Thursday, December 05, 2019
गोडसे किसका भगवन है ?

गोडसे किसका भगवन है ?

मीडियावाला.इन।

मोहनदास करमचंद गांधी की हत्या कर नाथूराम गोडसे को देशभक्ति का तमगा पहनाने वाले लोगों को लेकर यदि देश की संसद गर्म होती है तो सोचना पड़ता है कि ऐसे लोगों को संसद में चुनकर भेजने वाले लोग कैसे हैं ?गोडसे को अपना भगवान मानने वाली भोपाल की सांसद भाजपा की सदस्य हैं ।
कुल 49  साल की साध्वी प्रज्ञा भारती ने, न महात्मा गांधी को देखा है और न उनकी हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे को ,लेकिन वे गोडसे की मुरीद हैं ।उन्हें किसने गोडसे का मुरीद बनाया ,उन्हें ऐसे अराष्ट्रवादी संस्कार कहाँ से मिले ? ये सब जाने बिना प्रज्ञा के अज्ञान पर संसद में हंगामा करने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है ।
इस देश में आज से नहीं अपितु महात्मा गांधी के महात्मा घोषित होने के बाद से ही उनके जितने समर्थक थे उतने ही विरोधी भी ।वे जिन लोगों के साथ काम करते थे उनमें भी गांधी के विरोधी थे लेकिन उनकी मानसिकता बर्बर नहीं थी ।देश की जनता गांधी की मुरीद थी और उनके आव्हान पर जब जरूरत हुई तब उठ खड़ी हुई ।गांधी जैसी ये ताकत उनके किसी विरोधी में नहीं थी।गांधी के हत्यारे में तो इसका अंशमात्र नहीं था ,लेकिन दुर्भाग्य ये है कि आज भी गांधी का हत्यारा प्रज्ञा भारती समेत उन जैसे अनेक लोगों के लिए पूज्य और सम्माननीय है ।हमारे अपने शहर ग्वालियर में गोडसे को 'गॉड' मानने वाले मुठ्ठी भर लोग उसकी प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करते हैं ,क्योंकि वे नहीं जानते कि हत्यारों की पूजा भारतीय समाज में वर्जित है ।
गोडसे पर लोकसभा में बयान देकर सुर्ख़ियों में आई साध्वी प्रज्ञा का पूरा नाम प्रज्ञा सिंह ठाकुर है,वे मध्यप्रदेश के भोपाल - सीहोर लोकसभा क्षेत्र की सांसद हैं । उन्हें आतंकी गतिविधियों के आरोपों के लिए गिरफ्तारी का सामना करना पड़ा, लेकिन विशेष राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) द्वारा मकोका धारा के तहत आरोप छोड़ने के बाद उन्हे जमानत दे दी गई।वे तब सुर्खियों में आयीं जब सन 2008 में उन पर मालेगाँव में हुए बम विस्फोंटों में आरोपी बनाया गया था और उन्हें गिरफ्तार किया गया था।सन 2019 के प्रयागराज कुम्भ के अवसर पर उन्हें 'भारत भक्ति अखाड़े' का आचार्य महामण्डलेश्वर घोषित किया गया था और अब वे 'महामण्डलेश्वर स्वामी पूर्णचेतनानन्द गिरी' के नाम से जानी जाती हैं।
प्रज्ञा को ही नहीं, मै संयोग से उनके पूरे कुनबे को जानता हूँ ,लेकिन मुझे ये मानने में कोई गुरेज नहीं है कि वे महामंडलेश्वर हैं इसलिए मुझसे अधिक 'प्रज्ञ' और 'विज्ञ' तो होंगी ही ।बावजूद इसके मुझे हमेशा प्रज्ञा पर दया आती है,उसके प्रति मै सहानुभूति भी रखता हूँ क्योंकि वो जो भी करतीं हैं या कर रहीं हैं उस पर उनका कोई काबू नहीं है ।प्रज्ञा जिन स्कूलों में पढ़ीं हैं या उन्हें जहां भी संस्कारित किया गया है ,सारा दोष उनका है ।प्रज्ञा तो केवल एक माध्यम है जिसका इस्तेमाल वे संस्कार कर रहे हैं जो दूषित  हैं या गांधी को राष्ट्रभक्त या राष्ट्रपिता नहीं मानते ।प्रज्ञा की विवशता ये है कि उन्होंने जो पढ़ा या समझा है उसे कभी कसौटी पर नहीं कस सकतीं ।
संसद को गर्म कर सुर्ख़ियों में रहना और अपने अभियान को जीवित रखना उनका मकसद था और वे इसमें कामयाब रहीं ।कांग्रेस समेत अनेक दल और संसद के बाहर उनका जितना विरोध होना था उससे कहीं ज्यादा हो गया ,यही प्रज्ञा और उनकी पार्टी का मकसद था ।प्रज्ञा जिस पार्टी से सांसद हैं उस पार्टी के लिए गांधी को संसद और सरकार में बैठकर कोसना मुमकिन नहीं है ।सरकार को अंतत: देश के जन मानस के साथ खड़ा होना पड़ता है इसलिए भाजपा ने दंड स्वरूप प्रज्ञा को एक सलाहकार समिति से हटा दिया ,इससे क्या बनना,बिगड़ना है प्रज्ञा का ? ये तो उनके लिए पुरस्कार है ।
भाजपा में इतना साहस नहीं है की वो प्रज्ञा के मुंह से कही गयी बात का समर्थन  कर सके,जबकि पूरी पार्टी का अभिमत वो ही है जो प्रज्ञा का है ,प्रज्ञा महामंडलेश्वर है,वो इतनी विज्ञ तो है की पार्टी लाइन को जाने-पहचाने ! मेरे ख्याल से प्रज्ञा ने वो सब किया जो उसकी पार्टी चाहती थी ।भाजपा न प्रज्ञा को पार्टी से बाहर कर सकती है और न भारत भक्ति अखाड़ा उससे महामंडलेश्वर की उपाधी वापस लेने वाला है ,क्योंकि प्रज्ञा भाजपा और भारत भक्ति अखाड़े  की दृष्टि में दोषी है ही नहीं ।प्रज्ञा के संस्कार किसी आसमान की देन नहीं है।आपको जानना होगा कि प्रज्ञा को प्रज्ञा बनाने में किस-किसका हाथ है ।प्रज्ञा ठाकुर के पिता डॉ। चंद्रपाल सिंह एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक डॉक्टर थे और प्राकृतिक जड़ी बूटियों से मरीजों का इलाज करते थे। प्रज्ञा सिंह ठाकुर मध्यप्रदेश के चम्ब्ल क्षेत्र के भिण्ड जिला के एक मध्यवर्गीय कुशवाहा राजपूत परिवार से हैं। उनके पिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक एवं व्यवसाय से आयुर्वेदिक डॉक्टर थे। परिवारिक पृष्ठभूमि के चलते वे संघ व विहिप से जुड़ीं व किसी समय सन्यास ले लिया। भोपाल में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ी रहीं। इतिहास में परास्नातक प्रज्ञा हमेशा से ही दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़ी रहीं। वे विश्व हिन्दू परिषद की महिला शाखा दुर्गा वाहिनी से जुड़ी थीं।
प्रज्ञा यदि भ्रमित होती तो भाजपा उन्हें 2019  के लोकसभा चुनाव में मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ अपना प्रत्याशी न बनाती ।जाहिर है कि प्रज्ञा भाजपा के गांधी के खिलाफ उस घृणा अभियान का हिस्सा है जिसे वो सत्ता में बने रहने के कारण खुलकर स्वीकार नहीं कर पा रही है ।भाजपा की घृणा महात्मा गांधी से होते हुए राहुल गांधी तक आ पहुंची है जबकि इस गांधी परिवार का उस गांधी परिवार से कोई रक्त संबंध नहीं है ,लेकिन घृणा तो घृणा है,एक बार हो जाए तो उसे समाप्त करना आसान नहीं होता ।इसलिए मेरा कहना और मानना है कि घृणा के खिलाफ घृणा से नहीं प्रेम से पेश आइये ।प्रज्ञा को गोडसे की स्तुति करने दीजिये, लेकिन आप देश को सच बताते रहिये ,लोग आज भी घृणा को नहीं प्रेम को ही अंगीकार करते हैं,करेंगे ।
प्रज्ञा को चुनकर अब भले ही भोपाल वाले प्रायश्चित करते हों लेकिन अब वे भी प्रज्ञा से उसे मिली संसद की सदस्य्ता वापस नहीं ले सकते ,क्योंकि हमारे पास इसका कोई प्रावधान नहीं है ।इसलिए भोपाल को चाहिए की वो प्रज्ञा से वैसा ही व्यवहार करे जिसकी वो हकदार है ।प्रज्ञा को किसी संसदीय सलाहकार समिति से जिस तरह निकाला गया है उसी तर्ज पर भोपाल को भी उसे अपने दिल से निकाल देना चाहिए ।प्रज्ञा की असल प्रज्ञा जब भी जागेगी वो गांधी के चरणों में नतमस्तक हो जाएगी ,बेचारी को समय तो दीजिये ।बीते अनेक दशकों में मैंने अनेक साधुओं और साध्वियों को सियासत में आते-जाते देखा है ।संसार का मायामोह छोड़ने वाले ये लोग अंतत:छलिया ही होते हैं,जो खुद को भी छलते हैं और समाज को भी,इस सबसे सावधान रहने का समय है ।साधू-संतों और साध्वियों को सियासत से अलग-थलग करने का समय अब चार साल बाद आएगा ।तब तक इन्हे झेलिये ।और कोई विकल्प है नहीं
और अंत में एक चुटकी

बढ़ता हुआ वजन दुश्मन है
कैसे  करूँ भजन दुश्मन है
कोई  और  नहीं  है  भैया
अपना सगा सजन दुश्मन है

RB

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राकेश अचल

राकेश अचल ग्वालियर - चंबल क्षेत्र के वरिष्ठ और जाने माने पत्रकार है। वर्तमान वे फ्री लांस पत्रकार है। वे आज तक के ग्वालियर के रिपोर्टर रहे है।