लाख टके का सवाल, क्षेत्रीय क्षत्रपो के चलते मोदी मैजिक का असर 2024 तक रहेगा?

लाख टके का सवाल, क्षेत्रीय क्षत्रपो के चलते मोदी मैजिक का असर 2024 तक रहेगा?

मीडियावाला.इन।

ऐसे में क्या 'मोदी मैजिक' क्षेत्रीय क्षत्रपों के गढ़ में ध्वस्त होता जा रहा है? मोदी और अमित शाह जैसा स्टार प्रचारक और बेहतर रणनीतिकार के बावजूद बीजेपी क्यों रीजनल पार्टियों के आगे अभी भी कमजोर है? हरियाणा, बिहार, यूपी, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, पं बंगाल, उड़ीसा  असम में क्षेत्रीय पार्टियां मजबूत हैं। ऐसे में देश में इन पार्टियो के किले में बीजेपी की  कमजोरी के कुछ तो मायने हैं, और इसके राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर दूरगामी असर पडे़गा?

इस सवाल के इर्द-गिर्द भाजपा ने अपनी रणनीति बनाना शुरु कर दी है। भाजपा अपने भीतर ताश के पत्ते नये सिरे से फैट रही है तो क्षेत्रीय दलों में दोस्त तलाशने लगी है। एकला चलो रे का मार्ग छोड़ कर सबके साथ की पगडंडी पर चलने का तय हुआ है। यही नहीं  2024 तक मोदी मैजिक बरकरार रहेगा, या कुछ नया करना पडेगा, इस पर आरएसएस का विचार तंत्र जुटा है। योगी आदित्यनाथ या अमित शाह में से किसको आक्रामक होने के निर्देश मिले हैं यह देखना होगा। जम्मू और कश्मीर से धारा 370 हटाने और जनसंख्या कानून के इर्द-गिर्द दोनो व्यक्तित्वो के तेवरों को तीखा किया जा रहा है। याने हिन्दुत्व की धार या प्रखर राष्ट्रवाद के नारे एक ही डीएनए के तर्ज पर और भी सवाल तेजी से उभरने वाले हैं।

यह भी पढ़ें: हिंदी सिनेमा का चेहरा बदलने वाला समयकाल

बीजेपी भविष्य पर फोकस करती रही है!
बीजेपी नेताओं के द्वारा अक्सर कहा जाता है कि बीजेपी भविष्य की राजनीति करती है। यह हाल के वर्षों में बीजेपी की रणनीति देखकर भी लगता है। बंगाल विधानसभा चुनाव जीतने की रणनीति भी साल 2018 से बनाई जा रही थी। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में इसके अच्छे नतीजे भी सामने आए थे, जब बीजेपी ने 18 लोकसभा सीट जीत कर सबको हैरान कर दिया था। लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी 2019 वाला जलवा बरकरार नहीं रख सकी। हालांकि, साल 2016 में जो पार्टी 3 सीट लाई थी वह वह इस बार 77 तक जरूर पहुंच गई है।

क्षेत्रीय दलों से कैसे पार पाएगी?

बीजेपी का इतिहास रहा है कि जहां मुख्य मुकाबला क्षेत्रीय पार्टियों से होता है (यूपी को छोड़ दें) वहां कमजोर साबित होती है। हालांकि, कई राज्यों में बीजेपी क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर कांग्रेस या दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों को हराती भी रही है। महाराष्ट्र, बिहार, असम, हरियाणा, नार्थ-ईस्ट के कई राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों में बीजेपी रीजनल पार्टियों के साथ गठबंधन कर जीत दर्ज करती आ रही है।  उदाहरण महाराष्ट्र का ही ले, जहां पर बीजेपी और शिवसेना साथ-साथ चुनाव लड़ी, लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद शिवसेना ने बीजेपी को झटका दे कर कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन कर लिया।

बीजेपी के लिए सिरदर्द
साल 2024 के लोकसभा चुनाव और 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम का असर कमोबेश दिखेगा। ऐसे बीजेपी के पास क्या विकल्प होंगे? साल 2014 में मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की प्रचंड जीत के बाद अगले ही साल लालू-नीतीश की जोड़ी ने बिहार में बीजेपी को धूल चटा दी थी। साल 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ हुए उड़ीसा  विधानसभा चुनाव में बीजेडी के नवीन पटनायक ने भी यही कारनामा किया था।

बंगाल का दूरगामी असर?

बीते सात सालों से केंद्र में सत्ता में रही बीजेपी दोबारा से असम में और पहली बार पुडुचेरी में सरकार बनाने मेें कामयाब रही। बीजेपी के लिए ये राहत की बात है कि इस बार असम में उसका वोट प्रतिशत 3.7 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि पुडुचेरी में बीजेपी का वोट प्रतिशत 11.2 प्रतिशत बढ़ा है। पश्चिम बंगाल में बीजेपी इससे पहले कभी पैर नहीं जमा सकी थी, लेकिन इस बार के विधानसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन बेहतर हुआ है।

यह भी पढ़ें:  क्या है सोनिया-कमलनाथ मुलाकात का सच....

विपक्ष की वास्तविक ताकत

बीजेपी के लिए असम में सत्ता में वापसी और पश्चिम बंगाल में उसके वोट प्रतिशत के बढ़ने का असर साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में कमोबेश पड़ सकता है। देश में 
क्षेत्रीय पार्टियां भी अब ताकतवर होगी इससे इनकार नहीं किया जा सकता। ममता बनर्जी की जीत से क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा बढ़ेगा, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसका कोई खास असर नहीं दिखेगा। इसका कारण है कि इन दलों में एकजुटता का अभाव है। अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, स्टालिन, विजयन की अपनी-अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं। टीएमसी, डीएमके, सपा, शिवसेना, राजद, अकाली दल जैसे दलों का एक साथ आना मुश्किल है। इन क्षेत्रीय दलों के नेताओं का प्रभाव अपने-अपने राज्यों तक ही सीमित है। 

और ममता बनर्जी 
देश का नेतृत्व करने के लिए कार्यकर्ताओं की एक मजबूत टीम का होना जरूरी है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि ममता बनर्जी बंगाल में मजबूत हैं, लेकिन बगल से सटे राज्य झारखंड और बिहार में ममता की कोई लोकप्रियता नहीं है। इसके बावजूद मोदी विरोधी गुट में राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में ममता बनर्जी का कद बढ़ जाएगा। ममता बनर्जी की राजनीति शिखर पर जरूर है और वह राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव भी डालेंगी, लेकिन उनको यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उन्हीं के किले नंदीग्राम में बीजेपी ने धूल चटाई है। यह बीजेपी के लिए एक शुभ संकेत है। कुलमिलाकर बंगाल के चुनाव परिणामों का राष्ट्रीय स्तर पर खास प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि राज्य स्तरीय चुनाव में जनता राष्ट्रीय मुद्दों पर नहीं बल्कि राज्य स्तरीय मुद्दों पर वोट करती है।इन सबके मद्देनजर भाजपा ने भविष्य के ताने- बाने  बुनने शुरु कर दिए हैं।

भाजपा ने पत्ते फेंकना शुरु किया
कमजोर राज्यों मे उत्तराखंड,  कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलकर उसी दिशा में बढती लग  रही है। ऐसे ही कुछ और कदम देखने को मिल सकते हैं।  मोदी मैजिक के साथ या उसके कमजोर प्रभाव के बावजूद चुनौतियों से लड़ने के लिए नायक गढ़ने और तरह-तरह के खलनायकों को सामने रख हमले शुरु होने वाले हैं,  जो उत्तरप्रदेश चुनाव तक जारी रखे जाएंगे। RB

सतीश जोशी

पिछले चालीस वर्षों से पत्रकारिता कर रहे, राजनीतिक विश्लेषक, टिप्पणीकार, नईदुनिया, भास्कर, चौथा संसार सहित प्रदेश के कई समाचार पत्रों के लिए लेखन। 


आदिवासी जनजीवन पर एक पुस्तक, राजनीतिक विश्लेषण पर पांच पुस्तकें, राज रंग, राज रस, राज द्रोह, राज सत्ता, राज पाट।  


रक्षा संवावदाता, रिपोर्टिंग के क्षेत्र में खोजी पत्रकारिता में महारथ हांसिल। प्रेस क्लब इंदौर के अध्यक्ष रहे। वर्तमान में सांध्य दैनिक 6pm के समूह सम्पादक, इंदौर में कार्यरत।


संपर्क : 9425062606

0 comments      

Add Comment