राम मंदिर और मोदी: फर्क ‘संवैधानिक मर्यादा’ व ‘लोक मर्यादा’ का....

राम मंदिर और मोदी: फर्क ‘संवैधानिक मर्यादा’ व ‘लोक मर्यादा’ का....

मीडियावाला.इन।

यह महज संयोग नहीं है कि अयोध्या में मर्यादा
पुरूषोत्तम राम के मंदिर के शिलान्यास पर
संवैधानिक मर्यादाअों के पालन और उनके
औचित्य पर सवाल उठ रहे हैं। देश के प्रधानमंत्री
के इस आयोजन में जाने से संवैधानिक शपथ का
उल्लंघन है या नहीं ? क्या संवैधानिक मर्यादाएं
लोक मर्यादा से ऊपर हैं? क्या एक धार्मिक समारोह
पर राजनीतिक छाया बनी रहना अनकही
अनिवार्यता है? क्या लोक ह्रदय में बसे राम के
मंिदर के निर्माण के शुभ अवसर पर हिंदू समाज

के सभी वर्गों को प्राति‍निधिक रूप से न्यौतना
जरूरी है या नहीं ? ये कई सवाल हैं जो भव्य राम
मंदिर शिलान्यास की पूर्व बेला में देश की फिजा
में घुमड़ रहे हैं। हालांकि इन सबसे बेखबर और
कोरोना प्रकोप के बावजूद अयोध्या में राम मंदिर
की पहली ईंट रखने की तैयारियां धूमधाम से जारी
है। सियासत से अलदा हिंदू समाज इसे आस्था के
मंदिर के रूप में ज्यादा देख रहा है।
अयोध्या के इस महाआयोजन पर विवाद का साया
तो न्यौतने को लेकर चल ही रहा है। एक
शंकराचार्य पहले ही कोप भवन में हैं। अब एक
दलित महामंडलेश्वर महामंडलेश्वर स्वामी कन्हैया
प्रभुनंदन गिरी भी न्यौता न मिलने से खफा है।
उन्होंने कहा कि मुझे इसलिए नहीं बुलाया गया,
क्योंकि मेरे वहां जाने से मंदिर ‘अपवि‍त्र’ हो
जाता। बताया जाता है कि कार्यक्रम आयोजक राम

जन्म भूमि तीर्थ ट्रस्ट ने केवल 2 सौ लोगों को
निमंत्रण भेजा है। पीएम मोदी मंदिर का
शलान्यास 5 अगस्त को करने वाले हैं।
प्रधानमंत्री के अयोध्या जाने पर सवाल
एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन औवेसी ने यह
कहकर खड़ा किया कि पीएम का रामलला मंदिर
भूमि पूजन में शामिल होना उनके संवैधानिक पद
की शपथ का उल्लंघन है। क्योंकि धर्मनिरपेक्षता
हमारे संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है। औवेसी
ने यह भी कहा कि हम ( मुसलमान) इस बात को
नहीं भूल सकते कि जो बाबरी मस्जिद 400 सालों
से अयोध्या में खड़ी थी, उसे 1992 में ‘एक
आपराधिक भीड़’ ने ढहा दिया था।
औवेसी मुद्दे तार्किक ढंग से उठाते हैं, इसमें शक
नहीं। लेकिन यह अजब संयोग है कि वो जो मुद्दा
उठाते हैं और जिस समय पर उठाते हैं, उसकी

टायमिंग अहम होती है। जो बवाल वो खड़ा करते
हैं, उसका अंतिम राजनीतिक नफा भाजपा और
उनके खुद के वोट बैंक में क्रेडिट हो जाता है।
औवेसी ने जो सवाल उठाया है, उसी से मिलता-
जुलता प्रसंग 1951 में वीरावल (गुजरात) में
पुननिर्मित भव्य सोमनाथ मंदिर के शुभारंभ को
लेकर भी हुआ था। तब इतिहास में कई दफा तोड़े
गए सोमनाथ मंदिर के पुनरूद्धार को राष्ट्र के
गौरव की पुनर्प्रतिष्ठा मानकर दिग्गज कांग्रेस नेता
के.एम. मुंशी ने देश के तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ.
राजेन्द्र प्रसाद को मंदिर उद्घाटन के लिए आमंत्रित
किया था। उस वक्त भी सवाल उठा था कि क्या
किसी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के अध्यक्ष को किसी ऐसे
धार्मिक समारोह में शामिल होना चाहिए? क्या यह
संविधान की भावना के अनुरूप है ? वरिष्ठ पत्रकार
साकेत गोखले के अनुसार इसी आधार पर

तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने पत्र
लिख कर राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद को ‘सलाह’ दी
थी कि वे मंदिर शुभारंभ समारोह में न जाएं।
नेहरू ने राज्यों के मुख्‍यमंत्रियों से इस समारोह से
दूरी रखने को कहा क्योंकि समारोह सरकारी नहीं
था। नेहरू ने कहा कि हमें कोई भी ऐसी चीज
नहीं करनी चाहिए जो एक सेक्युलर स्टेट के हमारे
रास्ते में आड़े आए। क्योंकि यही हमारे संविधान
का आधार है। उधर नेहरू के पत्र का जवाब राजेंद्र
बाबू ने यह कहकर‍ दिया कि वे देश के राष्ट्रपति
हैं और जिस भी आयोजन में उन्हें जाने में खुशी
होती है, वहां जाएंगे। इस पर नेहरू ने उन्हें याद
दिलाया कि वह मंत्रि परिषद की सलाह पर कार्य
करने के लिए बाध्य हैं। लेकिन डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद
ने नेहरू की सलाह दरकिनार करते हुए कहा कि
'सोमनाथ मंदिर इस बात का परिचायक है कि

पुनर्निर्माण की ताक़त तबाही की ताक़त से हमेशा
ज़्यादा होती है।‘ राजेन्द्र बाबू 11 मई 1951 को
सोमनाथ न सिर्फ गए बल्कि वहां भाषण भी दिया।
औवेसी ने भी तकरीबन वही मुद्दा उठाया है जो
कभी नेहरू ने उठाया था। यानी देश में राज्य के
सेक्युलर होने का।
हालांकि कई लोग इस ‘संवैधानिक प्रश्न’ को राम
मंदिर के संदर्भ में अप्रासंगिक मानते हैं। तर्क यह
है कि राम मंदिर विवाद कोर्ट से हल हो चुका है।
दूसरे, राम मंदिर बीजेपी के घोषित एजेंडे का
हिस्सा है और वही आज केन्द्र में सत्ता में है।
अगर राजेन्द्र बाबू ध्वंस से ज्यादा पुन‍निर्माण को
शक्तिशाली मानते हैं तो मोदी का वहां जाना
‘संविधान विरूद्ध’ कैसे हुआ? यह भी तथ्‍य है
कि भारतीय संविधान में ‘समाजवादी’ और
धर्मनिरपेक्ष’ शब्द बाद में 1976 में संशोधन के
माध्‍यम से आपातकाल में जोड़े गए। अर्थात ये

संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा नहीं थे, बाद में
बने। वावजूद इन शब्दों के न होने पर भी
संविधान की भावना धर्मनिरपेक्ष ही मानी गई थी।
नेहरू के इस रवैए के पीछे वजह इतिहासकार
रामचंद्र गुहा के अनुसार यह है कि तब देश को
आजाद हुए मा‍त्र चार साल हुए थे। देश भीषण
साम्प्रदायिक दंगों और विभाजन को झेल चुका था।
नेहरू नहीं चाहते थे कि सोमनाथ की वजह से फिर
नए सिरे से देश में धार्मिक ध्रुवीकरण हो। लेकिन
बहुतों का यह भी मानना है कि नेहरू की यह
सोच बहुसंख्‍यक समुदाय की भावना के अनुरूप
नहीं थी।
हालांकि तब से अब तक राजनीति की दिशा काफी
बदल चुकी है। तीन साल पहले जब राहुल गांधी
सोमनाथ में पूजा करने गए थे, तब भी वही सवाल
फिर उठा था, लेकिन किसी ने उसे ज्यादा तवज्जो
नहीं दी। अलबत्ता औवेसी को जवाब यूपी की योगी
सरकार में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मोहसीन

रजा ने यह कहकर दिया कि मुझे तो उनका बयान
ही असंवैधानिक लगता है। मोदी तो अल्पसंख्‍यकों
के मस्जिद के एक कार्यक्रम में भी जा चुके हैं।
रजा ने यह भी कहा कि अगर ओवैसी सेक्युलर हैं,
तो उन्हें भी अयोध्या में भूमिपूजन कार्यक्रम में
शामिल होना चाहिए।

उधर औवेसी के सवाल को ही जड़ से खत्म करने
की नीयत से दो वकील सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचे हैं।
कोर्ट में दायर याचिका में उन्होंने कहा कि
संविधान में बाद में जोड़े गए शब्द ‘धर्मनिरपेक्ष’
और ‘समाजवाद’ हटाए जाएं। याचिका में कहा गया
है, ‘यह कदम संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) में
उल्लिखित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अवधारणा
और अनुच्छेद 25 के तहत प्रदत्त धर्म की स्वतंत्रता
के अधिकार के उल्लंघन के नजरिए से अवैध था।’
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सात अगस्त को सुनवाई
करेगा। गौरतलब है कि ऐसी ही याचिका इलाहाबाद

हाईकोर्ट में भी लगी थी, जिसे कोर्ट ने अमान्य कर
दिया था।
यहां बुनियादी सवाल यह है कि किसी राष्ट्राध्यक्ष
के लिए वो संवैधानिक मर्यादाएं ज्यादा बड़ी है,
जिसकी उसने शपथ ली है या फिर वो जन भावना
अधिक महत्वपूर्ण है, जो राजनीतिक आकांक्षा में
तब्दील होकर संविधान में मूर्तिमान हुई है ? और
यह भी कि संविधान में से समाजवादी और
धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाने से क्या देश का मूल चरित्र
ही बदल जाएगा ? या फिर यह केवल एक आशंका
भर है?
हमे यह भी याद रखना चाहिए कि बाबरी मस्जिद
के ‘राजनीतिक विध्वंस’ और उसके कारण हुए
समाज के सीधे बंटवारे के बावजूद मंदिर का
निर्माण भी अंतत: एक सृजनात्मक कार्य है। इसमें
करोड़ो हिंदुअों की आस्था की गुप्तगंगा भी हिलोरें
ले रही है। हमे धर्मांधता से डिस्टेंसिंग बनाए रखना
होगी, लेकिन धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या और

व्यवहार में भी बहुत से झोल हैं। मूल मुद्दा यह है
कि हमे एक ऐतिहासिक विवाद को जिंदा रखना है
या उस पर हमेशा के लिए मिट्टी डालनी है।
केवल इतिहास को कुरेदते रहेंगे तो जख्म ही
दिखेंगे। यह बात औवेसी को और उन लोगों को
भी समझनी होगी, जो घावों को उघाड़ना ही उसका
इलाज समझते हैं।

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अजय बोकिल

जन्म तिथि : 17/07/1958, इंदौर

शिक्षा : एमएस्सी (वनस्पतिशास्त्र), एम.ए. (हिंदी साहित्य)

पता : ई 18/ 45 बंगले,  नार्थ टी टी नगर भोपाल

मो. 9893699939

अनुभव :

पत्रकारिता का 33 वर्ष का अनुभव। शुरूआत प्रभात किरण’ इंदौर में सह संपादक से। इसके बाद नईदुनिया/नवदुनिया में सह संपादक से एसोसिएट संपादक तक। फिर संपादक प्रदेश टुडे पत्रिका। सम्प्रति : वरिष्ठ संपादक ‘सुबह सवेरे।‘

लेखन : 

लोकप्रिय स्तम्भ लेखन, यथा हस्तक्षेप ( सा. राज्य  की नईदुनिया) बतोलेबाज व टेस्ट काॅर्नर ( नवदुनिया) राइट क्लिक सुबह सवेरे।

शोध कार्य : 

पं. माखनलाल  चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि में श्री अरविंद पीठ पर शोध अध्येता के  रूप में कार्य। शोध ग्रंथ ‘श्री अरविंद की संचार अवधारणा’ प्रकाशित।

प्रकाशन : 

कहानी संग्रह ‘पास पडोस’ प्रकाशित। कई रिपोर्ताज व आलेख प्रकाशित। मातृ भाषा मराठी में भी लेखन। दूरदर्शन आकाशवाणी तथा विधानसभा के लिए समीक्षा लेखन।  

पुरस्कार : 

स्व: जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी उत्कृष्ट युवा पुरस्कार, मप्र मराठी साहित्य संघ द्वारा जीवन गौरव पुरस्कार, मप्र मराठी अकादमी द्वारा मराठी प्रतिभा सम्मान व कई और सम्मान।

विदेश यात्रा : 

समकाालीन हिंदी साहित्य सम्मेलन कोलंबो (श्रीलंका)  में सहभागिता। नेपाल व भूटान का भ्रमण।