नाद में संवाद है...आओ बजाएं थाली या ताली

नाद में संवाद है...आओ बजाएं थाली या ताली

मीडियावाला.इन।

नाद में संवाद है...

बचपन में माँ-चाची ने थाली बजाकर बच्चों के डर को भगाया था। आज पसर रहे अवसाद को भगाते हैं। शुक्रिया करते हैं उन सभी का जो घर के बाहर हैं ....हमारे लिए..स्वच्छ देश के लिए खड़े है शहर की सुबह आज भी कचरा-गाड़ियों की आवज़ के साथ हुई।

अभी आपको कई लोग सोशल पर टहलते मिल जाएँगें जो थाली बजाने पर गरियाएंगें, कई अंधभक्त मिल जाएँगें जो विज्ञान के नए-नए आयामों से आपको रूबरू कराएंगें। सच कहूँ तो नाद में ही संवाद है।

अनहद नाद ही परब्रह्म है। जब आपकी आत्मा के अंदर से वह प्रस्फुटित होता है तो आत्मा-परमात्मा का मिलन। मेरे कथक के गुरु का कहना था नाद ही ब्रह्म है। इसलिए कथक में पाँव की थाप में भी अंतर होता है। एक-दो-तीन-चार के बाद पाँच ना होकर अन्य पाँव से फिर एक-दो-तीन-चार। नाद का असर किसी सैन्य टुकड़ी से पूछिए जो पुल से गुज़रते हुए अपनी मार्च-पास्ट को विराम दे देती है।

आज करोना के समय जब इंसानों को समाजिकता से दूर रखा जा रहा है तब यह नाद मेरे लिए संवाद है। हम-आप सोशल पर बकैती कर अपनी सोशल होने की भूख मिटा सकते हैं लेकिन हमारे बुजुर्ग या वे लोग जो वेबजाल की सोशल दुनिया में हैं ही नहींः उनके अवसाद का स्तर सोचिए।

रोज़-रोज़ हर जगह से आती मौत की ख़बरों को सुनने के बाद हल्की सी छींक या खाँसी से पैदा हो रहा डर ....गहरे अवसाद में ले जा सकता है। ऐसे में एक ही समय सबका तालियाँ-थालियाँ बजाना, अपनी तरह की गेट-टू-गेदर है। जो जोश भरता है।

अब हर बार की तरह बचपन का क़िस्सा....बच्चे होने-चौक पूरने के समय ढ़ोल-ताशे बजते देखें। मंगल गान के समय कांसे के भारी लोटों को धातु के सिक्के से बजाया जाता, या मंजीरे की करतल ध्वनि होती। थाली बजाने के रोचक क़िस्से कई सुने देखा एक ही।

हुआ कुछ यूँ कि गर्मी की छुट्टियों में हम सब भाई बहन ( दस-बारह) दादाजी के घर पर पाँचवी मंज़िल की छत पर चढ़कर सबसे दूर पतंग उड़ा रहे थे। अब ऐसे में एक बंदर आ गया। प्रभात भईया ने जग भर कर पानी बंदर के मुँह पर डाल दिया। अब लाल मुँह के बंदर का ग़ुस्सा देखने लायक़ था।

महाराज हमारे पीछे पड़ गए। हम सब टंकी की छत से उतरकर अनाज वाली कोठरी में छिप गए। अब समय बीतता जाए बंदर महाराज कोठरी के दरवाज़े के बाहर दाँत किटकिटाते हुए पहरा देते रहे। कोशिश की गई कि बड़ी दी अपनी छोटी हाइट-चंचलता के कारण चुपचाप निकले...ना हो सका। घंटे नहीं पहर बीत गए। हम सभी बच्चे घबरा गए। सयुंक्त परिवार के लिए साल भर का दाना-पानी बड़े ड्रमों में था, उस पर बड़े परात से ढ़क्कन। उन्हें बजाने की कोशिश की लेकिन सभी के हाथ छोटे थे....कोशिश फ़ेल हो गई। उसके बाद इंतज़ार के अलावा कुछ ना था। शाम तक अपनी वानर सेना को नीचे ना देख माँ-चाची ने टेर लगाई। एक चाची ऊपर आईं...बंदर दाँत किटकिटाकर उनकी तरफ़ भागा। वे नीचे गईं उसके बाद हमारे घर की हर महिला के हाथ में थाली-चमचा था...उसको बजाते हुए तीखी ध्वनी की गई। बंदर महोदय दुबक गए....

वो मोबाइल का वक़्त ना था। घर की महिलाएँ बेहद सादगी पसंद थीं....उड़ान सीरियल का समय था। उस समय लगता था, माँ -चाचियाँ इतनी सामान्य क्यों। उन्हें भी ...विलन की कुटाई करनी चाहिए। उस दिन मैंने उन सभी की जीवटता देखी थी। दाँत निपोरते बंदर के सामने वो सब एक साथ थाली बजाते खड़ी थीं। डर की एक रेखा-शिकन उनके दीप्त चेहरों पर नहीं थीं।उन्हें देखकर ही हम बच्चों के चेहरे खिल गए थे।चूड़ियों से खनकते हाथ ...थालियाँ पीट रहे थे। यक़ीन मानिए थालियाँ पीटना छाती पीटने से कही बेहतर-सुखकर है।

ना-ना मैं अंध भक्तों की तरह यह नहीं बोल रही कि कोरोना भाग जाएगा लेकिन यह ज़रूर बोल रही दिन-रात कोरोना का रोना सुनकर जो अवसाद पैदा हो रहा वह भाग जाएगा।

आपको बता नहीं सकते हम सारे भाई-बहन आज भी जब भी मिलते हैं बंदर वाले क़िस्से का ज़िक्र ज़रूर करते हैं।कारण एक ही है उस दिन पहली बार शायद फुदकने वाले बच्चों को सेल्फ़ आइसोलेशन झेलना पड़ा था। वरना सिर्फ़ धमकियाँ ही मिली थी, कमरे या बाथरूम में बंद कर दिए जाने की। सेल्फ़ आइसोलेशन की डगर आसान नहीं...हो सकता है एक दिन की जगह हमें कई दिन अपने घर की लक्ष्मण रेखा के अंदर रहना पड़े लेकिन वायरस की चेन तोड़ने के लिए यह ज़रूरी है।

इसिलए ताली-थाली ज़रूर बजाइए....करोना नहीं लेकिन बंदर या अवसाद ज़रूर भाग जाएगा....

याद रखिए नाद ही संवाद है....एक-दो नहीं पूरे समूह से एक साथ जुड़ने का....खुद का मज़बूत करने का। अपने-पराए सभी को हौंसला देने का...

आखिर नाद ही परब्रह्म है...

 

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श्रुति अग्रवाल

कई बार जीवन में ऐसे पल आते हैं जो सदियों तक किस्से के रूप में याद रहते हैं... उन्हीं किस्सों की किस्सागोई में गुम श्रुति अग्रवाल पत्रकारिता का चिरपरिचित चेहरा है। वे लम्बे समय तक राजस्थान पत्रिका और सहारा समय में पत्रकार रही है।

ट्वेल्व पाइंट ब्लॉग संचालित करते हुए श्रुति ने कई अनछुए पहलुओं पर कलम चलायी है।