‘दूध’ को ‘जहर’ बनाने वाली दानवता के खिलाफ निर्णायक ‘युद्ध’ जरूरी...

‘दूध’ को ‘जहर’ बनाने वाली दानवता के खिलाफ निर्णायक ‘युद्ध’ जरूरी...

मीडियावाला.इन।

जिस देश में (मां के) दूध की शपथ सत्यनिष्ठा के लिए ली जाती हो, उसी देश और खासकर मध्यप्रदेश में दूध के साथ यह अनाचार सचमुच गुस्से से भर देने वाला है। राज्य में पांच महीने से जोरशोर से जारी ‘शुद्ध के लिए युद्ध’ अभियान में सबसे क्षुब्ध कारक खबर अगर कोई है तो सहकारी दुग्ध संघों द्वारा उत्पादित दूध में भी बेशर्म मिलावट की है। जो हकीकत उजागर हो रही है, उसके बाद केवल यही सवाल उठता है कि आखिर भरोसा करें तो किस पर? अफसोस की बात तो यह है कि यही मिलावटी दूध शायद वो लोग भी पीते रहे हैं, जिन पर खुद इस मिलावट रोकने की जिम्मेदारी है। मध्यप्रदेश में 6 सहकारी (आम लोगों की नजर में सरकारी) दूध संघ हैं। ये सहकारी समितियों के माध्यम से पशुपालकों ने दूध एकत्र कर उसका प्रोसेसिंग करती हैं और पैकेटबंद दूध उपभोक्ताअों तक पहुंचाते हैं। मप्र दुग्ध महासंघ की सहकारी समितियों के लगभग 2 लाख 37 हजार पशुपालक सदस्य हैं। महासंघ का कुल प्रतिदिन दूध उत्पादन 7 लाख 40 हजार लीटर है। इनमें सबसे ज्यादा खपत वाला दूध संघ भोपाल का है, जो रोजाना 3 लाख 53 हजार लीटर दूध उपभोक्ताओं तक पहुंचाता है, इनमें भी सबसे ज्यादा दूध के खरीदार भोपाल शहर के हैं। या यूं कहें कि सांची दूध भोपाल वासियों की पहली पसंद और जरूरत बन चुका है। लेकिन सांच को शुद्धता की जांच में चले अभियान ने बेनकाब किया है। यहां जो दूध लोगों को पिलाया जाता रहा है, उसमें पानी मिलाने की खबरें तो दो साल पहले भी आई थीं, लेकिन अब यह डरावना खुलासा भी हो रहा है कि सांची दूध के सप्लाई टैंकरों में जहर समझे जाने वाला यूरिया और डटर्जेंट भी बेखटके मिलाया जा रहा है। यानी दूध संघ के अफसर-कर्मचारियों और सप्लायरों का गठजोड़ शहरवासियों को दूध के नाम पर धीमा जहर पिला रहा था। सांची दूध को गाढ़ा करने के नाम पर उसमें सोडियम क्लोराइड की मिलावट की जा रही है। यह न केवल जन स्वास्थ्य बल्कि पूरे
समाज प्रति गंभीर अपराध है।

वैसे तो इस देश में हर चीज में मिलावट है। चिंतन से लेकर चरित्र तक। उपभोक्ता वस्तुओं से लेकर खाद्य वस्तुओं तक। विडंबना ये कि जीवन में शुचिता की बात करने वाले हम लोग जीवन के हर क्षेत्र में मिलावट के साथ जीने के इतने आदी हो चुके हैं कि जहर मिले खाद्य पदार्थों, फल सब्जी और पेय तक निश्चिंत भाव से पेट में सरकाते जाते हैं। कहने को देश में 2011 से खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम लागू हो चुका है। इसके तहत मिलावट के दोषी को 10 साल की जेल और 1 लाख रू. तक के जुर्माने का प्रावधान है। इस और कड़ा बनाने का प्रस्ताव भी है। लेकिन ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई बहुत कम मामलो में हो पाती है। शायद इसलिए भी कि जिस देश में रेप जैसे मामलों में भी फांसी को बरसों लग जाते हों, वहां दूध में मिलावट तो केवल विश्वास का शीलभंग ही है। उल्टे कई बार कार्रवाई की आड़ में ‘लेन देन’ कर मामले ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं। यदा कदा कोई ‘बदनसीब’ जेल भी जाता है। हालांकि शुद्ध के लिए युद्ध अभियान के तहत प्रशासन बड़े पैमाने पर कार्रवाई कर रहा है। मिलावटखोरों की बड़ी संख्‍या में धरपकड़, मिलावट के मामले दर्ज करने तथा सेम्पल लेकर उनकी जांच का क्रम जारी है। जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा के मुताबिक एक टोल फ्री नंबर 104 भी मिलावटखोरों की शिकायत के लिए नियत किया गया है।

इन सबके बावजूद जो गंभीर चिंता का विषय है शुद्धता के प्रति हमारी लापरवाही। जिस देश में कर्मकांड में भी शुद्धता का आग्रह हो, वहां व्यावहािरक जीवन में ‘जो मिल जाए, जैसा मिल जाए, उसी को मुकद्दर समझने’ का अक्षम्य भाव है। इन सब में भी दूध की मिलावट सचमुच डराने वाली है। पिछले दिनो देश के पशु कल्याण बोर्ड के सदस्य मोहन सिंह अहलूवालिया ने कहा था कि देश में बिकने वाला 68.7 फीसदी दूध और इससे बने पदार्थ‍ मिलावटी हैं। ये भारतीय खाद्य एवं मानक प्राधिकरण के मानकों से मेल नहीं खाते। मप्र सहित कई राज्यों में सिंथेटिक दूध भी धड़ल्ले से बेचा जा रहा है, जो दूध के नाम पर सफेद जहर है। प्रदेश के ग्व‍ालियर चंबल संभाग में तो लगता है कि डाकुओं की जगह मिलावट माफिया ने ली है। राज्य में ग्वालियर सहित 15 जिले ऐसे हैं, जहां दूध में जमकर मिलावट की जा रही है। पिछले दिनो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दूध में मिलावट को लेकर भारत सरकार को एडवायजरी जारी की थी, जिसमें चेताया था कि यदि देश में दूध और उससे बने उत्पादों पर कठोर अंकुश न लगाया गया तो 2025 तक देश की ८७ प्रतिशत आबादी कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का शकार हो सकती है।

उल्लेखनीय है कि मप्र में ‘शुद्ध के लिए युद्ध’ अभियान इस साल 19 जुलाई से शुरू हुआ था। आरंभ में यह खाद्य पदार्थों में मिलावट के खिलाफ था, बाद में इसमें कृषि उत्पाद और बीज आदि भी जोड़ लिए गए। इस दौरान कई जगह छापे मारी और कार्रवाई भी हुई। शुरू में प्रदेशवासियों को लगा कि यह भी एक रस्मी मुहिम है, लेकिन जैसे-जैसे यह अभियान बढ़ता
गया तब लगा कि राज्य सरकार इसको लेकर गंभीर है और लोगों को भी इसमें भागीदार बना रही है। कमलनाथ सरकार और उनके मंत्रियों द्वारा चलाई जा रही भूमाफिया के समांतर मिलावट माफिया के खिलाफ यह मुहिम सचमुच जनता को राहत देने वाली है। हालांकि कुछ लोग इसे राजनीति से प्रेरित होने का आरोप भी लगा रहे हैं, ले‍किन जन और समाज स्वास्थ्य की रक्षा के लिए कोई अभियान राजनीति से प्रेरित भी है तो इसे समाज की छाती में अटके मिलावट के कफ को निकालने के लिए दूध हल्दी के इलाज के रूप में ही देखा जाना चाहिए। वैसे भी दूध में मिलावट का खेल बहुत चालाकी से होता है। दूध को लेकर समाज में आज भी इतना विश्वास है कि सहसा लोग पर अविश्वास नहीं करते। लेकिन कहते हैं कि मिलावटी दूध का स्वाद मीठे के बजाए कड़वा होता है। गर्म करने पर उसका रंग नेचुरल हल्का पीला होने के बजाए अविश्वसनीय रूप से सफेद ही रहता है। सवाल उठता है कि दूध के साथ भी यह खिलवाड़ क्यों? क्या ऐसा करने वाले और उन्हें प्रश्रय देने वालों को अपनी मां का दूध भी याद नहीं? क्यों सप्लाई किए जा रहे दूध की ठीक से जांचें नहीं होतीं? क्यों दूध में जहर मिलाने वाले की आंखों में कसी स्तनपान करते अबोध शिशु का चेहरा नहीं घूम जाता? क्यों दूध और अन्य पदार्थों की जांच करने वाली हमारी प्रयोगशालाएं मुर्दा बनी रहती हैं? क्यों ‘क्वालिटी कंट्रोल’ जैसा शब्द हमें उतना भी उद्वेलित नहीं करता, जितना कि गाय शब्द करता है? निजी डेरियों में गड़बड़ियों की शिकायत नई नहीं है, लेकिन सहकारी डेरियों में दूध को लेकर यह दगाबाजी कतई सहन नहीं की जानी चाहिए। दूध मनुष्य का प्रथम आहार है। इसे देवताओं का पेय भी कहते हैं, लेकिन इंसान के भीतर छिपा दानव इस दूध को जहर में तब्दील करने पर तुला है। उम्मीद करें कि ‘शुद्ध के लिए यह युद्ध’ महज प्रचार न होकर इस दानवता को कुचलने का सार्थक अभियान सिद्ध होगा।

RB

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अजय बोकिल

जन्म तिथि : 17/07/1958, इंदौर

शिक्षा : एमएस्सी (वनस्पतिशास्त्र), एम.ए. (हिंदी साहित्य)

पता : ई 18/ 45 बंगले,  नार्थ टी टी नगर भोपाल

मो. 9893699939

अनुभव :

पत्रकारिता का 33 वर्ष का अनुभव। शुरूआत प्रभात किरण’ इंदौर में सह संपादक से। इसके बाद नईदुनिया/नवदुनिया में सह संपादक से एसोसिएट संपादक तक। फिर संपादक प्रदेश टुडे पत्रिका। सम्प्रति : वरिष्ठ संपादक ‘सुबह सवेरे।‘

लेखन : 

लोकप्रिय स्तम्भ लेखन, यथा हस्तक्षेप ( सा. राज्य  की नईदुनिया) बतोलेबाज व टेस्ट काॅर्नर ( नवदुनिया) राइट क्लिक सुबह सवेरे।

शोध कार्य : 

पं. माखनलाल  चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि में श्री अरविंद पीठ पर शोध अध्येता के  रूप में कार्य। शोध ग्रंथ ‘श्री अरविंद की संचार अवधारणा’ प्रकाशित।

प्रकाशन : 

कहानी संग्रह ‘पास पडोस’ प्रकाशित। कई रिपोर्ताज व आलेख प्रकाशित। मातृ भाषा मराठी में भी लेखन। दूरदर्शन आकाशवाणी तथा विधानसभा के लिए समीक्षा लेखन।  

पुरस्कार : 

स्व: जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी उत्कृष्ट युवा पुरस्कार, मप्र मराठी साहित्य संघ द्वारा जीवन गौरव पुरस्कार, मप्र मराठी अकादमी द्वारा मराठी प्रतिभा सम्मान व कई और सम्मान।

विदेश यात्रा : 

समकाालीन हिंदी साहित्य सम्मेलन कोलंबो (श्रीलंका)  में सहभागिता। नेपाल व भूटान का भ्रमण।