किसका है देश, हम किसके लिए मरें!

किसका है देश, हम किसके लिए मरें!

मीडियावाला.इन।

इस साल का सोलह दिसम्बर वीर जवानों के पराक्रम और बलिदान को हमने भोपाल के शौर्य स्मारक में दिए जलाकर और रात को रवीन्द्र भवन में कविताएं सुनते हुए मनाया। मानें तो यह दिन देश के लिए उतना ही खास है जितना छब्बीस जनवरी, पंद्रह अगस्त। 1971 में इसी दिन हमारी फौज ने ढाँका में 96000 पाकिस्तानी सैनिकों को घुटनों और टखनों के बल समर्पण के लिए विवश किया था। एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र बांग्लादेश को जन्म दिया। यह विश्व के सैन्य इतिहास की दुर्लभतम घटना है। अपने वीर जवानों के इस अप्रतिम शौर्य के सम्मान में तब से इस तारीख को हम विजयदिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं। इस साल नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध की लपटों के बीच दिल्ली के नेता और चैनलिए एंकर इसे लगभग भूले ही रहे। वैसे भी देश के भीतर ही देश के खिलाफ युद्ध ही चल रहा है..। राजनीति का परमवीर चक्र पाने के लिए ये नेता लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं।

 

बहरहाल ईश्वर न करे ऐसा दिन कभी आए कि जब सियाचिन ग्लैशियर में बर्फीले तूफान से जूझते हुए देश की रक्षा में तैनात जवान की अन्तरात्मा देश से यह सवाल करे कि ये किसका है देश और हम किसके लिए मरें ? आज हम जिन विरोधाभासी हालातों में जी रहे हैं ऐसे में इन बुनियादी सवालों से मुंह नहीं फेरा जा सकता। 

 

बचपन से हमको पढ़ाया जाता रहा है कि विकट परिस्थितियों में सीमा पर रक्षा करने वाले प्रहरी और खेत में मेहनत करने वाले किसान हमारे देश के प्राणाधार हैं। लालबहादुर शास्त्री ने इसी भावना को ..जय जवान - जय किसान.. के नारे के साथ व्यक्त किया था। किसानों और जवानों को प्राणाधार मानते हुए आज की स्थितियों पर गौर करें तो पाएंगे कि देश के प्राण निश्चित ही संकट में फंसे हैं। सीमा पर जवान एक छद्मयुद्ध में मर रहे हैं और खेत में किसान। समय-समय पर सूचना आयोग से मिले आँकड़े और पार्लियामेंट में प्रस्तुत किए गए आंकड़े और तथ्य इस बात की तस्दीक करते हैं।

 

कठिन परिस्थितियों में जिन्दगी और समाज के आचरण ने फौजियों की मन:स्थिति को मथ सा दिया है। रेडिफ डाट काम के लिए लिखने वाले विकी नानजप्पा ने सेना में आत्महत्याओं के लोमहर्षक आंकड़े जुटाए हैं। इनके अनुसार अब तक विभिन्न युद्धों और आतंकवादी संघर्षो में जितने जवान नहीं मारे गए उससे कहीं ज्यादा संख्या आत्महत्या करने वालों की है। राज्यसभा में एक सदस्य ने तो यहां तक कहा कि पिछले दो दशकों में अकेले जम्मू कश्मीर में तैनात जवानों में से 15 हजार ने आत्महत्याएं कीं। यद्यपि रक्षामंत्रालय इन आंकड़ों को अतिरेक मानता है फिर भी यह स्वीकार करता हैं कि वर्ष 2003 से इस जुलाई तक करीब 1500 जवानों ने आत्महत्याएं की हैं। 

 

अब यह बात खुले मुँह कही जाने लगी है कि नेताओं और नौकरशाहों ने सेना और रक्षामंत्रालय को भ्रष्टाचार का चारागाह बना लिया है। हर सौदे में कमीशन और रिश्वतखोरी ने फौज के मनोबल पर विपरीत असर डाला है। सेना में स्वैच्छिक सेवानिवृत्त लेने वाले अफसरों, जवानों की संख्या वर्ष दर वर्ष बढ़ती जा रही है। औसतन 12 से 15 हजार जवान और अफसर हर साल अपनी नौकरी पूरी होने के पूर्व ही इस्तीफा दे देते हैं। 

 

जाहिर है कि जवानों में सेना को लेकर वह आकर्षण नहीं रहा। जब वे देखते हैं कि उतने ही पढ़े लिखे उनके समकालीन साथी, दूसरे क्षेत्रों में कई गुना कमा रहे हैं और ऐश की जिंदगी बसर कर रहे हैं तो फिर वे क्यों जैसलमेर की रेत में तपें या सियाचिन ग्लैशियर में गलें।

 

अब एक सवाल यह उठता है कि सेना में जाते किस वर्ग के लोग हैं? बुनियादी तौर पर देखा जाए तो फौज में ज्यादातर निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों व किसानों के बेटे जाते हैं। देश को राजनीतिक-प्रशासनिक और आर्थिक रूप से नियंत्रित करने वाले नेता-नौकरशाह और व्यापारी वर्ग से शायद ही कोई परिवार ऐसा हो जो देश की फौज में भर्ती होने के लिए अपने बेटे को भेजता हो। 

 

देश के संसाधनों की लूट में शामिल इस गठजोड़ वाले वर्ग के बच्चों की जमात जिन पब्लिक स्कूलों से निकलती है वहां एनसीसी की शाखाएं तक भी नहीं होतीं जो छात्रों को सैन्य जीवन के नजदीक लाती हैं। आज तक न तो संसद में और न ही विधानसभा में किसी प्रतिनिधि को इस बात के लिए चिंतित होते सुना और देखा कि पब्लिक स्कूलों से पप्पू टाइप छात्रों की जो नई फसल तैयार हो रही है, उसके लिए राष्ट्र व उसकी रक्षा या सेना कितना मायने रखती है। एनसीसी की शाखाएं सिर्फ सरकारी स्कूलों तक सीमित हैं।

 

इजराइल समेत कई मुल्कों में प्रत्येक नागरिक को सैन्य शिक्षा अनिवार्य है। इंग्लैण्ड जैसे राजशाही वाले देशों में राजपरिवार के युवराजों को युद्ध के मोर्चे पर आम सिपाहियों की भांति भेजा जाता है। इंग्लैण्ड के प्रिंस फिलिप नाटो की सेना के साथ अफगानिस्तान में रहे। हमारे ही देश की फौज के कई रेजीमेंटों में समय-समय पर दुनिया के राजशाही वाले मुल्कों के युवराज आते हैं व फौजी जीवन का कठिन प्रशिक्षण लेते हैं।

 

 हम अपने देश में जनप्रतिनिधियों को सैन्य प्रशिक्षण अनिवार्य किए जाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। संभवत:छात्रों को एनसीसी की अनिवार्य शिक्षा का विचार हमारे नीति नियन्ताओं को इसलिए नहीं आया क्योंकि उनके बच्चों को भी पुट्ठों में ड्रिलमास्टर की बूट की ठोकर सहनी पड़ती।

 

अब ऐसे में यदि लेह-लद्दाख और टाइगर हिल पर तैनात किसी जवान के मन में ये विचार उठे कि हम किसके देश के लिए प्राण देने को तत्पर हैं। क्या उन लोगों के देश के लिए जो संविधान की अन्तरात्मा को रौंदकर, नैसर्गिक न्यास के सिद्धांत को तिलांजलि देते हुए वोट जुटाने और सरकार बनाने के लिए आरक्षण पर आरक्षण के कानून बनाते जा रहे हैं? या उन लोगों के देश के लिए जो कई कई ईस्ट इंडिया जैसी कम्पनियों के लिए रेड कारपेट दसाए बैठे हैं, और उनकी लाबिंग के लिए रिश्वत खा रहे हैं? देश के नीति-नियन्ताओं में तो वो भी शामिल हैं जो अरबों का कोयला घोटाला, टूजी स्पेक्ट्रम, रक्षा सौदों की दलाली खाकर स्विटजरलैण्ड में धन जमा करते हैं और करेबियन द्वीप खरीदते हैं? या उन कारपोरेट घरानों के लिए जो 23 रुपये रोजाना में जीने वाले करोड़ों-करोड़ नागरिकों के देश में 4 हजार करोड़ की अट्टालिकाओं में शयन करते हैं। 

 

देश की आर्थिक उन्नति के नाम पर किसानों की जमीन छीनते हैं और प्रकृति को प्रदूषित कर जहरीला बनाते हैं? सवाल यह भी उठता है कि इस देश को गढ़ने और नीति निर्धारण में इन जवानों व किसानों की कितनी भूमिका है? कहा जा सकता है कि इनके ही वोट से चुने प्रतिनिधि ही तो विधानसभा और संसद चलाते हैं? पर यह तो पूरा मुल्क ही देख रहा है कि चुनाव मैदान में आपस में लड़ने-झगड़ने वाले दल सत्ता के लिए विचारों का खोल उतारकर कैसे नंगे हो जाते हैं। 

 

सांसद व विधायक महोदय कैसे रिश्वत लेकर सवाल पूछते हैं या खुद को बेचकर एटमी डील के लिए सरकार के पक्ष में वोटिंग करते हैं। ईमानदार विकल्प है कहां? और वास्तव में किसे है किसानों व जवानों की चिंता। वरिष्ठ पत्रकार पी सांईनाथ ने समय-समय पर देश के किसानों की बदहाली को सामने लाया है। 1995 से 2018 तक के दो दशक में साढ़े तीन लाख किसानों ने आत्महत्याएं कीं, इस हिसाब से हर दिन दो किसान कहीं न कहीं आत्महत्या करते हैं। सांईनाथ देश के किसानों की आत्महत्याओं को दुनिया की सबसे बड़ी विभीषिका मानते हैं। पर सरकारें हैं कि उनकी प्राथमिकताओं में न तो सीमा की रक्षा करने वाला जवान है और न देश का पेट भरने वाला किसान। 

 

सेज, औद्योगिकीकरण, आर्थिक सुधार, पिज्जा-बर्गर, मैकडोनाल्ड वालमार्ट और सास-बहू के मायावी सीरियलों के दिवास्वप्न में जी रहा भद्रलोक यह जान लें कि नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी से प्रलय आए या नहीं, लेकिन जिस दिन देश के जवानों और किसानों का समवेत गुस्सा फूटेगा वह युगान्तकारी होगा और उसके सैलाब में डूबने से कोई विधाता नहीं बचा पाएगा। बचाएंगे तो सिर्फ यही जवान और यही किसान।

RB

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