स्त्री - फिल्म समीक्षा

स्त्री - फिल्म समीक्षा

आम तौर पर डरावनी फिल्में जिनमे भूत प्रेत मनोरंजन का विषय हों, मुझे देखना पसंद नहीं है, पर स्त्री मैंने दो कारणों से देखी। एक तो राजकुमार राव और दूसरा चन्देरी जो ना केवल अपनी रेशमी साड़ियों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है बल्कि अपने ऐतिहासिक मुक़ाम के लिए भी जाना जाता है | महाभारत काल में यह नगर शिशुपाल की राजधानी हुआ करता था जो भगवान कृष्ण का मौसेरा भाई था और जिसके बारे में उसकी माँ को उन्होंने यह वचन दिया था की वे उसकी सौ ग़लतियाँ माफ़ करेंगे और आख़िर में ये आँकड़ा पूरा होने पर उसका वध भगवान के हाथों ही हुआ |सल्तनत काल में भी इसकी राजनीतिक स्थिति का महत्व इसी बात से पता चलता है की फ़ारसी लेखक और यात्री अलबरूनी ना केवल यहाँ आया था बल्कि उसकी पुस्तक में चन्देरी का वर्णन है | ऐसा ही ब्योरा आइने अकबरी में भी इसका मिलता है | राणा सांगा ने जब इसे जीत के मेदिनी राय को दिया तो बाबर ने चन्देरी पर चढ़ाई कर दी और फिर जब उसकी सेना ने दुर्ग में प्रवेश किया तो वीरांगनाओं ने जौहर कर लिया | बाद के वर्षों में भी इसका वाणिज्यिक और सामरिक महत्व बना रहा। यहाँ तक कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भी चन्देरी ने भाग लिया और जनरल हयुरोज़ को यहाँ भेजा गया | अब चन्देरी अशोक नगर जिले की एक महत्वपूर्ण तहसील है जो अपनी साड़ियों और ऐतिहासिक दुर्ग के कारण प्रसिद्ध है | 

               परंतु अफ़सोस की चन्देरी के इस ऐतिहासिक पहलू का कोई भी उल्लेख इस फ़िल्म में नहीं मिलता है। हाँ, दूसरा कारण ज़रूर निराश नहीं करता | स्त्री दिनेश विजान की हॉरर कामेडी फ़िल्म है जिसे अमर कौशिक ने निर्देशित किया है | कहानी कुछ यूँ है कि चन्देरी शहर में एक किंवदंती है की वर्ष में एक बार चार दिन के लिए एक स्त्री की प्रेतात्मा शहर में आती है और जो भी पुरुष अकेला घर से बाहर मिलता है उसे उठा ले जाती है , ऐसे मनुष्य के केवल कपड़े मिलते हैं वो वापस नहीं आता | विकी ( राजकुमार राव ) चन्देरी में टेलरिंग का काम करता है और अपने काम में इतना क़ाबिल है की महिलाओं को केवल देख कर उनका नाप अपने दिमाग़ में बिठा लेता है। उसके इस कौशल के कारण लोग उसे चन्देरी का मनीष मल्होत्रा कहते हैं | शहर में एक रहस्यमयी लड़की विकी को मिलती है और उससे अपना लहंगा चार दिन के अंदर सिलने को कहती है।विकी पहली ही नज़र में उसका दीवाना हो जाता है । हालाँकि उसके दोस्त बिट्टू ( अपारशक्ति खुराना ) और जना ( अभिषेक बनर्जी ) उसे चेताते हैं की वह लड़की ( श्रद्धा कपूर ) ही वह प्रेतात्मा है, पर विकी तो प्यार में डूबा है | कुछ ही दिनों में शहर से लोग ग़ायब होने लगते हैं और एक रात जना भी ग़ायब हो जाता है | विकी उसे वापस लाने की कोशिश करता है , वो वापस ला पाता है या नहीं इसके लिए फ़िल्म देखना होगी | 

                 हॉरर और कामेडी को किस तरह परस्पर गूँथा जा सकता है, ये काम अमर कौशिक ने बख़ूबी किया है | फ़िल्म में मनोरंजन भरपूर है। राजकुमार राव और अपरशक्ति खुराना के साथ पंकज त्रिपाठी फ़िल्म में जान डालते हैं और श्रद्धा कपूर ने ख़ूबसूरती से अपनी भूमिका को अंजाम दिया है | यद्यपि भूतप्रेत का प्लॉट मुझे बड़ा झिलाऊ लगता है और रोमांच के लिए अंधेरे और परछाइयों का प्रयोग बड़ा पुराना फ़ार्मुला है लेकिन इसे श्रद्धा की रहस्यपूर्ण ख़ूबसूरती से चन्देरी के क़िले में बख़ूबी गढ़ा गया है | स्त्री फ़िल्म का सस्पेन्स जो भी हो पर फ़िल्म इस पहलू को ज़रूर सामने लाती है कि औरत की बेचैनी की वजह है समाज में उसकी भावनाओं की स्वीकार्यता का अभाव , जो ना हो तो वह उसके क़हर के रूप में टूटता है जिसमें आदमी के अभिमान और दंभ के वस्त्र औरत के हाथों ही उधेड़ दिए जाते हैं और वह निर्वस्त्र विदेह पाया जाता है। उससे बचने का एक ही उपाय है और वह है उसकी आराधना। क्या जाने हमारे देश में देवी की आराधना की परंपराएं रखी गई थी जो अब भी हैं ,पर अफसोस स्त्री के निरादर, अपमान और शोषण से अभी भी निजात नहीं पाया जा सका है । नारी के आदर से यदि स्वर्ग और देवताओं का वास हो सकता है तो उसके अपमान से नर्क और प्रेतात्माओं का प्रकोप भी होगा।

बाकी फिल्म का क्या कहूं ,भूत प्रेतों की कल्पनाओं से मनोरंजन के तड़के  में यदि आपकी रूचि हो तो फिल्म देखी जा सकती है।

 

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आनंद कुमार शर्मा

आनन्द शर्मा भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं, वर्तमान में आयुक्त अनुसूचित जाति विकास मध्य प्रदेश शासन के पद पर पदस्थ और कविता, फ़िल्म समीक्षा, यात्रा वृतांत आदि अनेक विधाओं में फ़ेसबुकीय लेखन| विशेष तौर पर मीडिया वाला के लिए ताज़ा फ़िल्म समीक्षा