भगवान भी बिना आॅफिशियल क्वेरी के ऐसा करने से हिचकते हैं। क्योंकि जो दावे ईश्वर को लूप में लिए बगैर किए जाते हैं, भगवान उनका हिसाब करने में अपना वक्त और साख क्यों जाया करे? मामला भोपाल में मि‍र्ची बाबा ( अंग्रेजी में चिली बाबा) उर्फ महामंडलेश्वर वैराग्यानंद द्वारा अपनी भविष्यवाणी फेल हो जाने पर बतौर प्रायश्चित जल समाधि लेने के पाखंड का है। ‍वैराग्यानंद को हाल के लोकसभा चुनाव के पहले कम से कम मप्र में कोई नहीं जानता था। शायद इसीलिए उन्होंने मौके की नजाकत को भांप कर वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजयसिंह की भोपाल सीट से जीत के लिए प्रदेश की राजधानी में पांच क्विंटल मिर्ची का यज्ञ किया ( देवताअों ने इसे किस रूप में लिया, पता नहीं)। इस यज्ञ से दिग्विजयसिंह को चुनाव में शायद ही कुछ फायदा हुआ सिवाय इसके कि मिर्ची की धूनी फैलने से भोपाल की फिजा कुछ देर के लिए खराब हुई।
स्वामी वैराग्यानंद कौन हैं, कहां से आए, दिग्विजय को जिताने के लिए मिर्ची तक का जोर लगाने के पीछे उनकी असल मंशा क्या थी, मिर्ची यज्ञ करने के लिए किस मुंहलगे ने उनसे कहा था, दिग्विजय के सुलभ व्यक्तित्व को मिर्ची से जोड़ने का क्या मकसद था, अगर ‍िदग्विजय जीत जाते तो बाबा इस अयाचित यज्ञ के बदले में कौन सी राजनीतिक फिरौती वसूलते, ये तमाम सवाल अभी अनुत्तरित हैं। लेकिन बाबा के फर्जीवाड़े की पर्तें उनके अपने बयानों और कर्मों से खुलती जा रही हैं, यह तय है। बाबा के बारे  में थोड़ी बहुत जो जानकारी मिली है, उसके मुताबिक उन्होंने गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर में कोई तांत्रिक साधना की है। बाद में जुगाड़ से महामंडलेश्वर की पदवी भी हासिल कर ली। ( यह प्रतिष्ठित पद भी आजकल राजनीतिक पदों की रेवड़ी  की माफिक हो गया है)। भोपाल में हो रहे तथाकथित ‘चुनावी धर्मयुद्ध’ में बाबा ने अपनी जमीन तलाशी और लोकसभा चुनाव के पहले मीडिया के सामने पुरजोर दावा किया कि वे ‘दिग्विजय की जीत के लिए ‘ दिग्विजय यज्ञ’ कर रहे हैं। यज्ञ की सफलता में उन्हें तिलमात्र भी संदेह नहीं है, क्योंकि दिग्विजय हर हाल में चुनाव जीत रहे हैं। अगर दिग्विजय हारे तो मैं उसी हवन कुंड में समाधि ले लूंगा। ( बाद में बाबा ने इसे जल समाधि में तब्दील कर दिया। क्योंकि कुंड की अग्नि में खुद को स्वाहा करने की तुलना में जल में डूबना कम पीड़ादायक है)। अपने दावे पर राजनीतिक मुलम्मा चढ़ाने के लिए मिर्ची बाबा ने दिग्विजय की प्रतिद्वंद्वी भाजपा प्रत्याशी और विवादास्पद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के बारे में जातिवादी कमेंट किया कि चूंकि वे ठाकुर हैं, इसलिए साध्वी हो ही नहीं सकती। 
लेकिन चुनाव नतीजों से साबित किया कि बाबा पूरी तरह हवा में थे। जिस मिर्ची का धुंआ उन्होंने साध्वी के लिए किया था, वह उसने यज्ञशाला को ही धुएं से भर दिया।  चुनाव में दिग्विजय की करारी हार के बाद बाबा गुपचुप अंतर्ध्यान हो गए। जब मीडिया ने बाबा को  अपना ‘वचन’ पूरा करने की याद दिलाई तो  पहले तो वे कन्नी काटते रहे क्योंकि समाधि लेने के लिए भी आत्मबल चाहिए। बाद में किसी सलाहकार ने उन्हें अपने ‘वचन’ को भी राजनीतिक रूप में भुनाने की नेक सलाह दी तो बाबा ने भोपाल लौटकर जल समाधि लेने के लिए जिला कलेक्टर से लिखित परमिशन मांगी। गोया कलेक्टरेट में इसका भी कोई महकमा हो, जो मरण अनुज्ञा जारी करता हो। इसके मुताबिक बाबा  निर्धारित तारीख को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट पर राजधानी की शीतलदास की बगिया ( यहां गणपति और दुर्गा विसर्जन होता रहा है और गोताखोर भी तैनात रहते हैं) में जल समाधि लेने वाले  थे। जाहिर है कि कलेक्टर ने ऐसी  कोई परमिशन नहीं दी। उधर  बाबा भी ढाई बजे तक मौके पर नहीं पहुंचे। खिसियाए वैराग्यानंद ने मीडिया के सामने कहा कि प्रशासन अगर 20 जून तक समाधि की अनुमति नहीं देगा, तो वे अन्न- जल त्याग देंगे। इस बीच निरंजनी अखाड़े  ने मिर्ची बाबा को महामंडलेश्वर पद से हटा दिया। फिलहाल मिर्ची बाबा पुलिस की ‍निगरानी में हैं और उनका किंतु- परंतु जारी है। 
यहां कुछ सवालों के जवाब तथा बाबा, भगवान और कलेक्टर के बीच जल समाधि की परमिशन और उसकी आ‍फिशियल प्रोसीजर को लेकर कुछ संशय बाकी हैं। पहला सवाल तो यह कि अगर मिर्ची बाबा ने जल समाधि के माध्यम से इहलीला समाप्त कर स्वर्ग ( या नर्क ?) जाने की अनुमति जिला कलेक्टर से मांगी तो क्या  दिग्विजय यज्ञ करने और असफल होने पर जल समाधि लेने की घोषणा करने की इजाजत भी उन्होंने कलेक्टर से ली थी? अगर  बाबा का सीधा कनेक्शन भगवान से है तो उन्हें कलेक्टर जैसी इंसानी व्यवस्था से एनअोसी लेने की क्या जरूरत? क्या इसलिए कि कलेक्टर को किसी को मरने की अनुमति देने का अधिकार नहीं है?  
बहरहाल मिर्ची बाबा ने जल समाधि को लेकर जो धूनी ईश्वर, कलेक्टर, राजनेताअों और पब्लिक की आंखों में झोंकने की कोशिश की है, वह सार्वजनिक जोक का विषय बन गया है। मसलन मिर्ची बाबा ने ऊपर वाले से मरने की परमिशन मांगी ( क्योंकि ऊपर जाने के लिए अर्जी वहीं लगानी पड़ती है) । बाबा ने कहा कि परमिशन न मिली तो मैं स्वर्ग के गेट पर सीएम हाउस की सिक्योरिटी चैकिंग  की माफिक अटक जाऊंगा। मेरी आत्मा यही नेताअों के इर्द‍ गिर्द भटकती रहेगी। चूंकि   ऊपर वाला भी सियासी मामलों में सीधे हाथ नहीं डालता। इसलिए उसने बाबा से कहा कि परमिशन के पहले हमे भी कलेक्टर से रिपोर्ट लेनी  पड़ेगी। कलेक्टर ने बताया कि  मामले की जड़ में दरअसल  दिग्विजय सिंह हैं। अगर वे चुनाव न हारते तो एक बाबा की जान जाने की नौबत न आती...!   

 

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अजय बोकिल

जन्म तिथि : 17/07/1958, इंदौर

शिक्षा : एमएस्सी (वनस्पतिशास्त्र), एम.ए. (हिंदी साहित्य)

पता : ई 18/ 45 बंगले,  नार्थ टी टी नगर भोपाल

मो. 9893699939

अनुभव :

पत्रकारिता का 33 वर्ष का अनुभव। शुरूआत प्रभात किरण’ इंदौर में सह संपादक से। इसके बाद नईदुनिया/नवदुनिया में सह संपादक से एसोसिएट संपादक तक। फिर संपादक प्रदेश टुडे पत्रिका। सम्प्रति : वरिष्ठ संपादक ‘सुबह सवेरे।‘

लेखन : 

लोकप्रिय स्तम्भ लेखन, यथा हस्तक्षेप ( सा. राज्य  की नईदुनिया) बतोलेबाज व टेस्ट काॅर्नर ( नवदुनिया) राइट क्लिक सुबह सवेरे।

शोध कार्य : 

पं. माखनलाल  चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि में श्री अरविंद पीठ पर शोध अध्येता के  रूप में कार्य। शोध ग्रंथ ‘श्री अरविंद की संचार अवधारणा’ प्रकाशित।

प्रकाशन : 

कहानी संग्रह ‘पास पडोस’ प्रकाशित। कई रिपोर्ताज व आलेख प्रकाशित। मातृ भाषा मराठी में भी लेखन। दूरदर्शन आकाशवाणी तथा विधानसभा के लिए समीक्षा लेखन।  

पुरस्कार : 

स्व: जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी उत्कृष्ट युवा पुरस्कार, मप्र मराठी साहित्य संघ द्वारा जीवन गौरव पुरस्कार, मप्र मराठी अकादमी द्वारा मराठी प्रतिभा सम्मान व कई और सम्मान।

विदेश यात्रा : 

समकाालीन हिंदी साहित्य सम्मेलन कोलंबो (श्रीलंका)  में सहभागिता। नेपाल व भूटान का भ्रमण।