मध्यप्रदेश-शिक्षण संस्थायें अनलॉक- जिम्मेदारी और चुनौतीपूर्ण कार्य

मध्यप्रदेश-शिक्षण संस्थायें अनलॉक- जिम्मेदारी और चुनौतीपूर्ण कार्य

मीडियावाला.इन।

मंदसौर। प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की शिक्षण संस्था कार्यक्रम में की घोषणा से शिक्षा क्षेत्रों में उत्साह का संचार हुआ है। कोई डेढ़ वर्ष से कोविड19 महामारी से लगभग बन्द पड़ी शिक्षा व्यवस्था पुनः व्यवस्थित रूप से आरम्भ किये जाने की आशा बंधी है। आशंका के बादल फिर भी हैं क्योंकि डब्ल्यू एच ओ और चिकित्सा विशेषज्ञों ने डेल्टा वेरिएंट की दस्तक के साथ तीसरी लहर आने के संकेत भी दिये हैं। 

बहरहाल देश और प्रदेश में कोरोना की दूसरी लहर बहुत हद तक नियंत्रण में बताई जा रही है। प्रतिदिन के आंकड़ों में हुए सुधार से केंद्र और राज्यों की सरकारें अनलॉक प्रक्रिया सुगम और सरल बनाने में जुट गए हैं। 

सही मायने में तो महामारी के दौर में बचपन और शिक्षण बुरी तरह प्रभावित हुआ है। समूची व्यवस्था, आकस्मिक आपदा की प्रथम और द्वितीय लहर की भेंट चढ़ गई। कोविड प्रकोप ने शासन-प्रशासन-अभिभावकों और विद्यार्थियों के समक्ष कोई विकल्प नहीं छोड़ा फलस्वरुप समस्त निजी और शासकीय शिक्षण संस्थान बन्द करना पड़े। कहीं कम तो कहीं ज्यादा शिक्षा के प्रयोग हुए, ऑनलाइन पढ़ाई का जोर रहा, कहीं सफल रहे तो कहीं समस्या बढ़ाने वाले भी सिद्ध हुए।

अप्रत्याशित स्थिति के लिये किसी भी स्तर पर कोई तैयारी नहीं देखी गई। परिणाम बच्चों को और अभिभावकों को अधिक भोगना पड़े हैं। शिक्षा शास्त्रियों की माने तो कम से कम दो शिक्षा सत्रों का नुकसान बच्चों और किशोरों का हो गया है।

अब जब केंद्र सरकार देश में नई शिक्षा नीति का प्रारूप प्रस्तुत कर चुकी है। उस पर विभिन्न स्तरों पर विमर्श भी चल रहा है इसी दौरान कोविड संक्रमण की असामान्य स्थितियां बन गई। ऐसे में शिक्षा क्या देश और प्रदेश में सभी गतिविधियां प्रभावित हुई हैं। 

मुख्यमंत्री की घोषणा में कहा गया है कि जुलाई अंतिम सप्ताह में प्रदेश के विद्यालयों में क्षमता से आधी उपस्थिति के साथ कक्षाएं शुरू होंगी। सरकार के अनुकूल रहने पर स्वतंत्रता दिवस तक समस्त स्कूल-कॉलेज खोले जाएंगे।
यहां गौर करने वाली बात है कि शासकीय शिक्षण संस्थायें बन्द रही उनके स्टॉफ, शिक्षकों, प्राध्यापकों को वेतन भत्ते आदि मिलते रहे जबकि इसी अवधि में निजी शिक्षण संस्थान के स्टॉफ, टीचर्स और प्राध्यापकों को वेतन कटौती होती रही। कई स्कूलों में अब भी जारी है। इनमें सीबीएसई और माध्यमिक शिक्षा मंडल से सम्बद्ध स्कूल भी शामिल हैं। अनेक विद्यालयों में ऑनलाइन पढ़ाई चली। कुछ समझ आई-बहुत कुछ समझ नहीं आई। पर कोई अन्य उपाय जो नहीं था।

इसका दुष्प्रभाव निजी शिक्षण संस्थाओं के संचालकों को भी उठाना पड़ा, जब उन्हें छात्रों से शुल्क नहीं मिल पाया, वहीं अभिभावकों का तर्क यह रहा कि स्कूली पढ़ाई नहीं तो शुल्क भी नहीं। उभय पक्ष आमने-सामने की स्थिति में रहे और सोलह महीने बीत गए। यह निश्चित हो गया कि विद्यार्थियों, अभिभावकों विशेषकर माताओं, सरकारों, शिक्षण संस्थाओं, शिक्षकों को विभिन्न प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। अब इन बदली परिस्थितियों में सभी पक्ष अपने को कितना तैयार कर पाए हैं यह तो आने वाले कल पता चलेगा? 

अन्य पक्षों की नुकसानी कम-ज्यादा हुई हो पर बचपन का, बच्चों का, विद्यार्थियों का, किशोरावस्था का सर्वाधिक नुकसान हुआ है। उनका स्वाभाविक विकास, सामाजिकता, स्कूली शिक्षण, प्रतिस्पर्धा, खेल, सांस्कृतिक गतिविधि, प्रगति  आदि भी अवरुद्ध हुआ है। अब राज्य और केंद्र सरकार ने छात्र जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव 10 वीं और 12 वीं के परिणाम सीधे अंकों के आधार पर क्रमोन्नत (Pramotion) का किया है। विकल्प भी दिया है वह कितना कारगर होगा, पता नहीं? यह भविष्य का रोड़ा तो बनेगा ही। 
स्मरण आता है जब प्रदेश में अर्जुनसिंह मुख्यमंत्री काल में अंग्रेजी हटाओ आंदोलन चला और बिना पढ़े अंग्रेजी में पास माना गया, परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजी से विमुख वह पीढ़ी आज तक भोग रही है। अंग्रेजी नहीं पढ़ना प्रगति में बाधक सिद्ध हुआ है। कोई सहमत नहीं हों पर यह हकीकत है। 

वर्तमान हालातों में देश भर के कोई 25 करोड़ बच्चे वास्तविक स्कूली शिक्षा से दूर रहे हैं। दुनिया के पौने दोसो देशों में संक्रमण काल में कमोबेश स्कूली शिक्षा चलाने के जतन किये। दुष्काल के गम्भीर समय बन्द भी रखे गए। 

अब समय आगया है जब देश-प्रदेश के नीति नियन्ता कोविड की तीसरी लहर की दस्तक के बीच गंभीरता से विचार करें कि कैसे स्कूलों-कॉलेजों, कोचिंग सेंटरों, शिक्षा केंद्रों में सुचारू शिक्षण हो-व्यवस्थित संचालन हो। यह दायित्व सभी पक्षों का है। थोड़ी भी लापरवाही किसी की जान पर आ सकती है। 

ऑनलाइन पढ़ाई में जहां वर्गीकरण भी हुआ, असंख्य अभिभावकों को अपने एक से अधिक बच्चों को ऐनरोइड मोबाइल उपलब्ध करा पाना, गरीब और कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों को वंचित रहना पड़ा, टी वी पर सरकारी प्रयास हुए पर वे नाकाफ़ी ही रहे। फिर हमारे देश में गुरुकुल शिक्षा पद्धति प्रचलित थी, अब स्कूलों में खुली व्यवस्था है।सामूहिक शिक्षा के साथ बच्चों का सर्वांगीण विकास होता है वह अवरुद्ध हुआ। कई बच्चों के आचार-विचार-व्यवहार में अंतर देखा गया। प्रतिदिन स्कूल जाने वाले बच्चे शब्द-अंक, गुणा-भाग, अल्फ़ा बेट तक भूल गए। सबसे अधिक तो मुक्ताकाश में खेलना, दौड़ना-दौड़ाना, मिलना-जुलना, हंसना-बोलना जैसे स्वाभाविक उपक्रम तक छूट गए। 

अगले सप्ताह से ही जब स्कूल खोले जाएंगे अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी क्योंकि कोविड प्रथम लहर बाद तकरीबन सब अनलॉक किया गया था, शिक्षण संस्थाओं को छोड़कर, दूसरी लहर से नियंत्रित होने के बाद पहली बार स्कूल-कॉलेज-कोचिंग-सिनेमाघर ओपन होंगे। 18 वर्ष से अधिक आयु को वैक्सीनेशन किया जा रहा है। जबकि 12 वर्ष या कम आयु को टीका नहीं लगाया जा रहा। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर चिकित्सा व शिक्षा शास्त्रियों की सहमति आधार पर व्यापक कार्य योजना लागू करना होगी जो शिक्षा-शिक्षक और विद्यार्थियों के लिये फुलप्रूफ हो। यह व्यवस्था देखने की जरूरत है कि स्कूलों में रूम साफ़ हों, वेंटिलेशन पर्याप्त हो, सभी प्रोटोकॉल और गाइडलाइन का अनिवार्य पालन करें।

विद्यालय प्रांगण में ओपन एयर (खुले में) क्लास लगाने की तैयारी, विशेष रूप से कक्षा नौंवी से बारहवीं तक के बच्चों का ध्यान रखना होगा। हालातों के मद्देनजर अन्य पक्षों के साथ अभिभावकों की भागीदारी बढ़ानी होगी। बच्चों को भी जिम्मेदार बनना होगा। यूं देखा जाय तो शिक्षा व्यवस्था में कोविड के कारण आमूल परिवर्तन हुआ है। सभी संबंधित पक्षों ने स्वयं को तैयार किया है। निश्चित ही गाइड करने की आवश्यकता है। 

शिक्षक जहां रचनात्मक, मानसिक और शारिरिक कौशल के साथ सामाजिक रूप से सुदृढ़ हुए हैं वहीं अभिभावकों को समझ आया है कि उनका बच्चा कितने स्तर पर है, विशेषकर माताओं को अपने नियमित समय में से ऑनलाइन पढ़ाई के लिये समय निकालना पड़ रहा है। यहां सतर्कता की ज्यादा जरूरत है, मोबाइल में शिक्षा के साथ अशिक्षा-अश्लीलता और अवांछित सामग्री भी उपलब्ध है उससे बच्चों को बचाना भी है। 
देश-प्रदेश की युवा और किशोरावस्था की पीढ़ी को सर्वांगीण विकास के लिये उपयुक्त और अनुकूल वातावरण देना सरकार के साथ समाज की भी महती जिम्मेदारी है। यही देश का भविष्य भी है और आनेवाले कर्णधार भी। RB

घनश्याम बटवाल

 डॉ . घनश्याम बटवाल 

       मंदसौर 

       14 अगस्त 1955 

संपादक- शिवना की पुकार, मंदसौर

ब्यूरो प्रमुख- फ्रीप्रेस (English) इंदौर

                 दैनिक आर्यावर्त, भोपाल

विशेष प्रतिनिधि- मीडियावाला.इन


🔸संवाददाता रहे- 

    नईदुनिया इंदौर, 

    राजस्थान पत्रिका उदयपुर, जयपुर

    दैनिक सांध्यप्रकाश भोपाल

    दैनिक विश्वभ्रमण इंदौर 

    दैनिक राज एक्सप्रेस इंदौर 

     दैनिक भावताव, इंदौर 

     सा. राज्य की नईदुनिया, भोपाल


🔸 शिक्षण एवं अन्य योग्यता

बी ए (1977) विक्रम उज्जैन

वैद्य विशारद (1982) इलाहाबाद 

विद्या रत्न उपाधि , अजमेर 

रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट 

(म.प्र. फार्मेसी कॉउंसिल भोपाल)

रजिस्टर्ड चिकित्सक 

(म.प्र.आयुर्वेदिक चिकित्सा बोर्ड) भोपाल

🔸 राज्य स्तरीय अधिमान्य पत्रकार

       जनसंपर्क विभाग (म.प्र. शासन)


🔸 पत्रकारिता एवं लेखन 

वर्ष 1978-79 से निरंतर 

अमर उजाला, दैनिक आज, स्वदेश, चौथा संसार, दैनिक भास्कर उज्जैन, मालवांचल उज्जैन, फ्रीप्रेस हिंदी इंदौर, चेतना रतलाम, स्वतंत्र ऐलान रतलाम, एम पी क्रोनिकल भोपाल,

खेल हलचल, नफा नुकसान जयपुर, व्यापार मुंबई , संडे ऑब्ज़र्वर, संडे मेल नईदिल्ली, मध्यप्रदेश पंचायिका, रोजगार निर्माण, भोपाल, पर्यावरण डाइजेस्ट, आंचलिक पत्रकार, सहित्यांचल भीलवाड़ा, कडुआ घूंट राजनांदगांव, श्रमजीवी पत्रकार बुलेटिन भोपाल, दैनिक ध्वज, दशपुर दर्शन, गुरु एक्सप्रेस  (सभी मंदसौर) नई विधा, मालवा आजतक, मालव दर्शन (सभी नीमच) सहित अन्य में सम-सामयिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन निरंतर 


🔸 संपादन - 

साहित्य संग्रह- उत्थान (2017)

उत्कर्ष (2018) यथार्थ (2019) 


सोलह संस्कारों विशेष कर विवाह संस्कार केंद्रित पुस्तिका (2006) 


बांछड़ा समुदाय स्थिति अध्ययन, आकलन (निर्मल अभियान) 

प्रकाशन 


🔸 सम्मान - - -

∆ अखिल भारतीय देवगिरी खोजी पत्रकारिता सम्मान, औरंगाबाद 

महाराष्ट्र (1996) 


∆ मध्यप्रदेश आंचलिक पत्रकार संघ, भोपाल स्थापित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता पुरस्कार (1997) 


∆ रेडक्रॉस द्वारा उत्कृष्ट सेवा सम्मान 

राज्यपाल डॉ. भाई महावीर प्रदत (2000) 


∆ सहित्यांचल पत्रकारिता शिरोमणि सम्मान ,भीलवाड़ा (2011) 


∆ स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार स्व. कन्हैयालाल वैद्य आंचलिक पत्रकारिता पुरस्कार (मध्यप्रदेश शासन जनसंपर्क विभाग 2015) 


∆ सामाजिक सरोकारों के लिये आंचलिक पत्रकारिता सम्मान,

माधवराव सप्रे संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल (2017) 


🔸 रुचियां - - -

सामाजिक, सांस्कृतिक, पुरातत्व, राजनीतिक, साहित्य, व्यंग्य, पर्यावरण, खेल, कला, संस्कृति, मीडिया, संगीत, कृषि, मार्केट आदि पर लेखन-वार्ता, गोष्टी


🔸 फुटबॉल, क्रिकेट, बेडमिंटन खिलाड़ी 


♦️ मोबाइल- 

94251 05959 

70004 22254 


Email- drgbmdsr@gmail.com

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