Wednesday, January 22, 2020
ताई की सांकेतिक शब्दावली में छिपे ‘डर’ और मायूसी के साए...

ताई की सांकेतिक शब्दावली में छिपे ‘डर’ और मायूसी के साए...

मीडियावाला.इन।

जाने-माने उद्योगपति राहुल बजाज द्वारा देश में व्याप्त 'डर' का बड़ा इजहार किया एक दिन भी नहीं बीता था कि भाजपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने 'डर' के उसी भाव को यह कहकर विस्तार दिया कि जब वे लोकसभा सांसद और स्पीकर थे, तब पार्टी के अनुशासन के कारण अपनी पार्टी के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकते थे। उन्हें जब काम निकलवाना होता था तो वे कांग्रेस नेताओं की भी मदद ले लेती थी। सुमित्रा ताई ने मौन रहने की इस विवशता को इंदौर में सरकारी एमवाय अस्पताल के कैंटीन के उद्घाटन के मौके पर व्यक्त किया। इस आयोजन में कांग्रेस नेता और स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट, उच्च शिक्षा और खेल मंत्री जीतू पटवारी और राज्यपाल लालजी टंडन मौजूद थे। यूं तो कार्यक्रम में मुख्‍य मुद्दा इंदौर शहर के विकास का था, लेकिन बातों ही बातों में ताई ने अपने मन की व्यथा भी जाहिर कर दी। हालांकि इसके माध्यम ने भी इंदौर के विकास को ही बनाया। ताई ने कहा कि इंदौर शहर के विकास के लिए हम सब एक हैं। कभी-कभी जब इंदौर के विकास को लेकर कोई सवाल उठाना होता था तो मैं कांग्रेसियों को बोलती थी कि आप आंदोलन करें, फिर से मैं इस बारे में (तत्कालीन) मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान से बात करूंगी। उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि राज्य में हमारी पार्टी (भाजपा) की सरकार थी, इसलिए हम उसके खिलाफ आंदोलन नहीं कर सकते थे। मैं पार्टी लाइन और अनुशासन में बंधी थी। लेकिन जन समस्याओं के लिए आंदोलन तो करना पड़ता है। ऐसे में मैं कांग्रेस के नेता जीतू पटवारी और तुलसी सिलावट से धीरे से कहती थी कि भैया इंदौर के लिए कुछ करो, कुछ तो कहो, मुद्दा। मैं आपकी बात शिवराज सिंह चौहान और केंद्र सरकार तक पहुँचता हूँ। ' इतना ही नहीं ताई ने कार्यक्रम में मंत्री जीतू पटवारी की तारीफ करते हुए कहा कि उनमे मेराल्स बनने के सभी गुण मौजूद हैं। मैंने जो भी किया उसने केवल इंदौर शहर के विकास को ध्यान में रखते हुए ही किया। ताई ने कहा कि जब हमारा एजेंडा विकास होता है तो फिर हम पार्टी पॉलिटिक्स को दिमाग में नहीं रखते हैं।

ताई भाजपा की उन चुनिंदा नेताओं में हैं, जिनकी स्वीकृति सभी दलों और समुदायों में हैं। उनके मृदु व्यवहार, समन्वयवादी भाषा और शालीनता के सभी कायल रहे हैं। भाजपा के प्रति उनकी निष्ठा भी असंदिग्ध है। वे इंदौर से लगातार 8 बार सांसद बने रहे और उन्हें पिछली लोकसभा में स्पीकर भी बनाया गया। लेकिन बीते एक साल में उनके साथ जो सलूक हुआ, उससे ताई कहीं भीतर से आहत हैं। 75 पार फॉर्मूले के तहत उन्हें घर बिठा दिया और लोकसभा चुनाव में भाजपा की भारी जीत के बाद भी उन्हें कोई संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं मिली। जबकि उनका टिकट काटते वक्त यह चर्चा थी कि स्पीकर से प्रतिस्पर्धी पद से हटने के बाद ताई का सम्मानजनक पुनर्वास हो सकता है। लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ और अब होने की संभावना भी क्षीण है, क्योंकि भाजपा की चाल और चरित्र में बहुत से यू-टर्न आ चुके हैं। ताई की मायूसी इस बात से हाइलाइट्स है कि उन्हें पूर्व में खुलकर अपनी बात कहने की आजादी नहीं थी। निजी आग्रहों को छोडि़ए इंदौर के विकास जैसे मामलों में भी साफ तौर पर बोलने से कौन कौन अदृश्य हाथ रोक रहा था? जब वो वो तो कोई बगावत भी नहीं कर रही थी। शहर की समस्या को उठाने के लिए ताई को विपक्षी कांग्रेस के नेताओं पर ज्यादा भरोसा करना क्यों पड़ा? वो सचमुच डरी हुईं थीं या फिर उन्हें खुलकर बोलने का साहस नहीं था? अनुशासन के दायरे लक्ष्मण रेखाओं में बदल दिए गए थे? शहर की समस्या को उठाने के लिए ताई को विपक्षी कांग्रेस के नेताओं पर ज्यादा भरोसा करना क्यों पड़ा? वो सचमुच डरी हुईं थीं या फिर उन्हें खुलकर बोलने का साहस नहीं था? अनुशासन के दायरे लक्ष्मण रेखाओं में बदल दिए गए थे? शहर की समस्या को उठाने के लिए ताई को विपक्षी कांग्रेस के नेताओं पर ज्यादा भरोसा करना क्यों पड़ा? वो सचमुच डरी हुईं थीं या फिर उन्हें खुलकर बोलने का साहस नहीं था? अनुशासन के दायरे लक्ष्मण रेखाओं में बदल दिए गए थे?

कुछ लोग ताई की बात को लोकसभा टिकट न देने और मोदी सरकार की सत्ता में संशोधन के बाद भी उनका समुचित रिज न करने से उपजे रोष के रूप में देख सकते हैं। इसमें कुछ सचाई भी है, लेकिन उससे भी बड़ी वह 'डर' है, जो किसी भी भाजपा नेता को सच बोलने से रोकता है। ऐसे 'डर' जो बड़े तो छोड़े पार्टी मंच पर भी हकीकत बयान नहीं देते। उसे अपनी आँखों पर वही चश्मा चढ़ाए रखना होता है और होठों पर वही सरगम ​​गुनगुनाती होती है, जैसा कि ऊपर से निर्देशित होता है। वहाँ संवाद केवल वाद के रूप में जिंदा है। ऐसे में व्यक्ति के सामने दो ही विकल्प बचते हैं या तो वह पार्टी को छोड़कर कोई दूसरा झंडा थाम ले या फिर अनुशासन की कोठारी में घुट-घुट कर जीत रहे हों। बोलेगा तो उसे उसकी औकात बता दी जाएगी। हालांकि ताई को इतना कुछ कहने के बाद भी उद्योगपति राहुल बजाज की तरह ट्रोल नहीं किया गया, लेकिन कोशिश यही साबित करने की है ताई की बात सचबयानी न होकर केवल 'कुछ' भी न पाने का क्षोभ है। एक तर्क यह भी है कि अगर ताई इतनी ही नाराज थीं तो पहले क्यों बोली नहीं। इंदौर के विकास से अपनी आकांक्षाओं को जोड़ने की जरूरत क्यों है?

ताई के कथन पर कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने टिप्पणी की कि मोदी सरकार की तानाशाही से पूर्व लोकसभा स्पीकर अध्यक्ष सुमित्रा महाजन भी पीड़ित थी। वे जनता के मुद्दों पर भी अपनी बात पार्टी के मंचों पर नहीं रख पाती थीं। ये डर नहीं है तो और क्या है ? गौरतलब है कि दिल्ली के तख्त पर मोदी सरकार के भारी बहुमत से सत्तासीन होने और बीते एक साल में भाजपा के हाथ से एक के बाद एक राज्य निकलने से फर्क यह आया है कि लोग अब अपनी जुबानें खोलने लगे हैं। अनुशासन और निरंकुशता में छिपे बारीक अंतर को उघाड़ने लगे हैं। ताई जैसी मृदु भाषी महिला नेत्री का इजहारे दर्द यही साबित करता है कि अनुशासन के नाम पर पार्टी नेताओं पर तलवार लटकाकर रण जीतने का दौर अब उतार पर है। एकांगी अनुशासन और तानाशाही में बहुत मामूली फर्क है। दरअसल राजनीतिक सफलताओं के हैलोजन की चकाचौंध में विरोध और दमन के नाइट बल्बों की चमक दिखाई नहीं देती। लेकिन वे भी जुगनू की तरह दमकने लगे हैं। प्रधानमंत्री मोदी और खासकर भाजपा के चाणक्य कहाने वाले अमित शाह की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगने लगे हैं। फिर चाहे वह महाराष्ट्र में पंकजा मुंडे के रूप में हो अथवा इंदौर में रिटायर्ड लाइफ जी रही ताई की कसक के रूप में हो। शिवसेना और आजसू का एनडीए से अलग होने के रूप में हो या फिर चंद भाजपा नेताओं का अपनी पार्टी के नेताओं को निपटाने के अभियान की शक्ल में क्यों न हो, ये सब इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आज भाजपा ऊपर से जितनी मजबूत और एकजुट दिखती है, भीतर से वैसी है नहीं क्योंकि पार्टी में असंतोष और घुटन का वायरस अंदर ही अंदर तेजी से फैल रहा है। इसके बावजूद शीर्ष स्तर पर उसको लेकर कोई चिंता है, ऐसा नहीं लगता। ताई ने सांकेतिक शैली में जो कहा, वह तो शुरूआत है। बिखराव के साए अभी और गहरे होते दिखेंगे।

आरबी

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अजय बोकिल

जन्म तिथि : 17/07/1958, इंदौर

शिक्षा : एमएस्सी (वनस्पतिशास्त्र), एम.ए. (हिंदी साहित्य)

पता : ई 18/ 45 बंगले,  नार्थ टी टी नगर भोपाल

मो. 9893699939

अनुभव :

पत्रकारिता का 33 वर्ष का अनुभव। शुरूआत प्रभात किरण’ इंदौर में सह संपादक से। इसके बाद नईदुनिया/नवदुनिया में सह संपादक से एसोसिएट संपादक तक। फिर संपादक प्रदेश टुडे पत्रिका। सम्प्रति : वरिष्ठ संपादक ‘सुबह सवेरे।‘

लेखन : 

लोकप्रिय स्तम्भ लेखन, यथा हस्तक्षेप ( सा. राज्य  की नईदुनिया) बतोलेबाज व टेस्ट काॅर्नर ( नवदुनिया) राइट क्लिक सुबह सवेरे।

शोध कार्य : 

पं. माखनलाल  चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि में श्री अरविंद पीठ पर शोध अध्येता के  रूप में कार्य। शोध ग्रंथ ‘श्री अरविंद की संचार अवधारणा’ प्रकाशित।

प्रकाशन : 

कहानी संग्रह ‘पास पडोस’ प्रकाशित। कई रिपोर्ताज व आलेख प्रकाशित। मातृ भाषा मराठी में भी लेखन। दूरदर्शन आकाशवाणी तथा विधानसभा के लिए समीक्षा लेखन।  

पुरस्कार : 

स्व: जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी उत्कृष्ट युवा पुरस्कार, मप्र मराठी साहित्य संघ द्वारा जीवन गौरव पुरस्कार, मप्र मराठी अकादमी द्वारा मराठी प्रतिभा सम्मान व कई और सम्मान।

विदेश यात्रा : 

समकाालीन हिंदी साहित्य सम्मेलन कोलंबो (श्रीलंका)  में सहभागिता। नेपाल व भूटान का भ्रमण।