जीवन के हर पक्ष में समन्वय के महाकवि - गोस्वामी तुलसीदास

जीवन के हर पक्ष में समन्वय के महाकवि - गोस्वामी तुलसीदास

मीडियावाला.इन।

(तुलसी जयंती, श्रावण शुक्‍ला सप्‍तमी 27 जुलाई 2020 के अवसर पर विशेष लेख)

मनुष्‍य सदा से ऐसा जीवन चाहता है जिसमें सुख-शांति, प्रेम, उल्‍लास, खुशी और ऐसी ही सकारात्‍मक भावनाऍं हों। दुख और संत्रास भला किसे अच्‍छा लगता है ? परंतु जीवन तो दोनों पक्षों से मिलकर बना है सुख है तो दुख भी है, प्रेम है तो घृणा भी है, जीत है तो हार भी है, आशा है तो निराशा भी है। जब संसार में घटनाऍं हमारे अनुसार होती हैं तब हम सुखी होते हैं और जब नहीं होतीं तब हम दुखी हो जाते हैं। इस प्रकार सुख का अर्थ है हमारे अनुकूल घटनाऍं होंना जो सदैव संभव नहीं हो सकता । श्री अरविंद ने कहा है कि ‘संसार की सारी समस्‍याऍं समन्‍वय की समस्‍याऍं हैं’। फ्रॉंसीसी दार्शनिक ज्‍यां पॉल सात्रे ने इसीलिए कहा ‘द हेल इज अदर पीपल’ दूसरा व्‍यक्ति ही नरक है। दूसरे व्‍यक्ति, दूसरी विचारधारा को स्‍वीकार न करना जीवन को नरक बना देता है। जब हम केवल अपनी बात पर अड़े रहते हैं अपनी इच्‍छा ही पूरी करना चाहते हैं तो तनाव व दु:ख होता है। यदि जीवन के विपरीत पक्षों में समन्‍वय हो जाए तो दु:ख समाप्‍त हो जाएगा। मानव जीवन की सारी दौड़, सुख और शांति की खोज है और समन्‍वय ही उसका मार्ग है।

जीवन के हर पक्ष में समन्‍वय के महाकवि गोस्‍वामी तुलसीदास जी का जन्‍म विक्रम संवत 1554 (ईस्‍वी सन् 1497) में श्रावण मास के शुक्‍ल पक्ष की सप्‍तमी को माना जाता है। तुलसी का जन्‍म भी अद्भुत था। जन्‍म के समय उनका डीलडौल 5 वर्ष के बालक जैसा था, मुँह में 32 दॉंत थे और पैदा होते ही रुदन की जगह मुँह से राम की ध्‍वनि निकली थी इसलिए उनके बचपन का नाम ‘रामबोला’ रखा गया। बचपन में ही माता-पिता के बिछोह से तुलसी की बाल्‍यावस्‍था बड़े कष्‍टों में गुजरी। फिर गुरु नरसिंहदास की कृपा से उन्‍होंने शिक्षा ग्रहण की। लोक कथा है कि पत्‍नी से अतिशय प्रेम का परिणाम विदुषी पत्‍नी की ताड़नापूर्ण शिक्षा के रूप में मिला और फिर तुलसी पूर्णतया अपने राम में रम गये। उस समय भारत में मुगलों का शासन स्‍थायित्‍व प्राप्‍त कर चुका था। छोटे राजाओं और सामंतों के शोषण, लड़ाई-झगड़ों और उच्‍चवर्गीय कट्टरता से आम जनजीवन संत्रस्‍त था। आलवार संतों के प्रभाव से प्रारंभ हुए निर्गुणमार्गीय भक्ति आंदोलन के समानान्‍तर सगुणमार्गीय भक्ति आंदोलन अपना स्‍वरूप ग्रहण कर रहा था। ऐसे समय में तुलसीदास जी ने रामकथा के साथ ही सदियों से दैन्‍य, भय, आतंक, अन्‍याय और संत्रास में जीती मनुष्‍यता की व्‍यथा कही और उसके निवारण का मार्ग बताया। तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के अलावा जानकी मंगल, पार्वती मंगल, गीतावली, कृष्‍णगीतावली, विनयपत्रिका, दोहावली, कवितावली, वरवै रामायण और हनुमान वाहुक जैसी अनेकों रचनाऍं कीं। इन में लोक की पीड़ा को पहचानना और राम कथा के माध्‍यम से मानवीय जीवन के सभी पहलुओं में समन्‍वय से इनके निवारण का मार्ग बताया।

तुलसी के समय विद्वानों और पंडितों की भाषा संस्‍कृत थी जो आम जनजीवन से कट चुकी थी। विद्वानों की रचनाऍं उच्‍चवर्ग तक सीमित थीं। उनमें आम जन के लिए आशा की कोई किरण नहीं थी। उस समय केशवदास जैसे कवि भाषा में रचना करते थे परंतु यह उनके लिए ग्‍लानि का कारण था। जायसी ने भी भाषा में रचना की परंतु वह गॅवई अवधी थी। परंतु तुलसी ने न केवल गर्व के साथ ‘ग्राम्‍य गिरा’ में रचना की वरन् संस्‍कृत, ब्रज, स्‍थानीय बोलियों के साथ ही विदेशी भाषाओं जैसे अरबी, फारसी के शब्‍दों का प्रयोग इतनी कुशलता से किया कि ठेठ अवधी का साहित्‍यक परिष्‍कार और श्रृंगार हो गया । भाषाओं का यह समन्‍वय लोक में इतना ग्राह्य हो गया कि एक नई लोक भाषा का उद्भव हो गया जो न तो पूरी तरह अवधी थी और न ही ब्रजी। मानस की चौपाइयॉं जन-जन के मुख पर चढ़ गईं।

मध्‍यकाल में निराकार और साकार दोनों की उपासना प्रचलित थी। तुलसी ने ‘अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा’ और ‘सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा’ कहकर दोनों को ईश्‍वर तक जाने के दो मार्ग बताकर झगड़ा समाप्‍त कर दिया। तुलसी ने निराकार ईश्‍वर के साकार ग्रहण करने की प्रस्‍थापना कर दी । वे कहते हैं सरोवर में कमल ऐसे शोभायमान हैं जैसे निर्गुण ब्रह्म ने सगुण रूप धारण कर लिया हो –‘फूलें कमल सोह सर कैसा, निर्गुन ब्रह्म सगुन भए जैसा’। तुलसी ने साधना की सरलता के आधार पर सगुण रूप की उपासना पर बल दिया परंतु उसे निर्गुण का ही अवतार घोषित करके समन्‍वय कर दिया।

शैव, वैष्‍णव और शाक्‍त मतों के मतभेदों और लड़ाइयों के अनेक उदाहरण इतिहास में मिलते हैं। तुलसी ने ‘सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा’ और ‘संकरप्रिय मम द्रोही, सिव द्रोही मम दास । ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास’ कहकर शैव और वैष्‍णवों के बीच समन्‍वय कर दिया। शाक्‍त मत की प्रधान देवी को सीता के रूप में आदिशक्ति का अवतार और राम की अर्द्धांगिनी बनाकर दोनों मतों को एक सूत्र में बॉंध दिया। तुलसी का ही प्रभाव है कि आज हम एक ही मंदिर में, एक ही लोटे से विष्‍णु, दुर्गा और शिव को एक साथ जल चढ़ाते हैं। सनातन धर्म एकता के सूत्र में बँध गया।

उस समय विभिन्‍न दार्शनिक पद्यतियों और संप्रदायों में द्वंद चल रहा था। इसे मिटाने के लिए ही तुलसीदास ने पुराण, आगम (तंत्र, देवताओं की पूजा, साधना से संबंधित) और निगम (वेद और उनके भाष्‍य) से समरूप तथ्‍य लेकर मानस की रचना की तथा प्रारंभ में ही घोषणा कर दी  –‘नानापुराणनिगमागमसम्‍मतं यद्’ । यहॉं तक कि, जड़ और चेतन जो परस्‍पर विरोधी प्रतीत होते हैं, को आपस में परिवर्तित करने में ईश्‍वर को सक्षम बताया –‘जो चेतन कहँ जड़ करइ, जड़हि करइ चैतन्‍य’ । इस प्रकार जड़ में चैतन्‍य और चैतन्‍य में जड़ का समन्‍वय कर दिया। इस प्रकार अब जड़ बस्‍तु भी चैतन्‍य का भाग होने के कारण भक्‍तों के लिए श्रद्धा का कारण बन गई। धर्म के अनुकूल होने पर अर्थ और काम भी त्‍याज्‍य नहीं रहा।

वैदिक काल से ही समाज के कार्यों के संचालन के लिए वर्ण व्‍यवस्‍था विद्यमान रही है। परंतु यह जन्‍म से न होकर मनुष्‍य के स्‍वभाव के आधार पर कार्यों के बँटवारे से संबंधित थी । गीता में श्री कृष्‍ण ने कहा है कि उन्‍होंने चारों वर्ण गुण और कर्म के आधार पर बनाए हैं(  चातुर्वर्ण्‍यं  मया सृष्‍टं गुणकर्मविभागश:) परंतु मध्‍यकाल आते-आते वर्ण जन्‍म से निर्धारित होने लगा और उसके अंदर जातियॉं निर्मित हो गईं। यह सामाजिक संगठन इतना दृढ़ बन गया कि व्‍यक्ति की योग्‍यता की कदर नहीं बची। जन्‍म ही सम्‍मान या अपमान दिलाने का आधार था। निम्‍न कही जाने वाली जातियों के उत्‍थान का कोई मार्ग ही नहीं बचा था । ऐसी स्थिति में तुलसीदास जी ने राम द्वारा शबरी के जूठे बेर खाकर, शबरी को ‘भामिनी’ जैसा भद्र संबोधन देकर, निषादराज को भरत के समान घोषित करके, वशिष्‍ठ ऋषि द्वारा निषादराज को गले लगाकर (रामसखा रिषि बरबस भेंटा, जनु महि लुठत सनेह समेटा) समाज के निचले तबके के लोगों को आशा की किरण दिखाई और प्रभावी वर्गों को व्‍यवहार की मर्यादा बताई।

तुलसी स्‍वयं ब्राह्मण थे परंतु तत्‍कालीन ब्राह्ण पंडितों, विद्वानों ने उन्‍हें मान्‍यता नहीं दी। तुलसी को इसकी चिन्‍ता भी नहीं थी परंतु दिल में पीड़ा तो थी। जातिपॉंति पर प्रहार करते हुए उनकी यही कुंठा कवितावली में निकली है जिसमे कहा है कि उन्‍हें कोई धूत, अवधूत, राजपूत, जुलाहा जो कहना हो कहे, उन्‍हें किसी की बेटी से बेटा थोड़े ही ब्‍याहना है, वह तो राम के गुलाम हैं । इसी पद की अंतिम पंक्ति दृष्‍टव्‍य है ‘ मॉंगि के खैबो मसीत को सोइबो लेबे को  एक न दैबे को दोऊ’ अर्थात् मॉंग के खाते हैं और मस्जिद में सोते हैं किसी के लेने-देने में नहीं हैं। कैसी अद्भुत जाति और धर्मनिरपेक्षता है तुलसी की।

मध्‍यकाल में स्त्रियों की दशा सोचनीय थी। सीता को राम के साथ सिंहासन पर बैठाकर और उनकी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित कर स्‍त्रीत्‍व को पहचान दी। तुलसीदास जी ने सारे संसार को सीता और राम दोनों का स्‍वरूप माना - ‘सीय राममय सब जग जानी’। जगत को तो अकेले राम भी नहीं बना सकते । यह तो सीता की महिमा है कि – भृकुटि बिलास जासु जग होई’। राम परम ब्रह्म हैं, मर्यादा पुरुषोत्‍तम हैं, धीर, वीर हैं तो सीता उनकी मायाशक्ति हैं, उनसे कहीं भी कम नहीं हैं। स्‍त्री पुरुष का सुन्‍दर समन्‍वय तुलसीदास जी ने किया है।

वनवास के समय राम ने राजसेना नहीं बल्कि बानर भालुओं की लोक सेना बनाई। वनवास भ्रमण के दौरान आर्य और आर्येत्‍तर शक्तियों को एक दूसरे के समीप लाये। तुलसी ने राजसत्‍ता का नया आदर्श स्‍थापित किया। राजा का हर कार्य के प्रजा के सुख के लिए होना चाहिए –‘जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, ते नृपु अवसि नरक अधिकारी’ । रामराज्‍य की कल्‍पना करके समाज में धर्मसम्‍मत अर्थ, धर्म, काम और अंतत: मोक्ष का नियोजन कर दिया।

तुलसीदास ने अपनी कृतियों के माध्‍यम से लोक और परलोक, संग्रह और त्‍याग, भोग और वैराग्‍य, शस्‍त्र और शास्‍त्र, गार्हस्‍थ और वैराग्‍य, ज्ञान और भक्ति, निर्गुण और सगुण और लोक और शास्‍त्र का अद्भुत समन्‍वय किया है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्‍व नहीं है और दोनों के बीच विरोध नहीं समभाव का सूत्र दिया है।

126 वर्ष की आयु में संबत 1680 (ईस्‍वी सन् 1623) में जन्‍म दिवस अर्थात् श्रावण मास के शुक्‍ल पक्ष की सप्‍तमी के ही दिन तुलसीदासजी राम की गाथा गाते-गाते परमधाम को चले गये। उनका अंतिम दोहा है – रामचंद्र जस बरि‍न के भयो चहत अब मौन, तुलसी के मुख दीजिए अबही तुलसी सोन’ । समन्‍वय के माध्‍यम से लोक कल्‍याण और मंगल करने वाले तुलसी युगों युगों तक प्रात: स्‍मरणीय रहेंगे।

RB

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ओपी श्रीवास्तव

ओपी श्रीवास्तव मध्यप्रदेशशासन में  भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के2007 बैच के अधिकारी है .वर्तमान में वे मुख्यमंत्री के अपर सचिव एवं संचालक जनसम्पर्क है .साहित्यकार  है .