Monday, January 27, 2020
अब कैसे पढूँगी कविता ' गुलाबी चूड़ियाँ '

अब कैसे पढूँगी कविता ' गुलाबी चूड़ियाँ '

मीडियावाला.इन।

सात साल की बच्ची के पिता के वात्सल्य की कविता एक यौन उत्पीड़क कवि की कलम से लिखी जानकर

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कुछ रोज़ पहले की बात है एक दोस्त को मैं Neruda की कविता सुना रही थी कविता के जवाब में दोस्त भी कविता सुनाने लगा उसने सुंदर सी कविता पढ़ी वो कविता पिता के मन में बसी ममता को दर्शाती थी सरल और सहज थी। ख़त्म होते ही मेरा दोस्त बोला कविता नागार्जुन की है नागार्जुन का नाम सुनकर मैं फिर से डर गई थी जहाँ बैठी थी वहीं बैठे रह गई।
कितनी बार नागार्जुन कभी उनका जन्मदिन, मरण दिन, नए साल पर , कभी चर्चाओं में कभी किताबों में और हाँ फ़ेसबुक पर तो रोज़ ही चले आते हैं हमारे देश के नागार्जुन बाबा | जब भी मैं ये नाम सुनती हूँ तो मेरी सारी इंद्रियां जैसे सुप्त अवस्था में चली जाती हैं।
मेरे भीतर सिर्फ़ क्रोध रह जाता है।
लोग कहते हैं कि बच्चों के साथ दुष्कर्म करने वाले लोग बीमार होते हैं मानसिक रूप से । सवाल आज ये हैं क्या हमारे देश के इतने बड़े कवि नागार्जुन भी बीमार थे? मुझे नहीं लगता कि वो बीमार थे मेरी समझ से अगर कोई पूछे तो वो तो बहुत शातिर थे ना।
बाबा को मेरे पापा घर ले आए थे। पापा उन्हें बोहोत प्यार और समान देते और मेरी मम्मी उनके नक़ली अनुशासन का पूरी गंभीरता से पालन करती रहीं। इस व्यक्ति ने हमारे घर में कर्फ्यू लगा दिया था गलती मेरे माँ पापा की जो ऐसे मुफ़्तख़ोर को अपने घर में रखकर उसकी सेवा करते रहे। वो बड़े आदमी थे पर क्या इंसान बड़ा आदमी ऐसे ही बनता है? रेप करने वाले लोग तो शायद बहुत मामूली होते हैं और देखिए बड़े लोग आप ही के घर में घुसकर आप ही का खाकर आप ही पर रोब जमाकर आप ही की बेटियों को खा जाते हैं ।
में पैतीस की हो गयी हूँ वो जब हमारे घर आए तब शायद सात साल की थी पर आज भी मैं अच्छे से वर्णन कर सकती हूँ उस घटना का। मुझे उस दिन और उन क्षणों का भय याद है और ये भी बहुत अच्छे से याद है किस सौम्य भाव से से बाबा अपना काम कर रहे थे चेहरे पर एक तटस्थ भाव लिए हुए ।
बलात्कार दुष्कर्म तो हमारे देश में आम बात है जिन्होंने निर्भया को मार डाला या हैदराबाद की वेटनरी डॉक्टर को जला डाला क्या वो सब नागार्जुन थे शायद वो अनपढ़ और अशिक्षित थे ना?
पर नागार्जुन आप सबके प्रिय बाबा तो बहुत बड़े आदमी थे देश के इतने बड़े कवी भी इस तरीक़े से गर्त में गिर सकते हैं एक ऐसा व्यक्ति है जिसके साथ जुड़ने के लिए शायद भारत देश की कई महिलाएँ सहर्ष राज़ी होती जाती। महिलाओं के साथ उनके संबंध कैसे थे मुझे नहीं मालूम मैं जानना भी नहीं जाती। परंतु वो मेरे साथ क्या कर रहे थे ? 7 साल की बच्ची के साथ? बहुबहुत बड़े आदमी थे ,शायद इंसान ऐसे ही बनता है बडा वरना मामूली लोग रेप करते हैं पकड़े जाते हैं मार दिए जाते हैं और बड़े लोग आपके ही घर में घुसकर आप की ही रोटियां खाकर आपकी ही बेटियों को खा जाते हैं। श्रीरमेश थानवी और श्रीमती उर्मिला दोनों ने भरोसा किया था और ये बड़ा आदमी उन्हीं की बच्ची को ज़िंदगी भर का डर भेंट में देकर चला गया। डर मेरे जीवन का एक बड़ा भाव है न जाने में किन किन चीज़ों से डरती हूँ ना जाने कौन कौन लोग मुझे डरा जाते हैं शायद कोई सुनना पसंद नहीं करेगा और न ही कोई पूछना पसंद करेगा कि ये डर कैसा है ।मैं रोज़ इस डर से झगड़ती हूँ ,कब कब और कैसे कैसे बेवजह डर जाती हूँ इसका मेरे पास हिसाब भी नहीं ।
डर के चलते मैंने कितने पुरुषों के साथ रिश्ते ख़राब किए है इसकी गिनती भी नहीं, भीतर जो काला धुआँ पसरा रहता है वो बाहर का बहुत कुछ निगल जाता है।
जिससे प्रेम करने लगती हूँ उसे कह सकूं ये संभव ही नहीं इतना पररखती रहती हूँ पुरुषों को न जाने कितने लोगों का धैर्य का बाँध टूट चुका है। भरोसा किसी पुरुष पर आज भी भी शायद ही करती हुं।
कोई भी एक सीमा को लाँघ कर भीतर के प्रवेश द्वार तक नहीं पहुँच पाया। महिला मित्र ज़रूर एक स्पेशल status लिए हैं मेरे जीवन में।
मुझे बड़ा नहीं बनना ओर हर बड़े से मुझे बू आती है।

नीलिमा की फेसबुक वाल से -साभार 

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नीलिमा चोहान

दिल्ली विश्वविध्यालय में कार्यरत रही ,कविता लिखती है