घेराव राज भवन का नहीं, दल बदलने वालों के घरों होना चाहिए!

घेराव राज भवन का नहीं, दल बदलने वालों के घरों होना चाहिए!

मीडियावाला.इन।

राजस्थान में भी कांग्रेस की सरकार अगर अंततः गिरा ही दी जाती है तो उसका ‘ठीकरा’ किसके माथे पर फूटना चाहिए ? मध्य प्रदेश को लेकर यही सवाल अभी भी हवा में ही लटका हुआ है।मार्च अंत (या उसके पहले) से भी मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री का गांधी परिवार के साथ मंत्रणा करते हुए कोई चित्र अभी सार्वजनिक नहीं हो पाया है।महाराष्ट्र में अजित पवार भी फड़नवीस के साथ ताबड़तोड़ शपथ लेनेके पहले सचिन पायलट की तरह ही किसी को दिखाई नहीं दे रहे थे।महाराष्ट्र का भाजपा प्रयोग तब सफल हो जाता तो शरद पवार की उम्र भर की राजनीतिक कमाई स्वाहा हो जाती।वे दोनों कांग्रेसों को बचा ले गए।इतना ही नहीं ,शिव सेना का भी उन्होंने कांग्रेसी शुद्धिकरण कर दिया है।अब उद्धव ने मुख्यमंत्री के रूप में भाजपा को फिर से वैसा ही कोई प्रयोग करके दिखाने की चुनौती दी है।

अशोक गहलोत मुख्यमंत्री होने के अलावा एक बड़े जादूगर भी हैं।उनकी सरकार भी अब किसी बड़े जादू से ही बच सकती है।बहुत मुमकिन है पायलट के पास विधायकों की गिनती पूरी होने तक विधान सभा क्वॉरंटीन में ही रहे।राजस्थान में संकट की शुरुआत ‘सोने की छुरी पेट में नहीं घुसेड़ी जाती’ के प्रचलित राजस्थानी मुहावरे से हुई थी और उसका आंशिक समापन :’जनता राजभवन घेर ले तो फिर मुझे मत कहिएगा’, से हुआ था।मुख्यमंत्री ने अब कहा है कि ज़रूरत (?) पड़ी तो वे अपने विधायकों के साथ राष्ट्रपति से भी मिलेंगे या प्रधानमंत्री निवास के सामने धरना देंगे।मुख्यमंत्री को अभी अपनी उस चिट्ठी का जवाब प्रधानमंत्री से नहीं मिला है जिसमें उन्होंने राजस्थान में लोकतंत्र बचाने की अपील की थी।गेहलोत अपनी सत्ता बचाने के उनके संघर्ष को जनता के अधिकारों की लड़ाई में बदलना चाहते हैं। जनता जब महामारी और अभावों से मुक़ाबला कर रही हो,सत्ता की लड़ाई में उससे भागीदारी की उम्मीद करना वैसा ही है जैसी कि प्रधानमंत्री से मदद की माँग करना।

हो यह रहा है कि सभी जनता को बेवक़ूफ़ बनाना चाहते हैं। जनता भी कई बार अपना परिचय इसी प्रकार देने में ज़्यादा सुरक्षित महसूस करती है। वह जानती है कि भाजपा लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर चुनी हुई सरकारों को गिराने और कांग्रेस उन्हें बचाने के काम में लगी है।जनता के विवेक पर किसी का कोई भरोसा नहीं है। ऐसा नहीं होता तो विधायकों का समर्थन जुटाने के लिए करोड़ों की बोलियां नहीं लगतीं और जनता के चुने हुए प्रतिनिधि अपने आप को सितारा होटलों के कमरों में ‘दासों’ की तरह बंद नहीं कर लेते।जनता के नाम पर सारा नाटक चल रहा है और जनता मूक दर्शकों की तरह थिएटर के बाहर खड़ी है ।अंदर मंच पर केवल अभिनेता ही दिखाई देते हैं ।सामने का हाल पूरा ख़ाली है।प्रवेश द्वारों पर सख़्त पहरे हैं।

मध्य प्रदेश में कोरोना काल का पूरा मार्च महीना एक चुनी हुई सरकार को गिराने में खर्च हो गया।जिसके बारे में मुख्यमंत्री ने ही ,बाद में वायरल हुए आडियो के अनुसार, स्वीकार किया कि सब कुछ केंद्र के इशारे पर किया गया था।उसी केंद्र के इशारे पर जिसके प्रधानमंत्रीको अपनी सरकार बचाने के लिए गेहलोत ने चिट्ठी लिखी है।शिवराज सिंह के शपथ लेने के तीन महीने बाद पूरे मंत्रिमंडल का गठन हुआ और अभी कुछ दिन पहले ही काफ़ी जद्दोजहद के बाद मंत्रियों को विभागों का बँटवारा हुआ।अब ज़्यादातर नए मंत्री उप-चुनाव जीतने की तैयारी में लग गए हैं।मुख्यमंत्री को कोरोना हो गया है ।प्रदेश फिर भी चल रहा है।लोकतंत्र भी देश की तरह मध्य प्रदेश में भी पूरी तरह सुरक्षित है।एक सरकार कोरना में बन गई दूसरी को कोरोना की आड़ में ज़िंदा नहीं रहने दिया जा रहा है।

देश एक ऐसी व्यवस्था की तरफ़ बढ़ रहा है जिसमें सब कुछ ऑटो मोड पर होगा। धीरे-धीरे चुनी हुई सरकारों की ज़रूरत ही ख़त्म हो जाएगी।।जनता की जान की क़ीमत घटती जाएगी और ग़ुलामों की तरह बिकने को तैयार जन प्रतिनिधियों की नीलामी-बोलियाँ बढ़ती जाएँगी।अमेरिका और योरप में इन दिनों उन बड़े-बड़े नायकों की सैंकड़ों सालों से बनीं मूर्तियाँ, जिनमें कि कोलंबस भी शामिल हैं, इसलिए ध्वस्त की जा रहीं हैं कि वे कथित तौर पर ग़ुलामी की प्रथा के समर्थक थे।हमारे यहाँ इस तरह के नायकों के चित्र ड्रॉइंग रूम्स और कार्यालयों में लगाए जा रहे हैं और गांधी जी के पुतलों पर गोलियाँ चलाई जा रही हैं।

लोकतंत्र की रक्षा के लिए जिस जनता की लड़ाई का दम भरा जा रहा है उसमें अस्सी करोड़ तो पाँच किलो गेहूं या चावल और एक किलो दाल लेने के लिए क़तारों में लगा दिए गए हैं और बाक़ी पचास करोड़ कोरोना से बचने के लिए बंटने वाली सरकारी वैक्सीन का अपने घरों में इंतज़ार कर रहे हैं। गेहलोत और कमलनाथ को वास्तव में घेराव राज भवन और प्रधानमंत्री आवास का नहीं बल्कि उन लोगों के घरों का करना चाहिए जो भुगतान की आसान किश्तों पर सत्ता की प्राप्ति के लिए अपनी ही पार्टी और नेतृत्व के प्रति स्व-आरोपित असहमति व्यक्त करने के लिए तैयार हो गए।और यह भी कि इस ‘असहमति’ के लिए उस मतदाता की कोई ‘सहमति’ नहीं ली गई जिसकी कि उम्मीदों को सरे आम धोखा दिया जा रहा है?

RB

 

 

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श्रवण गर्ग

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.श्रवण गर्ग ने हिन्दी पत्रकारिता में दो योगदान दिए हैं। पहला तो उन्होंने सम्पादक नामक प्रजाति को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और दूसरा इस प्रजाति की कार्यशैली में आमूलचूल परिवर्तन की व्यवस्था की

आज जो हिन्दी पत्रकारिता का विस्तार मध्यप्रदेश के बाहर पूरे देश में हो रहा है, तो इसके पीछे श्रवण गर्ग की मेहनत भी छिपी है। श्रवण गर्ग ने पत्रकारिता में हैँण्ड कम्पोजिंग से लेकर कम्प्यूटर नेटवर्विंâग तक के दौर में काम किया है।

करीब ४० साल के पत्रकारीय जीवन में उन्होेंने चार साल गुजराती पत्रकारिता को और करीब १३ साल अंग्रेजी पत्रकारिता को समर्पित किए हैं। उनका अधिकांश पत्रकारीय जीवन हिन्दी जगत में ही बीता है। वे जयप्रकाश नारायण के सानिध्य में १९७२ से १९७७ तक रहे। १९७४ में वे बिहार में करीब सालभर जयप्रकाश नारायण के साथ रहे। १९७५ में उनकी किताब ‘बिहार आन्दोलन- एक सिंहावलोकन’ प्रकाशित हुई। उन्होंने चंबल के बिहड़ोें की खाक छानी है और १९७२ में जब दस्युओं ने आत्मसमर्पण किया था, तब वे उसके गवाह रहे। प्रभाष जोशी के साथ वे ‘चंबल की बंदूवेंâ, गांधी के चरणों में’ पुस्तक के वे सह लेखक रहे। उन्होंने विभिन्न अखबारों में विभिन्न पदों पर काम किया। सर्वसेवा संघ नामक हिन्दी साप्ताहिक से शुरू हुआ, उनका पत्रकारीय सफर सर्वोदय प्रजानीति आसपास फायनेंशियल एक्सप्रेस, नईदुनिया, फ्री  प्रेस जनरल, एमपी क्रॉनिकल, शनिवार दर्पण, दैनिक भास्कर, दिव्य भास्कर और फिर नईदुनिया के प्रधान सम्पादक पद तक पहुंचा। १९६३ में उनका सम्पादित किया हुआ काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ, अखबारी लेखन के अलावा उन्होंने कहानियां, कविताएं और यात्रा वृतांत लिखे हैं।१४ मई १९४७ को जन्मे श्रवण गर्ग ने दुनिया के कई देशों में उन्होंने यात्राएं की।  शुरुआती पढ़ाई इंदौर में करने के बाद श्रवण गर्ग ने इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया, उसके बाद ग्रेजुएशन किया। दिल्ली जाने के बाद भारतीय विद्या भवन से उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की और अंग्रेजी पत्रकारिता के कोर्स भी किए और फिर नई दुनिया इंदौर में सम्पादकीय विभाग में कार्य करने लगे। नई दुनिया में रहते हुए उनका चयन इंग्लैंड के थॉमसन फाउंडेशन में तीन महीने के एक पाठ्यक्रम के लिए हुआ।श्री गर्ग ने हिन्दी, गुजराती, अंग्रेजी और र हिन्दी पत्रकारिता में झंडे गाड़े हैं।