अंतहीन खरीद-फरोख्त के लिए अभिशप्त मप्र

अंतहीन खरीद-फरोख्त के लिए अभिशप्त मप्र

मीडियावाला.इन।

जनादेश की धज्जियां उड़ाकर मजबूरी में हो रहे विधानसभा के उपचुनावों के दौरान भी मध्य प्रदेश में कांग्रेस के विधायकों का बिकना जारी है. इस खरीद-फरोख्त से प्रदेश में जहँ भाजपा ने अपनी सत्ता को आने वाले दिनों केलिए मजबूत कर लिया है ,वहीं कांग्रेस लगातार अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारती जा रही है . राजनीति से नैतिकता तो पहले ही तेल लेने जा चुकी है . बदले हुए नाटकीय घटनाक्रम में दमोह से कांग्रेस विधायक राहुल लोधी ने अपनी विधायकी से इस्तीफा देकर भाजपा का दोरंग वाला दुपट्टा ओढ़ लिया .अब ये दुपट्टा ही दलबदल का प्रतीक बन चुका है.राहुल के दलबदल ने लोधियों को संदिग्ध बना दिया है. पहले भी लोधी विधायक दलबदल कर चुके हैं .
प्रदेश में पंद्रह साल बनी सरकार को सम्हालने में नाकाम पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पहले अपनी कार्यशैली से ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके 20  समर्थकों का विश्वाश गंवाया और फिर बाद में कांग्रेस से विधायकों के भागने का जो सिलसिला शुरू हुआ वो अब भी जारी है .कांग्रेस के विधयकों को आत्मबोध धीरे-धीरे हो रहा है,भाजपा वाले  उन्हें अपने यहां स-सम्मान जगह देने के लिए अब भी पलक पांवड़े बिछाए बैठे हैं भाजपा पिछले विधानसभा चुनाव में जितनी कम सीटों की वजह से सरकार बनाने में नाकाम रही थी उससे कहीं ज्यादा सीटें उसने कांग्रेस से छीन ली हैं .विधानसभा के उपचुनाव इस छीना-झपटी को केवल वैधानिक रूप देने वाले हैं .
राहुल लोधी के  इस्तीफे के बाद मध्य प्रदेश में विधानसभा का गणित एक बार फिर बदल गया है. एक तरफ जहां बीजेपी को बहुमत के लिए अब सिर्फ 8 सीटों की जरूरत होगी तो वहीं कांग्रेस के लिए उपचुनाव की सभी 28 सीट जीतना जरूरी होगा.राहुल के इस्तीफे से खाली हुई सीट के लिए उपचुनाव अब अगले छह माह बाद होगा ,3  नवंबर को होने वाले मतदान के बाद भाजपा  को जहाँ सत्ता बरकरार रखने के लिए मात्र 8  विधायकों की जरूरत होगी वहीं कांग्रेस को पूरे 28  विधायकों की आवश्यकता होगी .जो एक नामुमकिन लक्ष्य है. बहुमत के लिए किसी भी दल को कम से कम 115  सीटें चाहिए,भाजपा के पास 107  पहले से हैं.कांग्रेस के पास अब केवल 87  विधायक बचे हैं,कांग्रेस सपा ,बसपा और निर्दलीय मिलाकर भी कुरसी तक नहीं पहुंचती दिखाई दे रही है.
विधानसभा के उप चुनावों के बाद मुख्य्मंत्री शिवराज सिंह चौहान को अब शायद झोला उठाकर कहीं नहीं जाना पडेगा .वे अगर पार्टी हाईकमान चाहेगा तो प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रहेंगे .इन उपचुनावों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की प्रतिष्ठा दांव पर लगी भी नहीं है. असली खेल तो ज्योतिरादित्य सिंधिया का है. वे 20  विधायकों के साथ भाजपा में आये थे.कांग्रेस के बाकी कुछ विधायक उनके पीछे-पीछे आये और कुछ को भाजपा खुद खींच लायी थी .अब हार-जीत मुख्यमंत्री से ज्यादा सिंधिया के भविष्य का निर्धारण करेगी .
राजनीति में हुई इस उठापटक के सूत्रधारों को उपचुनावों के बाद एक नई भूमिका तलाशना होगी.जाहिर है कि पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ आने वाले तीन साल तक तो विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता की भूमिका निभाने के साथ प्रदेशाध्यक्ष की भूमिका में नहीं रह पाएंगे .उन्हें भोपाल से जाना ही होगा ,अन्यथा कांग्रेस का बचा-खुचा वजूद भी समाप्त हो सकता है. प्रदेश में अब कांग्रेस को नयी पीढ़ी के कांग्रेस ही बचा सकते हैं .पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी अब पारी समाप्ति की सीमारेखा पर खड़े हुए हैं .लगातार कमजोर होती कांग्रेस को अपने पांवों पर खड़े होने के लिए अब आने वाले तीन साल तक खून-पसीना बहाना पडेगा .
मजे की बात ये है की भाजपा को उपचुनावों का समान करने का पुराना तजुर्बा है. भाजपा की पिछली पंद्रह साल की सरकार ने कोई डेढ़ दर्जन उप चुनाव देखे थे .कुछ को छोड़कर बाक़ी में भाजपा ने ही जीत हासील की थी .आने वाले दिनों में भी भाजपा को उपचुनाव तो करते  हुए ही आगे  बढ़ना  होगा .राजनीति अस्थिरता की वजह से मध्यप्रदेश का बहुत नुक्सान हो चुका है,इसकी भरपाई करने के लिए अगले महीने से सरकार को दोगुनी गति से काम करना होगा .मध्यप्रदेश को दोबारा पटरी पर लाने का जिम्मा किसके हाथ में आता है ये देखना दिलचस्प होगा .अभी तो तेल देखिये और तेल की धार देखिये .
आपको याद होगा की ये उपचुनाव आम विधानसभा चुनावों से ज्यादा रोमांच और विवादास्पद रहे हैं .इन उपचुनावों में भाजपा और कांग्रेस के नेताओं और प्रत्याशियों की जुबान इतनी ज्यादा फिसली है कि चुनावों का रंग ही बदल गया .राजनीति की शब्दावली में अनेक नए शब्द जुड़े हैं जो मुमकिन है कि आने वाले दिनों में भी विलोपित न किये जाएँ .इन शब्दों के अर्थ नयी पीढ़ी बार-बार पूछेगी .मुमकिन है कि विधानसभा में भी इन सब पर चर्चा का एक सत्र हो जाये .नयी शब्दावली के कारण ही बिहार विधानसभा के चुनाव भी मध्यप्रदेश विधानसभा के उप चुनावों की आभा को कम नहीं कर पाए हैं ,बल्कि बिहार विधानसभा चुनाव प्रचार में मध्यप्रदेश की प्रतिध्वनि सुनाई दे रही है. मेरी तो एक हीकामना है कि मध्यप्रदेश की सियासत को इस खरीद-फरोख्त के अभिशाप से जितना शीघ्र मुक्ति मिल सके उतना बेहतर है.

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राकेश अचल

राकेश अचल ग्वालियर - चंबल क्षेत्र के वरिष्ठ और जाने माने पत्रकार है। वर्तमान वे फ्री लांस पत्रकार है। वे आज तक के ग्वालियर के रिपोर्टर रहे है।