जिसकी लाठी, उसका लोकतंत्र

जिसकी लाठी, उसका लोकतंत्र

मीडियावाला.इन।

शीर्षक पढ़कर चौंकिए बिलकुल मत ।मैंने जो लिखा है बहुत सोच-समझकर लिखा है। बचपन से मुझे बताया गया था कि   लाठी का रिश्ता या तो भैंस से होता है या फिर बुढ़ापे से लेकिन बाद में मैंने अपने अनुभव से जाना कि लाठी का रिश्ता केवल भैंस या बुढ़ापे से ही नहीं लोकतंत्र से भी होता है ।अर्थात जैसे -''जिसकी लाठी,उसकी भैंस '' होती है वैसे ही -''जिसकी लाठी,उसका लोकतंत्र '' भी होता है ।आजकल देश में इस नए मुहावरे के अनेक उदाहरण देखने को मिल रहे हैं ।
लाठी अक्सर काठी को झुकने से रोकती है और जरूरत पड़ने पर दुश्मन को झुकाने  के काम  भी  आती  है।देश के पहली लोकतांत्रिक महात्मा मोहनदास करम चंद गांधी ने अपनी काठी को झुकने से बचने के लिए दूसरे बूढ़ों की तरह लाठी का सहारा लिया था ।लाठी लेकर वे तेज-तेज कदमों से चलते थे,शायद इसीलिए महात्मा गांधी के जाने के बाद उनके द्वारा उपयोग की गयी तमाम चीजों का प्रतीकात्मक इस्तेमाल होने लगा।गांधी का चश्मा आजकल देशव्यापी स्वच्छता मिशन के काम आ रहा है और लाठी लोकतंत्र की रक्षा के काम आ रही है। गनीमत है की गांधी की कमर में लटकी रहने वाली घड़ी पर अभी किसी की नजर नहीं पड़ी है ।
मै बात लाठी की कर रहा था। यानि जिसकी लाठी,उसके लोकतंत्र की ।एक समय में लोकतंत्र की रक्षा के लिए दुर्गावतार श्रीमती इंदिरा गांधी ने महात्मा गांधी की लाठी का इस्तेमाल लोकतंत्र की रक्षा के लिए किया था और विपक्षियों के साथ-साथ उनके पीछे खड़े छात्रों पर इतनी लाठियां चलवाईं थीं कि ''आपातकाल'' का जन्म हो गया था ।लोकतंत्र की रक्षा के लिए चलाई गयी लाठी से दुर्गावतार ने 19  माह तक लोकतंत्र की रक्षा जरूर की लेकिन बाद में वे खुद सरकार से हाथ धो बैठीं थीं ।यानी लाठी ने उनके ऊपर ही पलटवार कर दिया था ।वे समझ ही नहीं पाईं थीं कि ऊपर वाले की लाठी बेआवाज होती है ।
इत्तफाक से 35  साल बाद की सरकार भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए महात्मा गांधी की लाठी का इस्तेमाल लोकतंत्र  की रक्षा के लिए कर रही है ।लाठी के सहारे लोकतंत्र बचने वाले पंत   प्रधान   भी ईश्वर का अवतार हैं,ऐसा उनके ही अनेक भक्त कहते हैं ।कहते हैं कि नागरिकता संशोधन क़ानून बनाने के बाद से ही देश का लोकतंत्र खतरे में पड़ गया,इसलिए सरकार को विश्व विद्यालयों में रहने वाले खतरनाक लोगों के खिलाफ लाठी का इस्तेमाल करना पड़ा । कहा तो यहां तक जा रहा है कि जब गांधी की लाठी लोकतंत्र की रक्षा नहीं कर पाई तब सरकार को अपनी पुलिस से गोली तक चलवानी पड़ी ।लाठी के सहारे लोकतांत्र चलाने की इस मुहिम के खिलाफ या पक्ष में जाने का लोकतांत्रिक अधिकार फिलहाल ऐच्छिक है।आप चाहें तो इसका इस्तेमाल करें और न चाहें तो न करें ।
बहरहाल देश आग की लपटों से घिरा हुआ है। इन लपटों पर काबू पाने में न लाठी काम आ रही है और न गोली।बातचीत से मामला सुलझ ' सकता है किन्तु कोई बात करने को तैयार ही नहीं है ।कहते हैं कि जुरासिक रिपब्लिक में बातचीत का कोई प्रावधान नहीं होता ।इस नए लोकतंत्र में सिर्फ लाठी ही सबका सहारा होती है ।पुराने जमाने में 'किचिन कैबिनेट' का लोकतंत्र होता था ,इसमें कम से कम चार लोग होते थे,जिसे बाद में लोग चौकड़ी कहने लगे थे लेकिन जुरासिक रिपब्लिक में दो ही लोग होते हैं,इसे आप जो चाहें कह सकते हैं ।मै तो एक डरा हुआ लेखक हूँ इसलिए कुछ नहीं कहता ,क्योंकि ऐसा करना आज के लोकतांत्र में देशद्रोह माना जाता है ।
मुझे बताया गया कि अब सरकार सोच रही है कि लाठी का इस्तेमाल ऐसे किया जाये ताकि  विरोध का राष्ट्रव्यापी सांप भी मर जाए और उसकी लाठी भी न टूटे। मेरे ख्याल से ये एक लोकतांत्रिक और अहिंसक तरीका हो सकता है ।लाठी तोड़े बिना भी लोकतंत्र की रक्षा की जा सकती है और ऐसा अवश्य करना चाहिए ,क्योंकि लाठी का लोकतंत्र दुनिया के किसी भी मुल्क में चिरस्थाई साबित नहीं हुआ ।आपके सामने अब दो ही विकल्प  हैं ।पहला या तो लोकतंत्र बचा लीजिये या अपनी लाठी ।दोनों एक साथ नहीं चल सकते।लोकतांत्र लोक से चलेगा,लाठी से नहीं ।जो लोग लोकतंत्र को लाठी के बल पर चलाना चाहते हैं वे गलती पर हैं।उन्हें समय रहते अपनी गलती सुधार लेना चाहिए और महात्मा गांधी की लाठी उन्हें लौटा देना चाहिए ।
लाठी और लोकतंत्र के बारे में अनेक व्याख्याएं हो सकतीं हैं किन्तु अभी देश घायल और अवसादग्रस्त है इसलिए मै इस विषय को स्थगित रखते हुए आप पर छोड़ता  हूँ कि आप लाठी के साथ रहें या लोकतंत्र के साथ।आखिर मर्जी है आपकी और लाठी भी है आपकी ।लोकतंत्र तो सबका है ।लोकतंत्र में शरणागत का सदा स्वागत किया जाता है ,लेकिन किसी की दुम उठाकर नहीं देखा जाता ।

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राकेश अचल

राकेश अचल ग्वालियर - चंबल क्षेत्र के वरिष्ठ और जाने माने पत्रकार है। वर्तमान वे फ्री लांस पत्रकार है। वे आज तक के ग्वालियर के रिपोर्टर रहे है।